ऋतुराज जी के बगैर क्या वह शहर वही होगा और क्या मैं अब उसे झेल पाऊंगा? इंदौर छोड़ने से पहले मैं ईरान के फिल्म निर्देशक कियारोस्तामी की एक यादगार फिल्म इंदौर छोड़ आया था पेन ड्राइव पर! दोस्त का घर कहाँ है? वह घर, अब लगता है, इस शहर में नहीं है …
इन पंक्तियों के लिखे जाने तक भी मेरे लिए इसे स्वीकार कर पाना बेहद मुश्किल है। अभी कुछ समय पहले तक तो वे थे, अपनी लम्बी खामोशियों के बावजूद, उस छोर पर सब कुछ देखते और सुनते हुए। वे फ़ोन नहीं उठाते थे, पर इसके बावजूद हम दोनों एक दूसरे के बारे में सोचते थे और मिलने के बाद सारा असंवाद ख़त्म हो जाता था। मेरे लिए वे जयपुर प्रवास का अभिन्न हिस्सा थे और उनके बगैर उस शहर की कल्पना करना भी मेरे लिए कठिन था। जयपुर आने के बाद जब दो-तीन दिनों तक उनसे बात नहीं हो पाती थी (उनके फोन न उठाने की लाइलाज आदत के कारण), तो विश्वस्त साथी शैलेन्द्र जी की मार्फ़त मैं उन्हें सूचना देता कि दोपहर में मैं आ रहा हूँ। वे मेरे घर से बहुत दूर रहते थे और रास्ते में टोंक रोड, सांगानेर और लाल बत्तियों का एक पेंचीदा जाल बिछा मिलता था। मुझे ट्रैफिक में गाड़ी चलाने में काफी दिक्कत होती है और ख़ास तौर पर शाम के धुंधलके में तो बूढ़ी नज़र बेतरह डगमगाने लगती है। पिछले दस-पंद्रह वर्षों से मेरी बेटी मुझे कार चालक और स्वयं को एक अदद सवारी मानने से साफ़ इन्कार कर चुकी है। लेकिन मुझ जैसे खतरनाक चालक के साथ अगली सीट पर बैठ ऋतुराज जी पता नहीं कितनी बार मेरे साथ सुदूर आमेर से आगे और दूसरी तरफ शिवदासपुर, बारखेड़ा और चन्दलाई तक का सफ़र बेख़ौफ़ तय कर चुके हैं। अलस्सुबह पक्षी निहारन के साझा जूनून में वे सुबह साढ़े सात और कभी-कभी सात बजे टोंक रोड पर डी मार्ट के सामने नहा-धो, दाढ़ी बनाने के बाद अपने झोले और कैमरे के साथ तैनात मिलते थे। झोले में भाभीजी के हाथ के बनाए सैंडविच होते थे, जिन्हें भूख लगने पर हम गाड़ी को किसी जगह रोक, मज़े से खाते थे। एक बार जयपुर से चालीस-पचास किलोमीटर दूर वीरान इलाके में कच्ची सड़क पर जब गाड़ी रेत में फंस गयी थी तो एक ट्रैक्टर ने रस्से की मदद से हमें उस भवसागर से पार उतारा था। अपने घर आने के लिए उन्होंने बहुत जतन के साथ मुझे जगतपुरा का अपेक्षाकृत लंबा रास्ता सुझाया था जो दोपहर के वक्त खाली मिलता था और जहां लाल बत्तियां भी नहीं के बराबर थीं। लेकिन अपनी फ़ोन न उठाने की आदत के बावजूद घर से निकलने के बाद रास्ते में दो या तीन बार उनका फोन मिलता कि बताओ, कहाँ तक पहुंचे? उन्होंने कांगड़ा की ग्रीन टी पीने की आदत मुझे सिखाई थी और बूढ़ों में आम पायी जाने वाली कब्ज़ की शिकायत और उसके निदान के लिए हमने साझा रूप से सबसे मुफ़ीद आयुर्वेदिक दवाओं की शिनाख्त की थी। एक यशस्वी और अत्यंत संवेदनशील कवि के रूप में हज़ारों दूसरे पाठकों की तरह मैं भी एक लम्बे समय से उनका कायल था, लेकिन मेरा सौभाग्य था कि उम्र के आख़िरी पड़ाव में, जब सारी व्यावसायिक और पारिवारिक व्यस्तताओं से दूरी बनाकर मैं जयपुर आया था तो मुझे ऋतुराजजी का सानिद्य मिला था। हम दोनों का अंतर्मुखी स्वभाव एक दूसरे से मेल खाता था। इतने बड़े कवि होने के बावजूद वे अपने लेखन को लेकर ज़रा भी महत्वाकांक्षी नहीं थे और दूसरों के सामने अपने बारे में बात करना पसंद नहीं करते थे। बल्कि दूसरों की बातें वे बहुत ध्यान से सुनते थे। हरिनारायण जी चाहते थे कि मैं उनके साथ एक लम्बी बातचीत ‘कथादेश’ के लिए करूं और मिलने पर हर बार वे मुझे इसकी याद दिलाते रहते थे, पर ऋतुराज जी हर बार हँसकर टाल देते थे।
वे अपनी उम्र के बावजूद बेहद सकारात्मक और स्वस्थ थे। अभी कुछ सप्ताह पहले ही तो वे भले चंगे थे। 13 सितम्बर को मेरी पुस्तक ‘स्मृतियों में सिनेमा’ पर बोलते हुए उन्होंने बहुत भावुक होकर कहा था कि बुढ़ापे में सिनेमा देखने का नज़रिया ही बदल जाता है। वे जयपुर में हमारे ‘वसुंधरा’ के फिल्म आयोजनों में नियमित रूप से आते, हालांकि वापसी में ओला-ऊबर पाने में उन्हें काफी दिक्कत होती थी। पर वे मेरा आग्रह कभी अस्वीकार नहीं करते थे। मुझे ऋतुराजजी के साथ बतौर विशिष्ट अतिथि प्रगतिशील लेखक संघ के अधिवेशन में इंदौर जाना था और इसे लेकर वे काफी उत्साहित भी थे। लेकिन इससे पहले ही वे अचानक बीमार पड़ गए। मैंने इंदौर में अपने वक्तव्य की शुरुआत में ही उन्हें याद करते हुए दो दिन पहले विश्वास ज़ाहिर किया था कि वे जल्दी ही ठीक होकर हमारे बीच लौटेंगे। लेकिन इस आख़िरी बार मेरे विश्वास को निर्ममता से अस्वीकार करते हुए वे चले गए—हमेशा के लिए।
उन्हें अभी मेरे साथ मुंबई चलना था और वे भी मुझे बूंदी ले चलने वाले थे, वहां ‘गूपी गायन बाघा बायन’ फिल्म दिखाने के लिए, जहां के किले में उसकी शूटिंग हुई थी। मैं 13 सितबर को विनोद भारद्वाज द्वारा खींचे गए चित्र को देख विश्वास ही नहीं कर पाता कि इन बीच के चार-पांच सप्ताहों में ऐसा क्या हुआ कि अस्पतालों के डॉक्टर पता नहीं कौन-कौनसे कष्टप्रद उपचार उनपर जारी करने के लिए मजबूर हो गए।
ऋतुराज जी की लगभग आख़िरी कविता की ओजस्वी पंक्तियाँ अब मेरे सामने किसी शिलालेख की सी शक्ल इख्तियार करने लगी हैं!
झुर्रियां
मृत्यु के भी बहुतेरे टेढ़े-मेढ़े रास्ते होते हैं
छोटी-छोटी पगडंडियाँ भी बढ़ी हुई
दृश्यमान होती हैं ये लकीरें
जो सबसे पहले तो गालों की उभरी हड्डियों से
नीचे खरोंचे बनती फ़ैली हैं
फिर नसों के उभरे जाल बनाते हुए दोनों पंजों के ऊपर
सिकुड़ती हुई ठहर गयी हैं
त्वचा का इस तरह सिकुड़ना
और शिराओं का उलझते हुए उभरना धीरे-धीरे
अन्धकार छाने की प्रक्रिया है
हर सुबह उठने पर एक नया टूटा धागा
चेतना के बटन को ढीले से लटकाए दिखाई देता है
त्वचा के साथ-साथ समय भी सिकुड़ गया है
और चीज़ें भी सिकुड़कर गायब होने लगी हैं
कटी-फटी लकीरों में मीठी-मीठी स्मृतियाँ
सतौलिया खेलती हैं
पहले कभी इतनी सुन्दरता नहीं थी
मानो किसी दहकते पलाश की जड़ें
ज़मीन से ऊपर निकलती जा रही हैं
ये झुर्रियां नहीं हैं
मृत्यु के हाथों को कुछ समय तक
बांधे रखने की डोरियाँ हैं
मैं 25 अक्टूबर की सुबह इंदौर से अमृतसर चला आया और अभी वहीं हूँ। लेकिन जयपुर लौटने के नाम पर ही दिल बैठने लगा है । ऋतुराज जी के बगैर क्या वह शहर वही होगा और क्या मैं अब उसे झेल पाऊंगा?
इंदौर छोड़ने से पहले मैं ईरान के फिल्म निर्देशक कियारोस्तामी की एक यादगार फिल्म इंदौर छोड़ आया था पेन ड्राइव पर! यह फिल्म कुमार अम्बुज और विनीत ने कल शाम वहां साथियों को दिखाई होगी! मुझे अब उस फिल्म का शीर्षक बार बार याद आ रहा है
Where is the friend’s home? दोस्त का घर कहाँ है?
वह घर, अब लगता है, इस शहर में नहीं है …
जितेंद्र भाटिया की पोस्ट से साभार
