किसी सरकार का “अनैतिक” कह देना हमारी सारी जिज्ञासा और संवेदना खत्म नहीं कर सकता। सहमति से बने किसी वयस्क संबंध या स्नेह की अभिव्यक्ति के लिए मृत्युदंड स्वीकार नहीं किया जा सकता।न्याय की कसौटी में दया, सुनवाई और सजा का अनुपात भी शामिल होना चाहिए कि नहीं?
14 अक्टूबर को दो बांग्लादेशी नागरिकों को सऊदी अरब में मृत्युदंड दिया गया। सऊदी अधिकारियों ने मस्जिद में कथित “अनैतिक कृत्य” का आरोप बताया, लेकिन सार्वजनिक विवरण से यह स्थापित होता दिख रहा है कि मामला सिर्फ चुंबन का था।
आज, 19 अक्टूबर को प्रकाशित Jago News की रिपोर्ट में नज़रुल के पिता ने कहा कि दोनों पति-पत्नी नहीं थे और उनके बेटे का शव भी बांग्लादेश नहीं पहुँचा है।
नज़रुल के पिता ने कर्ज लेकर अपने बेटे को सऊदी अरब कमाने के लिए भेजा था। उम्मीद थी कि बेटा कमाएगा और घर की हालत कुछ सुधरेगी। अब पिता अपने बेटे का शव वापस माँग रहा है।
नज़रुल इस्लाम और सिति अख्तर को 14 अक्टूबर को मृत्युदंड दे चुके सऊदी अधिकारियों का कहना है कि उन्हें मक्का की एक मस्जिद में “अनैतिक कृत्य” के मामले में दोषी ठहराया गया था।
इसके साथ ही सोशल मीडिया पर एक कहानी फैल रही है—कि दोनों नवविवाहित थे, हनीमून पर गए थे और पति ने पत्नी का माथा चूम लिया था। इस कहानी की पुष्टि नहीं हुई है। नज़रुल के पिता ने तो दोनों के पति-पत्नी होने और शव बांग्लादेश लौट आने के दावों का खंडन किया है।
लेकिन इन अपुष्ट बातों को हटा देने के बाद भी जो बचता है, वह बेहद तकलीफदेह है।
दो इंसानों की जान ले ली गई। बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय का कहना है कि उसे और उसके मिशन को न्यायिक कार्यवाही की पहले जानकारी नहीं दी गई थी। अब वह बेबस बूढ़ा सऊदी सरकार से विवरण माँग रहा है।
आखिर आरोप क्या था? सबूत क्या थे? दोनों को अपना पक्ष रखने, वकील की मदद लेने और अपनी भाषा में कार्यवाही समझने का कितना अवसर मिला? ऐसा क्या था जिसके लिए उनकी जान लेना जरूरी समझा गया?
किसी सरकार का “अनैतिक” कह देना हमारी सारी जिज्ञासा और संवेदना खत्म नहीं कर सकता। मेरी नज़र में सहमति से बने किसी वयस्क संबंध या स्नेह की अभिव्यक्ति के लिए मृत्युदंड स्वीकार नहीं किया जा सकता, बल्कि मैं तो राज्य द्वारा किसी की भी जान लेने के अधिकार से पूरी तरह असहमत हूँ । इस मामले में वास्तव में क्या हुआ, उसका पूरा सच सामने आना चाहिए।
धार्मिक स्थल की मर्यादा का महत्व है लेकिन क्या वह इंसान की जिंदगी से बढ़कर होना चाहिये । न्याय की कसौटी में दया, सुनवाई और सजा का अनुपात भी शामिल होना चाहिए कि नहीं?
नज़रुल के पिता के सामने अब बेटे को खोने का दुख है, कर्ज का बोझ है और अनगिनत सवाल हैं। सिति अख्तर के जीवन और परिवार की कहानी भी सामने आनी चाहिए।
इन दोनों को हमारी संवेदना पाने के लिए किसी काल्पनिक प्रेमकथा का पात्र बनने की जरूरत नहीं है। वे इंसान थे। इतना ही पर्याप्त है ।
शीतल पी सिंह की पोस्ट से साभार
