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मबनारस में जन्मीं जानकी किस्मत के थपेड़ों से इलाहाबाद के कोठे पर आ पहुंचीं। उस्ताद हस्सू खाँ की इस शागिर्द की रगों में संगीत बहता था। मशहूर गाना ‘रंग महल के दस दरवाज़े… सैयां निकस गए’ असल में जानकी बाई का ही लिखा और गाया हुआ था। उन्होंने दौलत, शोहरत और मुकाम सब कमाया, लेकिन इस फनकार का अंत बेहद दर्दनाक था।
इलाहाबाद की मशहूर फनकार ‘जानकीबाई’ का मकबरा देखकर तरस खाया जा सकता है कि जिनकी गायकी की दुनिया लोहा मानती थी, उनके कब्र पर शराबियों और नशेड़ियों को जमावड़ा रहता है।
इलाहाबाद का साठ फीट रोड और वहां का ‘काला डांडा कब्रिस्तान’ में यह मकबरा है। यहां दफ़न है औपनिवेशिक भारत की एक ऐसी आवाज़, जिसने महफ़िलों पर राज किया। नाम था—जानकी बाई, जिन्हें दुनिया ‘छप्पन छुरी’ के नाम से जानती है!
बनारस में जन्मीं जानकी किस्मत के थपेड़ों से इलाहाबाद के कोठे पर आ पहुंचीं। लेकिन उस्ताद हस्सू खाँ की इस शागिर्द की रगों में संगीत बहता था। गुरु ने कहा था, “तुम जागते-सोते हर वक्त कलाकार हो।” और जानकी ने इसे सच कर दिखाया।
पहला किस्सा मिलता है कपिल पांडे के भोजपुरी उपन्यास फुलसंघी में – इसमें जिक्र है कि उन पर सबकुछ लुटा लेने वाला एक प्रेमी जब उनकी सूरत देखी तो उनके चेहरे पर छप्पन वार किए।
दूसरा किस्सा है – जब वह महज 12 साल की थीं तो एक पुलिस कांस्टेबल रघुनंदन उन पर रीझ गया। उसने जानकी को प्रेम प्रस्ताव भेजा जो उन्होंने ठुकरा दिया। फिर उसने यौन संबंध बनाना चाहा तो उसमें भी नाकाम हो गया। गुस्से में रघुनंदन ने उन पर हमला किया। शरीर से लेकर चेहरे तक घाव ही घाव करता चला गया
एक है कि 1876 में काशी की एक संगीत प्रतियोगिता में उन्होंने प्रख्यात गायक रघुनंदन दुबे को पराजित किया था। प्रतियोगिता में काशी की रानी साहिबा ने जानकी को पुरस्कार दिया था। कहा जाता है कि महज़ बारह वर्ष की जानकी से हारने पर रघुनंदन दुबे ने उन्हें जान से मारना चाहा। चाकू से रघुनंदन दुबे ने जानकी पर अनगिनत वार किए। जानकी के शरीर पर कुल छप्पन घाव थे, इसीलिए उन्हें छप्पन छुरी कहा जाने लगा। काशी की रानी साहिबा ने मिशन अस्पताल में जानकी का इलाज कराया। छः साल के इलाज के बाद जानकी ठीक हुईं। चेहरे और शरीर पर छप्पन घाव आए। सूरत तो बिगड़ गई, लेकिन सीरत और संगीत का जुनून कम नहीं हुआ। वह घूंघट डालकर गाती रहीं।
उन्हें एक बार रीवा के राजा के यहाँ गाना था लेकिन वह उनकी सूरत देखकर सुनने के लिए तैयार ही नहीं हो रहे थे। जानकी बाई ने कहा कि हूजूर पर्दा करके मैं गाऊंगी। फिर जब उन्होंने गाना शुरू किया तो महफ़िल खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहीं थीं। बाद में राजा ने उन्हें बहुमूल्य उपहारों से नवाजा।
उनकी आवाज़ का जादू ऐसा था कि एक बार अतरसुइया में गाते हुए चबूतरा 14 हज़ार के चांदी के सिक्कों से पट गया! 1911 में जॉर्ज पंचम की ताजपोशी में उन्होंने और उनकी प्रतिद्वंद्वी गौहर जान ने मिलकर समां बांध दिया था। लोग कहते थे—”गौहर जानकी से ज़्यादा खूबसूरत थीं, पर जानकी गौहर से बेहतर गायिका थीं।” नेहरू सर तेज बहादुर सप्रू, मोती लाल नेहरू, तेज नारायण मुल्ला, जस्टिस कन्हैया लाल, सुरेन्द्र नाथ सेन, मुंशी ईश्वर शरण, लाला राम दयाल, हृदय नाथ कुंजरू और अमर नाथ झा भी उनके दीवाने थे।
मशहूर गाना ‘रंग महल के दस दरवाज़े… सैयां निकस गए’ असल में जानकी बाई का ही लिखा और गाया हुआ था। उन्होंने दौलत, शोहरत और मुकाम सब कमाया, लेकिन इस फनकार का अंत बेहद दर्दनाक था। गाना खत्म करने के बाद वह अपना नाम बताती थीं, “जानकीबाई इलाहाबादी”। 18 मई 1934 को जब मौत हुई, तो बेशुमार दौलत के बाद भी जनाजे में चार मजदूर और चंद लोग ही थे। आज वो गुमनामी की कब्र में सो रही हैं। आज इलाहाबाद में उनका कोई नामलेवा नहीं है। उनकी क़ब्र पर कुत्ते सोते हैं। इस मकबरे को संरक्षित करने की बहुत जरूरत है।
मुझे जलालवी का एक शेर याद आ रहा है-
“शुक्रिया ऐ क़ब्र तक पहुँचाने वालो शुक्रिया
अब अकेले ही चले जाएँगे इस मंज़िल से हम”
इलाहाबाद विश्वविद्यालय की सेवानिवृत्त प्रोफेसर नीलम शरण गौर ने जानकी बाई के ऊपर एक उपन्यास Requiem in Raga Janki लिखा है। इसे 2023 का अंग्रेजी भाषा का साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था। इसे आप दिए गए लिंक पर जाकर खरीद सकते हैं।
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(allahabad tales की पोस्ट से साभार)
