
टैरिफ़ किसी देश से आयात किए जाने वाले उत्पादों पर लगने वाला शुल्क है. इसका भुगतान सामान आयात करने वाली कंपनी अपने देश की सरकार को करती है. देश आमतौर पर कुछ क्षेत्रों को विदेशी प्रतिस्पर्धा से बचाने के लिए टैरिफ़ लगाते हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप कहते आए हैं कि अगर कोई देश अमेरिकी सामानों पर ज़्यादा आयात शुल्क लगाता है, तो अमेरिका भी उस देश से आने वाली चीजों पर ज़्यादा आयात शुल्क यानी टैरिफ़ लगाएगा
टैरिफ़ किसी देश से आयात किए जाने वाले उत्पादों पर लगने वाला शुल्क है. इसका भुगतान सामान आयात करने वाली कंपनी अपने देश की सरकार को करती है.
देश आमतौर पर कुछ क्षेत्रों को विदेशी प्रतिस्पर्धा से बचाने के लिए टैरिफ़ लगाते हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप कहते आए हैं कि अगर कोई देश अमेरिकी सामानों पर ज़्यादा आयात शुल्क लगाता है, तो अमेरिका भी उस देश से आने वाली चीजों पर ज़्यादा आयात शुल्क यानी टैरिफ़ लगाएगा.ट्रंप ने इसे रेसिप्रोकल टैरिफ़ कहा है. बुधवार से अमेरिका व्यापक टैरिफ़ दायरे की घोषणा करने वाला है.व्यापार मामलों के विशेषज्ञ बिस्वजीत धर का कहना है कि अमेरिकी राष्ट्रपति बराबर टैरिफ़ लगाने की बात कही है.
बिस्वजीत धर व्हाइट हाउस की ओर से रेसिप्रोकल टैरिफ़ पर जारी एक फैक्ट शीटका ज़िक्र करते हैं.
इस फैक्ट शीट में लिखा गया है, “अमेरिका जिन देशों को मोस्ट फ़ेवर्ड नेशन (एमएफ़एन) का दर्जा देता है, उनके कृषि उत्पादों पर औसतन 5 फ़ीसदी टैरिफ़ लगाता है. लेकिन भारत जिन देशों को एमएफ़एन का दर्जा देता है, उनके कृषि उत्पादों पर 39 फ़ीसदी टैरिफ़ लगाता है.”
“भारत अमेरिकी मोटरसाइकिलों पर भी 100 फीसदी टैरिफ़ लगाता है, जबकि अमेरिका भारतीय मोटरसाइकिलों पर केवल 2.4 फ़ीसदी टैरिफ़ लगाता है.”

अमेरिका का सबसे ज़्यादा व्यापारिक घाटा चीन के साथ है. अमेरिका के कुल व्यापारिक घाटे में 24.7 फ़ीसदी हिस्सा चीन का है. भारत की अगर बात करें तो यह महज 3.8 फीसदी ही है.
भारत द्वारा अमेरिका को निर्यात किए जाने वाले उत्पाद मुख्यतः 30 क्षेत्रों से हैं. इसमें से छह कृषि और 24 उद्योग क्षेत्र में आते हैं. आइए जानते हैं कि इन क्षेत्रों पर टैरिफ़ का क्या प्रभाव पड़ेगा.
भारत अमेरिकी वस्तुओं पर सबसे ज़्यादा टैरिफ़ लगाने वाले देशों में शामिल है. भारत आयात पर सर्वाधिक औसतन 17 फ़ीसदी टैरिफ़ लगाता है. वहीं अमेरिका का टैरिफ़ 3.3 फीसदी ही है.
इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में साल 1990-91 तक औसत टैरिफ़ दर 125% तक था. उदारीकरण के बाद यह कम होता चला गया. साल 2024 में भारत की औसत टैरिफ़ दर 11.66% थी.
द हिन्दू की रिपोर्ट के मुताबिक़, भारत सरकार ने टैरिफ़ के 150%, 125% और 100% वाली दरों को समाप्त कर दिया है. ट्रम्प के दोबारा राष्ट्रपति बनने के बाद भारत सरकार ने टैरिफ़ रेट में बदलाव किया. अब भारत में सबसे ज्यादा टैरिफ़ रेट 70% है.
भारत में लग्जरी कार पर 125% टैरिफ़ था, अब यह 70% कर दिया गया है. ऐसे में साल 2025 में भारत का एवरेज टैरिफ़ रेट घटकर 10.65% हो चुका है. आमतौर पर हर देश टैरिफ़ लगाते हैं लेकिन अन्य देशों की तुलना में भारत सबसे ज़्यादा टैरिफ़ लगाने वाले में से एक है.
अमेरिका में दवा होगी महंगी तो भारत में रोज़गार होगा कम
ट्रंप का टैरिफ़ भारतीय फ़ार्मा कंपनियों के लिए बहुत ही बड़ा झटका साबित हो सकता है. व्यापार अनुसंधान एजेंसी जीटीआरआई के मुताबिक़ फ़ार्मास्यूटिकल क्षेत्र भारत का सबसे बड़ा औद्योगिक निर्यात है.

भारत हर साल अमेरिका को करीब 12.7 अरब डॉलर की दवाइयां निर्यात करता है, जिस पर उसे लगभग कोई कर नहीं देना पड़ता.
हालांकि, भारत आने वाली अमेरिकी दवाओं पर 10.91% शुल्क देना पड़ता है. इससे 10.91% का “व्यापार अंतर” रह जाता है.
भारत पर लगने वाले इस टैरिफ़ के कारण लाखों अमेरिकियों पर मेडिकल बिलों का बोझ बढ़ सकता है.अमेरिका में बिकने वाली लगभग आधी जेनेरिक दवाइयाँ अकेले भारत से आती हैं. जेनेरिक दवाइयाँ ब्रांड वाली दवाओं का सस्ता संस्करण होती हैं.
अमेरिका में ऐसी दवाइयाँ भारत जैसे देशों से आयात की जाती हैं और 10 में से 9 प्रिस्क्रिप्शन इन्हीं दवाओं के होते हैं.
इस क्षेत्र पर 10.9 फ़ीसदी टैरिफ़ लगाए जाने की आशंका बनी हुई है. इससे अमेरिका में दवाएं महंगी हो जाएंगी. महंगी दवाओं के कारण निर्यात में कमी आएगी और इससे भारतीय फ़ैक्ट्रियों में उत्पादन घटेगा. भारत में इसका सीधा असर रोजगार पर पड़ेगा.
इससे वॉशिंगटन को स्वास्थ्य सेवा लागत में अरबों डॉलर की बचत होती है. कंसल्टिंग फ़र्म आईक्यूवीआईए के एक अध्ययन के अनुसार, 2022 में, भारतीय जेनेरिक दवाओं से 219 अरब डॉलर की बचत हुई.
डोनाल्ड ट्रंप के टैरिफ़ के कारण जेनेरिक दवाइयां बनाने वाली कुछ भारतीय कंपनियों को बाज़ार से बाहर निकलने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है. इससे अमेरिका में मौजूदा दवा की कमी और भी बढ़ सकती है.
फ़ार्मा बाज़ार विशेषज्ञ अजय बग्गा ने बीबीसी से बातचीत में कहा, “भारत में अमेरिकी दवाओं का निर्यात मुश्किल से आधा अरब डॉलर है, ऐसे में उन पर इसका असर न के बराबर होगा.”
यही वजह है कि भारत की सबसे बड़ी दवा निर्माता कंपनियों के समूह आईपीए ने भी अमेरिकी दवा निर्यात पर शून्य शुल्क करने की सिफ़ारिश की है. जिससे रेसिप्रोकल टैरिफ़ का भारत पर नकारात्मक प्रभाव न पड़े.
गहना सस्ता और मोबाइल होगा महंगा
भारत से अमेरिका को 11.88 अरब डॉलर का सोना, चांदी और हीरा निर्यात होता है. ट्रंप इस क्षेत्र में 13.32 फ़ीसदी टैरिफ़ लगाने जा रहे हैं.
इसका असर यह होगा कि भारत में गहने और महंगे आभूषण सस्ते हो जाएंगे.
यह आभूषण अगर अमेरिका में कोई खरीदेगा तो उसे यह महंगा पड़ेगा. इस क्षेत्र में निर्यात कम होने पर इसका असर छोटे कारीगरों और कारोबारियों पर पड़ सकता है.
भारत अमेरिका को 14.39 अरब डॉलर के मोबाइल, टेलीकॉम और इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस बेचता है. इस पर 7.24% टैरिफ़ बढ़ने की आशंका है.
इससे आईफ़ोन और अन्य मोबाइल उपकरण महंगे हो सकते हैं. कई मोबाइल उपकरण भारत में भी महंगे हो सकते हैं.
वहीं भारत से अमेरिका को 4.93 अरब डॉलर का कपड़ा निर्यात होता है.अमेरिका पहले इस पर टैक्स ज़्यादा लेता है तो ऐसे में रेसिप्रोकल टैरिफ़ से अमेरिका में कपड़ा सस्ता हो सकता है.
फ़ुटवियर क्षेत्र को 15.56 प्रतिशत के उच्च टैरिफ़ अंतर का सामना करना पड़ सकता है.
महंगा हो जाएगा झींगा
भारत विश्व का आठवां सबसे बड़ा कृषि उत्पाद निर्यातक देश है. ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (जीटीआरआई) के अनुसार, भारत में अमेरिकी कृषि उत्पादों पर लगाया जाने वाला औसत टैरिफ़ 37.7% है, जबकि अमेरिका में भारतीय कृषि उत्पादों पर यह 5.3% है.
भारत और अमेरिका के बीच द्विपक्षीय कृषि व्यापार मात्र 800 करोड़ रुपए का है. भारत मुख्य रूप से चावल, झींगा, शहद, वनस्पति अर्क, अरंडी का तेल और काली मिर्च का निर्यात करता है, जबकि अमेरिका बादाम, अखरोट, पिस्ता, सेब और दालें भेजता है.
भारत अमेरिका को 2.58 अरब डॉलर का सी फ़ूड निर्यात करता है. अमेरिका इस पर 27.83 प्रतिशत तक टैरिफ़ लगा सकता है.
इस क़दम से अमेरिका में झींगा महंगा हो जाएगा. निर्यात कम होने से भारत में यह सस्ता मिल सकता है. इस क्षेत्र में लोगों की आमदनी कम हो जाएगी.
चीनी, प्रोसेस्ड फूड और कोको पर 24.99 प्रतिशत टैरिफ़ का अनुमान है. इसके कारण अमेरिका में भारतीय मिठाइयां और स्नैक्स महंगे हो जाएंगे.
डेयरी उत्पादों में 38.23 प्रतिशत टैरिफ़ अंतर से 181.49 मिलियन डॉलर का व्यापार बहुत बुरी तरह प्रभावित होगा.
घी, मक्खन और दूध पाउडर महंगे हो जाएंगे और उनका बाज़ार हिस्सा कम हो जाएगा. भारत में यह सस्ता हो सकता है.
खाद्य तेल क्षेत्र पर 10.67 प्रतिशत टैरिफ़ लगाने की तैयारी है. इसके कारण नारियल और सरसों तेल की लागत बढ़ जाएगी. इसका असर सरसों और नारियल उत्पादन करने वाले किसानों पर पड़ेगा.
इससे भारत में सरसों और नारियल की क़ीमतें गिर सकती हैं. इससे सीधे तौर पर किसानों की आय प्रभावित होगी.
टैरिफ़ बढ़ोतरी का सीधा असर उत्पादन पर पड़ेगा और उत्पादन में कमी आने पर रोज़गार में भी कमी आएगी. इससे कहीं न कहीं पूरा अर्थचक्र प्रभावित होगा.
भारत अगर ट्रंप के टैरिफ़ का जवाब देता है तो बादाम, अखरोट और सोयाबीन जैसी कई वस्तुएं भारत में महंगी हो सकती हैं.
टैरिफ़ का अमेरिका पर क्या असर होगा?
अर्थशास्त्रियों ने चेतावनी दी है कि टैरिफ़ से अमेरिकी उपभोक्ताओं के लिए क़ीमतें बढ़ेंगी और आयात होने वाले सामान से अमेरिकी कंपनियों के लिए उत्पादन लागत में बढ़ोतरी होगी.
उन्होंने ये भी चेतावनी दी है कि अन्य देशों के जवाबी टैरिफ़ लगाने से अमेरिकी निर्यातकों को नुकसान होगा.
मूडीज़ एनालिटिक्स का कहना है कि टैरिफ़ की वजह से आने वाले साल में अमेरिका की इकोनॉमी में 0.6 प्रतिशत की गिरावट होगी और इसकी वजह से ढाई लाख नौकरियां जाएंगी.
मूडीज़ एनालिटिक्स ने कहा है कि कनाडा और मैक्सिको अपने आयात के लिए अमेरिका की मार्केट पर निर्भर हैं और उन्हें इसकी भारी क़ीमत चुकानी होगी और मंदी से बच पाना नामुमकिन होगा.
ट्रंप क्यों लगा रहे टैरिफ़?
राष्ट्रपति ट्रंप ने टैरिफ़ को अपनी इकोनॉमिक पॉलिसी के केंद्र में रखा है. वो अमेरिका में ट्रेड बैलेंस लाना चाहते हैं और अमेरिका के आयात और निर्यात के गैप को कम करना चाहते हैं.
साल 2024 में अमेरिका करीब 900 अरब अमेरिकी डॉलर के व्यापार घाटे में था.
चार मार्च को ट्रंप ने अमेरिकी कांग्रेस में कहा था, “अभी तक पृथ्वी पर मौजूद हर देश ने हमें दशकों तक लूटा है. लेकिन अब हम आगे ऐसा नहीं होने देंगे.”
ट्रंप कहते हैं कि लंबे समय में टैरिफ़ से अमेरिका की निर्माण क्षमता में इज़ाफ़ा होगा और नौकरियां बचेंगी. इसके साथ ही टैक्स रेवेन्यू और इकोनॉमिक ग्रोथ में इज़ाफ़ा होगा.
उन्होंने कहा है कि टैरिफ़ से अमेरिकी सरकार का राजस्व बढ़ेगा और टैरिफ़ की वजह से विदेशी कंपनियां अमेरिका में सामान बनाएंगी.
ट्रंप ने 24 मार्च को घोषणा की कि दक्षिण कोरिया की कार कंपनी हुंडई अमेरिका में 21 अरब डॉलर का इन्वेस्टमेंट कर रही है. उन्होंने दावा किया कि टैरिफ़ की वजह से वो अपने ऑपरेशन को अमेरिका में शिफ्ट कर रही है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की रिपोर्ट से साभार