
–अरुण माहेश्वरी
कल आधी रात में डोनाल्ड ट्रंप ने 2 अप्रैल को अमेरिका की मुक्ति का दिन घोषित किया है। सवाल है कि दुनिया की यह सबसे बड़ी महाशक्ति किससे मुक्त हुई है? यह सवाल जितना स्वाभाविक है, उतना ही भयानक भी। ट्रंप की टैरिफ घोषणाएँ व्यापार नीति की बात नहीं, एक मानसिकता की सार्वजनिक उद्घोषणा हैं, जो यह मान कर चलती है कि मनुष्य मूलतः स्वार्थमूलक होता है, और जीवन की गति केवल टकरावों से संचालित होती है।
कल आधी रात में डोनाल्ड ट्रंप ने 2 अप्रैल को अमेरिका की मुक्ति का दिन घोषित किया है। सवाल है कि दुनिया की यह सबसे बड़ी महाशक्ति किससे मुक्त हुई है? यह सवाल जितना स्वाभाविक है, उतना ही भयानक भी।
ट्रंप की निगाह में यह मुक्ति किसी आर्थिक निर्भरता से नहीं, बल्कि वास्तव में सभ्यता के बंधनों से मुक्ति है—न्याय और सहकार के विचार से, मानव जीवन के शील से, उस सामाजिक भावना से जो मनुष्य को पशु से भिन्न बनाती है। यह वस्तुतः पाशविक शक्ति की मुक्ति है ।
यह एक ऐसी स्वतंत्रता है जिसमें कोई नैतिक उत्तरदायित्व नहीं, केवल प्रभुत्व और नियंत्रण की इच्छा है।
ट्रंप की टैरिफ घोषणाएँ व्यापार नीति की बात नहीं, एक मानसिकता की सार्वजनिक उद्घोषणा हैं, जो यह मान कर चलती है कि मनुष्य मूलतः स्वार्थमूलक होता है, और जीवन की गति केवल टकरावों से संचालित होती है।
यह सोच सहयोग की हर संभावना को अस्वीकार कर, उसे एक नैतिक भ्रम की तरह देखती है। और जब यह सोच अमेरिका जैसी किसी वैश्विक शक्ति की नीति बन जाती है, तो वह पूंजीवाद का वैसा बर्बर रूप ले सकती है जिसे कम्युनिस्ट नेता जार्ज दिमित्राव ने फासीवाद का क्लासिक रूप कहा था।
टैरिफवाद अब कोई अर्थनीति नहीं रहा—वह एक घोषित रणनीति है, जो व्यापार को सैनिक युद्धों के स्थान पर रखकर, उसे उन्हीं उद्देश्यों का औजार बना देती है।
जैसा कि हेगेल ने कहा था, शब्द वस्तुओं की सत्ता का अंत कर देते हैं, लेकिन उन्हें एक सर्वकालिक सत्य में रूपांतरित भी कर देते हैं।
टैरिफवाद सैनिक युद्धों का वैसा ही शाब्दिक रूपांतरण है—वस्तु का अंत, नाम का स्थायीकरण। यह ‘ट्रेड वॉर’ अब केवल एक मुहावरा नहीं, एक सर्वमान्य यथार्थ बन चुका है।
ट्रंप के टैरिफवाद की सफलता की एकमात्र गारंटी अमेरिका की सैन्य शक्ति है। यही बात इसे खतरनाक बनाती है।
यह कोई अंत नहीं, बल्कि युद्ध के अधिक नग्न और बर्बर रूपों में प्रवेश की शुरुआत है।
युद्ध अब न केवल मिसाइलों, बल्कि टैक्स, डेटा, पेटेंट और सप्लाई चेन से लड़े जाएँगे। वे एलान के साथ शुरू नहीं होंगे—बल्कि खुले आम, चरणबद्ध रूप से, लोकतंत्र के भीतरी तंतुओं को क्षीण करते हुए आगे बढ़ेंगे।
जैसे प्रथम विश्वयुद्ध के बाद द्वितीय विश्वयुद्ध में विरोधी शक्तियों के समुच्चयों में बड़े बदलाव आए थे । राष्ट्रों की नई भूमिकाएँ, नई संधियाँ, नए विश्वासघात देखने को मिले थे । वैसे ही आगामी युद्ध, यदि वह होता है, तो अपने साथ ऐसी पुनर्रचनाएँ लाएगा, जिनकी अभी केवल आहट मिल रही है।
यह भी संभव है कि इस बार कोई हिटलर किसी गठबंधन का इंतज़ार न करे, अकेला ही विश्व-विजय के अभियान पर निकल पड़े। बाद में उसके अभियान जो जुड़ेंगे, जुड़ जायेंगे । बाक़ी सब कुचले जायेंगे ।
इस स्थिति में तथ्यों का भाषा से अधिक तीखा होना स्वाभाविक है।
कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने अमेरिकी टैरिफ़ों के जवाब में काउंटर-मेज़र्स लागू करने की घोषणा कर दी है। यूरोपीय संघ ने अमेरिकी आयात पर 20% टैक्स को “अनुचित और विध्वंसक” बताते हुए चेताया है कि यह यूरोपीय नौकरियों और मुद्रास्फीति के लिए घातक है। चीन ने ताइवान के निकट सशस्त्र सैन्य अभ्यास करते हुए स्पष्ट किया है कि वह अब हर ‘संभावित लड़ाई’ के लिए पूरी तरह तैयार है।
इन घटनाओं को केवल राजनीतिक असहमति कह कर नहीं टाला जा सकता। यह वही क्षण है जिसमें सभ्यता का केंद्र एक बार फिर पुनर्रचना और टकराव के दौर में प्रवेश करता है।
इसलिए ज़रूरी है कि हम टैरिफवाद को केवल आर्थिक नीति न समझें, बल्कि एक वैचारिक युद्ध की घोषणा के रूप में भी पढ़ें।
यह व्यापार की नहीं, विचार की भी लड़ाई है। और यदि हम इसे कर-नीति मानकर अनदेखा करते रहे, तो यह युद्ध को धीरे-धीरे सामान्य, आवश्यक और नैतिक घोषित कर देगा।
यही वह बिंदु है जहाँ हमें सबसे अधिक सतर्क होने की आवश्यकता है। क्योंकि एक बार जब स्वार्थ को सार्वभौम मूल्य मान लिया जाता है, तब वह किसी भी हिंसा को उचित ठहरा सकता है।