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:फ्रांसीसी कथाकार मोपांसा (1850.1893) को आधुनिक कहानी का पिता माना जाता है. कहते हैं मोपासां ने कहानियों में जीवन की धड़कन भरी. उसे मानव स्वभाव के करीब लेकर आये. उनका पूरा नाम आनरे रेना आल्बेर गे द मोपांसा था. मोपासां की कहानी ‘द ऑर्फ़न’ का हिंदी अनुवाद -“अनाथ”
सच प्रिय, मैं सोचती हूं कि ऐसे गर्म मौसम में बाहर घूमने जायें। लगता है तुम पागल ही हो गए हो, पिछले दो महीनों से तुम्हारे दिमाग में यही फितूर घूम रहा है, तुम मुझे जबर्दस्ती समुद्र के किनारे घसीट के ले गईं जबकि अपने वैवाहिक जीवन के पिछले 45 वर्ष में तुमने पहले कभी इसके लिए सोचा तक नहीं।
अब तुम इतनी उतावली हो रही हो, तुम पहले कभी उकसायी नहीं जा सकी हो कि साल के सबसे गर्म दिन में इस तरह खेतों में टहलना चाहती हो। आप अपने दोस्त डी० एपरेबल से कहो कि वह आपके साथ जाए क्योंकि वह ही आपकी झक में शामिल है। जहां तक मेरा सवाल है मैं तो आराम करूंगा।
मादाम डी० काडोर अपने दोस्त की ओर मुड़ीं। “क्या आप मेरे साथ चल रहे हैं डी० एपरेवल?”
उसने सर झुकाया, मुस्कराया और बहुत दुनियादारी में जवाब दिया-“जहां तुम जाओगी, वहां मैं आऊंगा।” उसने कहा।
“अच्छा है, जाओ भी, लू भी लगवाओ।”- मिस्टर काडोर ने कहा और होटल के कमरे में पुनः घुस आया-पलंग पर घन्टे-दो-घन्टे आराम करने के लिए।
जैसे ही वे अकेले हुए-वो बूढ़ी औरत और उसका पुराना साथी दोनों निकल पड़े। उसने उसके हाथों में हाथ लिया और प्यार से कहा-
“आखिर में, आखिर में तुम पागल ही हो गयी हो” वह धीरे से बुदबुदाया, “मैं तुमको कैसे यकीन दिलाऊं कि तुम पागल हो गयी हो, खतरे की तो सोचो… यदि वह आदमी…”
“ओ हेनरी-उसको आदमी मत कहो ।”
वह चुपचाप धीरे-धीरे बोलता रहा- “यदि हमारे लड़के को कुछ पता लग गया, यदि वो हम पर शक करने लगा। यदि वो तुम्हें देख ले या हम दोनों को साथ-साथ देख ले ! पिछले चालीस सालों से तुम सब कुछ करती चली आ रही हो बगैर उसका ख्याल किये। फिर अब तुम्हारे साथ क्या बात है?”
समुद्र से शहर की ओर जाने वाली लम्बी सड़क पर वे चल रहे थे। वे एक पहाड़ी पर चढ़ने के लिए दाहिनी ओर मुड़े। चमकती धूप की लपटों में सफेद सड़क अपने आप मुड़ रही थी। कड़ी धूप में छोटे-छोटे कदमों से वे धीरे-धीरे चल रहे थे। उसने अपने दोस्त के हाथ अपनी बांहों में डाल रखे थे और सीधी निगाह रखे वह आगे-ही-आगे बढ़ी जा रही थी।
“तो तुमने उसे फिर कभी नहीं देखा?” – वह बोली।
“नहीं, कभी नहीं।”
“क्या यह सम्भव है?”
“प्रिय, तुम अब उन गुजरी बातों को फिर से नहीं छेड़ो।”
“मेरी एक पत्नी है, एक लड़का है; जैसे तुम्हारा पति। तुम, हम सबके पास दुनियादारी से डरने के लिए कुछ-ना-कुछ है।”
वह खामोश रही। वह अपनी बीती हुई जिंदगी के बारे में सोच रही थी। अपनी जवानी के दिनों को याद कर रही थी।
उसका विवाह उसके घरवालों ने कर दिया था। जैसे सभी विवाह योग्य लड़कियों का हो जाता है। वो शायद ही कुछ अपने पति के बारे में जानती थी, जो किसी विदेश सेवा में अधिकारी था। जिसके साथ, बाद में उसने एक संभ्रांत फैशनेबल औरत की तरह जीवन बिताया।
उसके बाद एक खूबसूरत नौजवान डी० एपरेवल जो उसी की तरह विवाहित था, उसके प्यार के चक्कर में पड़ गया और मिस्टर काडोर जब वे अपने राजनैतिक प्रवास में भारत गए थे तो उनकी लम्बी अनुपस्थिति में उसके सामने समर्पित हो गयी थी।
क्या वह अपने को रोक सकती है? क्या वह अपने को झुठला सकती है? क्या उसके पास इतना साहस और आत्मबल था कि वह अपने आपको समर्पित ना करने से रोक सके? उसे भयानक गहरी त्रासदी भोगनी होती। यह सम्भवतः असहनीय होता। जीवन कितना छलपूर्ण और क्रूर है! क्या हम उत्तेजनाओं से विमुख हो सकते हैं या भाग्य के लिखे को मेट कर सकते हैं?
किस तरह एक अकेली उपेक्षित, प्यार से वंचित, संतानहीन लगातार उसके अंदर सुलगने वाली कामनाओं से भाग सकती है-यह ऐसे ही कठिन है, मानो सूरज की धूप से बचकर किसी को जीवन के गहन अंधकार के अंत में रहना हो।
अब वह किस तरह आसानी से छोटी-छोटी बातों को याद कर रही थी! उसका प्यार, उसकी निछावर होने वाली मुस्कराहटें, दरवाजे पर उसका रुककर निहारना। जब भी वो छुट्टियों में घर लौटता था-क्या सुखद दिन थे, परन्तु बहुत क्षणिक जो बहुत ही जल्दी समाप्त हो गए।
उसके बाद उसे मालूम हुआ कि वो मां बनने वाली है। कितना बड़ा मानसिक कष्ट था! ओह, दक्षिण की लम्बी कठिन यात्रा, उसके अपने क्लेश, उसके अपने अपरिमित भय, समुद्र के किनारे एक छोटे-से मकान में उसका अकेले रहना। एक बगीचे में कैद जिसके आगे जाने की कभी हिम्मत नहीं कर सकी वो। कितनी अच्छी तरह से उसे याद है कि जब वो लम्बे उदास दिन संतरों के पेड़ के नीचे लेटकर बिताती थी। हरे पत्तों के झुरमुट में खिले हुए फलों पर उसकी निगाहें लगी रहती थीं। उसका मन बाहर घूमने का होता, लगता समुद्र के किनारे हो आये। उसकी भीगी भीगी सुगन्ध दीवारों को फांदकर उस पर छा जाती थी, जिसकी छोटी-छोटी लहरों का संगीत उसने किनारे पर सुना था। वो कल्पनाओं में खो जाती है, सूर्य की सुनहरी किरणों के सामने अथाह समुद्र का नीला धरातल डूबते हुए देखना, जिसके चारों ओर पहाड़ मानो गोटा लगाये हो, परन्तु वो कभी भी मुख्य द्वार के बाहर जाने की हिम्मत नहीं कर सकी। मान लो, यदि वह पहचान ली गयी हो? ऐसी हालत में उसको अपने बढ़े हुए शरीर से ही शर्म आने लगी थी।
और प्रतीक्षा के अंतिम दिन, आखिरी कुछ दुःख के दिन, वो अप्रत्याशित डर, वो डरावना दर्द और फिर वो भयानक रात, कैसे क्या दुख उसने झेले थे, भोगे थे।
कैसी थी वो रात, कैसे वो कराही थी, चीखी थी, चिल्लायी थी। वो अपने प्रेमी का मुरझाया, उतरा हुआ पीला पड़ा चेहरा अब भी याद कर सकती थी। जो हर मिनट उसके हाथों को चूम रहा था, डॉक्टर से मिलने वाला हौसला, नर्स के सिर पर बंधा हुआ सफेद स्याल…
और बच्चे के कोमल, धीमे क्रन्दन को सुनकर उसने हृदय में कितनी हलचल अनुभव की थी। एक नवजात जीव की पहली कोशिश ।
और उसके बाद… उसके बाद। अपने जीवन का वही एक दिन जब उसने अपने बच्चे को देखा, प्यार किया, दुलारा, उसके बाद वो कभी जी भरकर उसे देख ना पायी।
फिर, फिर उसके बाद लम्बा उदास, वीरान जीवन, उस बच्चे का ख्याल, हमेशा उसके मस्तिष्क के कोनों में गूंजता रहा। वो उसको फिर कभी देख ही नहीं पायी। उस छोटे बच्चे को जो उसके खून और मांस का अंश था। उसका अपना बेटा।
उसे सिर्फ इतना मालूम था कि वो दूर किसी देहात के ग्रामीणों के बीच पल-पोस रहा है। वो खुद भी अब किसान हो गया है। अब उसकी शादी हो गयी है। उसे अपने ससुर से जिसका उसे नाम भी नहीं मालूम, ढेर सारा दहेज मिला है।
पिछले चालीस सालों में कितनी बार उसने इच्छा नहीं की कि वो जाये और उसे देख आये, उसे प्यार कर आये। उसने उसको कभी बढ़ा हुआ नहीं माना। उसको उस पर हमेशा तरस ही आया, जिसे एक दिन उसने अपनी गोद में उठाया था और सीने से लगाया था।
कितनी बार उसने अपने प्रेमी से कहा था- “मैं अब अपने आपको और नहीं रोक सकती मुझे अब उसे देखना ही चाहिए। मैं जा रही हूं उससे मिलने। हर बार उसने उसे मना कर दिया, रोक लिया। वो नहीं जानती थी कि किस प्रकार अपने को संतुष्ट रखे, अपनी भावनाओं पर काबू रखे। उसका लड़का यह सब समझ जायेगा और रहस्य का उद्घाटन कर देगा यह टूट जायेगी।”
“वह अब कैसा है?” उसने पूछा।
“मैं नहीं जानता, मैं फिर कभी उससे मिला नहीं।”
“क्या यह संभव है, कि तुम्हारा एक लड़का हो और तुम उसे जानों नहीं, उससे डरो, जिसे तुम कलंक की तरह छोड़ दो।”
“यह एक भयानक सच था।”
तेज झुलसती धूप में कुम्हलाये वे अब भी चुपचाप लम्बी सड़क पर धीरे-धीरे चल रहे थे। अब वो ऊंची होती जा रही चढ़ाई नाप रहे थे।
यह एक तरीके से आखिरी निर्णय है-वह लगातार बोलती जा रही थी- “मुझे फिर कभी दूसरा बच्चा नहीं हुआ। उसे देखने की लालसा से मैं अब नहीं लड़ सकती हूं। पिछले चालीस सालों से यह बात मुझे साल रही है। एक आदमी, यह सब कुछ नहीं समझ सकता है। याद रखो, मैं मृत्यु के बहुत करीब हूं…। और फिर, मैं उसे देख नहीं पाऊंगी।”
फिर कभी नहीं… क्या यह सम्भव है? कैसे मैं अभी तक प्रतीक्षा करती रही। सारा जीवन मैंने उसको याद किया और यह सोचना मुझको किस तरह भारी पड़ा है। एक बार ही नहीं, एक बार भी नहीं चौंकी उसके पहले विचार से, मेरे बच्चे की याद से।
वो अब कैसा है? ओह, मैं अपने आपको उसके सामने कितनी अपराधिनी अनुभव करती हूं। क्या दुनियादारी से कोई इतना डरता है?
सबकी परवाह किये बगैर उसे अब स्वीकार लेना है। उसे अपने पास रखकर पालना-पोसना था। प्यार करना था, मैं डरपोक थी, कमजोर थी। कितना भोगी हूं मैं ओह वो गरीब, ठुकराये हुए जीव, वो अपनी मांओं से कितनी घृणा करते होंगे। एकाएक वो रुक गयी। उसका गला रुंध गया, वो आंसुओं में डूब गयी।
सूरज की तेज तपती धूप से सारी घाटी सुनसान और मौन थी। सड़क के किनारे हरी घास पर कुछ पक्षी बीच-बीच में तीखी आवाज में चीख रहे थे।
“थोड़ी देर के लिए बैठ जाओ।” वह बोला।
उसने उसे हाथ पकड़कर, एक गड्ढे के किनारे बैठने दिया। वो घास पर असहाय-सी बैठ गयी और दोनों हथेलियों से अपना मुंह ढांप लिया। उसके सफेद
घुंघराले बाल, उसके चेहरे के दोनों ओर गिर आये थे, वो छितरा गए थे। वह अपने असहनीय दुःख से दुःखी बहुत रोयी।
वो चुपचाप हत्प्रभ बगैर यह समझे कि वह उसे कैसे और क्या ढांढस बंधाये-उसके सामने मूक खड़ा रहा।
“आओ, संभालो अपने आपको, साहसी बनो।” उसने कहा।
“मैं बनूंगी।” अपने पैरों पर खड़े होते हुए उसने कहा। उसने अपनी आंखें पोंछीं और एक बूढ़ी लाचार औरत के डगमगाते कदमों से चल पड़ी।
थोड़ा और आगे चलकर पेड़ों का एक बड़ा झुण्ड, अपने झुरमुट में बहुत-से मकानों को छिपाये हुए था। अब वे लुहार के लगातार घन पीटने की आवाज साफ सुन सकते थे। जल्दी ही उन्होंने देखा कि दाहिनी ओर एक छोटे-से मकान के सामने एक बैलगाड़ी आकर रुकी। एक छत के नीचे दो आदमी एक घोड़े की नाल ठोक रहे थे।
मिस्टर डी० एपरेवल उनके पास गया।
“क्या आप बता सकते हैं पियरे बेन्डिक्ट का खेत कौन-सा है?”
“आप बायीं सड़क ले लीजिये। छोटी सराय के पास से, दाहिनी ओर मुड़कर सीधे चलते जाइये। एक छोटी-सी बाडी के बाद उसका तीसरा मकान है। उस मकान की बाडी पर पाइन के पेड़ खड़े हैं। आपको पहचानने में धोखा नहीं होगा।”
वे बायीं ओर मुड़ गए। वह बहुत धीमी चाल से चल रही थी। उसके पांव कांप रहे थे। उसका दिल इतनी जोर से धड़क रहा था कि उसे लगा कि उसकी सांसें उखड़ रही हैं और उसे सांस लेने में तकलीफ हो रही है। हर कदम पर वह कुछ बड़बड़ा रही थी-मानो प्रार्थना कर रही हो-हे ईश्वर…! हे ईश्वर…!
भावावेग से उसका गला रुंध गया। उसने अपने आपको लड़खड़ाने से संभाला। मानो उसकी मांसपेशियां जकड़ गयी हों।
मिस्टर डी० एपरेवल जो खुद भी भय से पीला और नर्वस हो गया था ने झल्लाकर कहा- – “अगर “अगर तुम अपने आपको अच्छी तरह रोक नहीं सकती हो तो हम दोनों को धोखा होगा। अपने आपको संयत रखो, अपनी भावनाओं पर काबू रखो।’
“मैं कैसे अपने आपको काबू में रख सकती हूं! मेरा बच्चा… जब मैं कल्पना करती हूं कि अपने बच्चे को देखने जा रही हूं।” उसने लगभग हकलाते हुए कहा।
उन्होंने, एक खेत से दूसरे खेत को अलग करने वाली मेंड को पकड़ा जो दोनों ओर बड़ी-बड़ी झाड़ियों की दोहरी कतारों से घिरी थी।
अचानक दोनों ने अपने आपको एक दरवाजे के सामने पाया जो पाइन के पेड़ों की छाया में था।
“यह है वो घर।” वह बोला।
वह रुक गयी और चारों ओर देखने लगी।
सामने के खुले हिस्से में सेब का बगीचा था और सेब के पेड़, दूर घास-फूस से ढंकी झोंपड़ी तक चले गए थे। उसके सामने एक अस्तबल था। जानवरों के बांधने का स्थान था। गौशाला थी। मुर्गियां यहां से वहां दौड़ रही थीं। एक पत्थर की चीप से ढंके ट्रैक्टर, बैलगाड़ी, एक ट्रॉली आदि खड़ी थीं। चार बछड़े हरी दूब चर रहे थे, जिस पर पेड़ों की छाया थी। आंगन में चारों ओर मुर्गियां मटरगश्ती कर थीं। शाश्वत शांति थी। घर का दरवाजा खुला पड़ा था, पर कोई दिखाई नहीं दे रहा था।
वे आंगन, खेत में घुसे। दरवाजे के पास एक ताले पर चार मधुमक्खियां गोला लगाये बैठी थीं।
मकान के सामने रुककर महाशय डी० एपरेवल ने आवाज लगायी-“कोई है घर में?”
एक बच्ची बाहर निकली। कोई दस साल की रही होगी जो ब्लाउज और लहंगा पहने थी। उसके पांव नंगे और गंदे थे। वो अजीब-सी सनकी और सहमी लग रही थी। वह अब भी देहरी पर खड़ी थी। मानो वो मेहमानों को घुसने से रोकने के लिए खड़ी थी।
“क्या चाहते हैं आप?” उसने प्रश्न किया।
“क्या तुम्हारे पिता घर में हैं?”
“नहीं।”
“कहां है वे?”
“मुझे नहीं मालूम।”
“और तुम्हारी मां?”
“वो गायों के पास हैं।”
“क्या वो जल्दी लौट आयेंगी?”
“मुझे नहीं मालूम।”
वो थोड़ा घबरा के चिल्ला पड़ी, मानो जबर्दस्ती उसको वहां से ढकेला जा रहा हो।
“मैं बगैर उससे मिले यहां से नहीं जाऊंगी।”
“प्रिय, हम यहां रुकेंगे, प्रतीक्षा करेंगे।”
जैसे ही वे मुड़े और एक ग्रामीण औरत को देखा जो घर की ओर ही आ रही थी। उसके हाथ में बड़े-बड़े दूध के दो डिब्बे थे, जो समय-समय पर धूप से चकाचौंध परिवर्तित कर रहे थे।
उसके दाहिने पैर में लंगड़ाहट थी और उसका सीना धूप और बारिश के धब्बों से बदरंग हुए ऊनी स्वेटर में कसा था। वह एक गन्दी, आलसी नौकरानी की तरह लग रही थी।
“यह है मां।” बच्ची चहकी।
जब मां घर के पास पहुंची तो उसने मेहमानों पर उपेक्षित, उचटती, शंका-भरी नजर फेंकी। उसके बाद वो घर में घुस गयी, मानो उसने आये हुए लोगों को देखा ही न हो। वह बुजुर्ग दिखाई दे रही थी। उसका चेहरा अलसाया, बीमार और लकड़ी की तरह शुष्कहीन, भावहीन था।
मिस्टर डी० एपरेवल ने उसे पुनः आवाज दी-
“मैं कह रहा था, हम यह पूछने आये थे कि हमें दो गिलास दूध बेचोगी?”
“मैं दूध नहीं बेचती ।”
“हम लोग बहुत प्यासे हैं। मेरी साथिन बहुत बूढ़ी है, थकी है, क्या उसको पीने के लिए कुछ नहीं मिल सकता?”
उस देहाती औरत ने अजीब नजरों से उन दोनों को घूरा। आखिर वो तैयार हो गयी।
“अब आप लोग यहां आ ही गए हैं तो मैं आप लोगों का कुछ-ना-कुछ तो जरूर करूंगी।” यह कहते हुए वह फिर घर के अन्दर गायब हो गयी।
उसके बाद वह बच्ची, हाथ में दो कुर्सियां साथ लेकर बाहर आयी।
सेब के पेड़ के नीचे उन्हें बिठा दिया। उसके बाद मां आयी। हाथों में झाग से भरे दो ग्लास लेकर और उन्हें आये मेहमानों के हाथ पर रख दिये।
वह लगातार मेहमानों के सिर पर खड़ी थी। मानो वह उन दोनों पर नजर रख रही थी और उनके आने का मकसद जानना चाहती हो।
“आप लोग कैम्प से आये हैं?”
“हां।” मिस्टर डी० एपरेवल ने उत्तर दिया- “हम लोग यहां गर्मी की छुट्टियां बिताने आये हैं।” फिर कुछ रुककर कहा-
“क्या प्रति सप्ताह आप हमको नियमित रूप से मुर्गियां बेच सकेंगी?”
वो थोड़ा असमंजस में रही, फिर बोली- “शायद मैं दे सकूं।”
“क्या आपको ताजे बच्चे चाहिएँ?”
“हां, नये ताजे बच्चे।”
“आप बाजार में उसके लिए कितना देते हैं?”
डी० एपरेवल जो इस मामले में अनभिज्ञ था, अपनी साथिन की ओर मुड़ा।
“बाजार में मुर्गी के नए बच्चों के लिए हम कितना देते हैं?”
“चार-साढ़े चार आना।” उसने झिझकते हुए सहमे सहमे कहा।
किसान की स्त्री ने उसकी ओर आश्चर्य से निगाह डाली और फिर पूछा-“क्या यह औरत बीमार है, क्योंकि यह लगातार रोये जा रही है?”
वह अचकचा गया। उसे नहीं सूझा कि वो क्या जवाब दे?
“नहीं… नहीं। रास्ते में उसने घड़ी खो दी है, एक सुन्दर महंगी घड़ी जिससे वह दुःखी है। यदि किसी को मिले तो हमें बताना।”
मादाम बेनडिक्ट ने इस घटना को सुना, परन्तु कोई जवाब नहीं दिया। एकाएक उसने (किसान की पत्नी ने) बताया- “ये मेरे पति हैं।” उसने अकेले ही उसे आते देखा था क्योंकि उसका मुंह प्रवेश द्वार की तरफ था।
डी० एपरेवल उत्सुकता में तेजी से पलटे। मादाम काडोर भी तेजी से कुर्सी पर मुड़ने से लगभग गिर-सी गयी।
दस कदम दूर पर एक देहाती आदमी खड़ा था, जो एक रस्सी से बंधी गाय को हांक रहा था। वो गाय खींचने में लगभग दुहरा हो गया था। उसे सांस लेने में तकलीफ हो रही थी।
“मरो सालों!” उसने भद्दी गाली दी। घर आये लोगों पर उसने ध्यान नहीं दिया था।
बाहर से आयी बूढ़ी औरत की आंखों में अचानक आंसू आ गये। वह कुछ भी कहने या सोचने के लिए पगला गयी। उसका बेटा-यह उसका बेटा था। मिस्टर डी० एपरेवल की भी हालत कुछ ऐसी ही थी।
वह उदास शब्दों में बोला- “आप महाशय बेनडिक्ट ही हैं ना?”
इन लोगों पर अविश्वास करते हुए उस किसान की औरत ने प्रश्न दागा-“किसने आपको इनका नाम बताया?”
“सड़क के किनारे जो लुहार है उसने बताया- डी० एपरेवल ने स्थिति संभाली।
भौहों से पसीना पोंछते हुए वह धीरे-धीरे बाहर आया, एक बार फिर मेहमानों के सामने, बिना उन पर ध्यान दिये निकला और अपनी पत्नी से बोला- “जाओ और मेरे लिए पीने के लिए एक गिलास सेब का रस लाओ-मुझे बहुत प्यास लग रही है।” वह फिर अपने मकान में घुस गया। उसकी पत्नी सेब का रस लेने चली गयी। पेरिस से आये मेहमानों को उन्हीं के हाल पर अकेला छोड़ दिया गया।
मादाम एपरेवल बहुत मायूस थीं।
“चलो हेनरी, अब वापस लौट चलें।” उसने कहा।
डी० एपरेवल ने उसकी बांहें पकड़ीं, उसे उठने में मदद की और पूरी ताकत से उसे सहारा दिया, क्योंकि उसे पूरा विश्वास था कि वह गिर जायेगी। चलने से पहले उसने पांच सिक्के वहां पड़ी एक कुर्सी पर फेंक दिये और फिर सहारा देकर उसे रास्ता दिखाया।
जैसे ही वो लोग प्रवेश द्वार के बाहर निकले, दुःख के कारण वो सुबकने लगी-वो महान दुःख से टूट चुकी थी।
था। ओह, ओह, तुमने उसका यह हाल बना दिया है!” उसका चेहरा उतरा हुआ
“मैं जो कर सकता था वह मैंने किया”- उसने चिढ़ते हुए जवाब दिया- “उसका खेत अस्सी हजार से कम का नहीं है। बहुत-से मध्यम वर्ग के लोगों को इतना दहेज नहीं मिलता है।”
चुपचाप, निःशब्द बगैर बोले वो वापस लौट रहे थे। वो अब भी सिसक रही थी। आंसू अनवरत उसके गालों पर बह रहे थे।
आखिरकार वो दोनों रुक गये और फिर कैम्प पहुंच गये। महाशय काडोर रात्रि के खाने पर उन दोनों की प्रतीक्षा कर रहे थे। उन लोगों को देखते ही वह जोर-जोर से हँसने लगा।
“आ गए तुम लोग। मेरी पत्नी को लू लग गयी। मैं यह जानकर बहुत प्रसन्न हूं। जैसा मैं कह रहा था-पिछले कुछ दिनों से उसका दिमाग फिर गया था।”
दोनों ने कोई उत्तर नहीं दिया। उसके पति ने अपने हाथों को मलते हुए पूछा- “और तो सब ठीक है। आप लोगों की यात्रा अच्छी थी?”
डी० एपरेवल ने उत्तर दिया-
“प्रिय दोस्त बहुत बढ़िया, बहुत शांतिपूर्ण ।”
अ(नुवाद अतुल)
