सफलता के हिसाब से आंदोलनों की भूमिका का मूल्यांकन करने वाले एकबारगी ही स्वतंत्रता सेनानियों और शहीदों की कुर्बानियों को ख़ारिज कर देते हैं। घृणा के चलते अपने ही देशवासियों के त्याग-बलिदान को नकारना हद दर्जे की कृतघ्नता है।
जब कुछ विशेष धारा के लोग कहते हैं कि भारत छोड़ो आंदोलन से स्वतंत्रता प्राप्ति में कोई सहायता नहीं मिली, क्योंकि 1943, 1944, 1945 और 1946 तक तो हमें आजादी मिली नहीं। आजादी तो मिली है 1947 में।
स्वतंत्रता आंदोलन में दर्शक की भूमिका में रहने वालों की वैचारिक पीढ़ी आंदोलनों की कड़ी मीमांसा करती पाई जाती है। द्विराष्ट्रवाद की मांग करने वाले, बंटवारे के लिए गांधी और नेहरू को धिक्कारते हैं! मतलब गजब की वैचारिक अवसरवादिता है!
इनकी माने तो असहयोग और सविनय अवज्ञा आंदोलन भी बेकार ही रहे।
वैसे इनकी भी अपनी मजबूरी है। जब स्वतंत्रता आंदोलन में अपनी कोई भूमिका रही न हो, तो ऐसे में आंदोलनों के प्रभावों की चर्चा क्यों ही की जाए? यह तो कोई होशियारी नहीं हुई! भई इस तरह की चर्चा तो दूसरे का यश ही बढ़ाएगी। तंग नज़रिए वाले कब इसे बर्दाश्त करेंगे। वे तो इसे आत्मघात के रूप में ही देखेंगे।
इसलिए सबसे पहले अहिंसात्मक आंदोलनों की निस्सारता पर ही प्रश्नचिन्ह लगाओ, ताकि उस धारा के समर्थक खुद ही सफाई देते फिरें।
सफलता के हिसाब से आंदोलनों की भूमिका का मूल्यांकन करने वाले एकबारगी ही स्वतंत्रता सेनानियों और शहीदों की कुर्बानियों को ख़ारिज कर देते हैं। घृणा के चलते अपने ही देशवासियों के त्याग-बलिदान को नकारना हद दर्जे की कृतघ्नता है। क्या जिन्होंने स्वतंत्रता के संघर्ष में अपना सब कुछ होम कर दिया, उन्हें हम इस तरह याद करेंगे? क्या लाल, बाल, पाल, अरविंद, गांधी, सुभाष और नेहरू के प्रति यही हमारा कृतज्ञता बोध है?
फिर तो बिस्मिल, अशफाक, आजाद, भगतसिंह तथा अन्य क्रांतिकारियों का बलिदान भी अकारथ गया।
दरअसल यह प्रवृत्ति गुरु गोलवलकर के बंच ऑफ थॉट्स के उस विचार की ही प्रतिच्छाया है या उससे प्रेरित है, जिसमें वे शहीदों के बारे में कहते हैं – “ऐसे लोग जो शहादत को अपनाते हैं, निस्संदेह महान नायक हैं … वे सामान्य लोगों से ऊपर हैं। फिर भी, ऐसे लोगों को हमारे समाज में आदर्श के रूप में नहीं रखा जाता। हमने उनके बलिदान को सर्वोच्च महानता नहीं माना, क्योंकि अंततः वे अपने उद्देश्य को प्राप्त करने में असफल रहे, और असफलता में किसी गंभीर दोष का संकेत होता है।”
यहां भगतसिंह और आजाद जैसों को भी आदर्श के रूप में स्वीकारने में संकोच है। परिणाम को मूल्यों से ऊपर रख दिया गया है। ऐसे तो 1857 का विद्रोह भी निरर्थक साबित हो जाता है।
भगवान कृष्ण का रणछोड़ कर भागना भी उनको आदर्श के रूप में मानने से रोकता है। यह सटीक व्याख्या नहीं हो सकती।
फिर भी संतोष है कि उन्होंने कम से कम बलिदानी वीरों को महान नायक तो माना। आज उनके उत्तराधिकारी तो यह भी नहीं मानने को तैयार। वे रातदिन राष्ट्रीय नायकों के चरित्र हनन में ही व्यस्त रहते हैं।
ऐसा करके आप अपने को और अधिक अप्रासंगिक ही बनाएंगे। किसी पर कीचड़ उछालकर आप अपने उज्जवल नहीं साबित कर सकते। अफवाहों के सहारे नैया पार नहीं होती।
( – संजीव शुक्ल की पोस्ट से साभार)
