गांधी के हत्यारे के विचार हमारे देश के नागरिकों के विचार नहीं हो सकते। मानें या न मानें अदालत माने या न माने लेकिन महात्मा गांधी शहीद थे और उनका हत्यारा कातिल था।यह सच नहीं बदला जा सकता।
आज महात्मा गांधी की पुण्यतिथि है,आज देश में महात्मा गांधी सबसे ज्यादा चुनौतियों में घिरे हैं। हमारे देश में कुछ लोग महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे का मंदिर बनाना चाहते हैं और देश के सत्ताधारियों का उनकी पीठ पर वरदहस्त है। वे फिल्मों और इवेंट्स के जरिए गोडसे को भला आदमी और सामान्यजन का नायक, हिन्दू नायक बनाने में लगे हैं।
संकट यह है कि महात्मा गांधी की बजाय हत्यारे के विचारों को आम जनता में मीडिया से लेकर राजनीतिक मंचों तक परोसा जा रहा है। गांधी के हत्यारे के विचार हमारे देश के नागरिकों के विचार नहीं हो सकते।
वे मानें या न मानें अदालत माने या न माने लेकिन महात्मा गांधी शहीद थे और उनका हत्यारा कातिल था।यह सच नहीं बदला जा सकता।
वे कातिल की मूर्ति बनाएं,पदों पर बैठाएं, कातिल तो कातिल है,उसे कातिल के अलावा और कोई पदवी नहीं दे सकते।कातिल की मौत उसी दिन हो गयी जिस दिन उसने हत्या की।उसे वे महान नहीं बना सकते।
आज का दिन कातिल का दिन नहीं है शहीद का दिन है।महात्मा गांधी का जिसने कत्ल किया वह महज अपराधी नहीं था,उसकी विचारधारा थी ,उसकी गोलियां हिन्दुत्व की विचारधारा के बारूद से भरी थीं। हत्यारा पागल नहीं था,उसने होशोहवास में खून किया था।
गांधी की हत्या से जो विचारधारा नहायी हो उसे पवित्र-पूज्यनीय-समाज उद्धारक कैसे कह सकते हो ?
कहने को गोली नाथूराम गोडसे ने चलायी लेकिन वो अकेला नहीं था,उसके पीछे हत्यारों की टोली थी,उनका मकसद गांधी को मारना था,लेकिन वे तो निमित्त मात्र थे,असल निशाना धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र था।वे गांधी हत्या के बहाने शपथ ले चुके हैं जब भी मौका लगेगा धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र को गोली मारेंगे। हम तय करें किस ओर हैं गांधी की ओर या गांधी के हत्यारे की ओर ?
गोडसे का हिन्दू महासभा और संघ से गहरा संबंध था और वह हिन्दू फंडामेंटलिस्ट था। हिन्दू फंडामेंटलिस्ट के हाथों गांधीजी की हत्या भारत के लिए संदेश है कि फंडामेंटलिस्ट किसी के सगे नहीं होते। देश के भी सगे नहीं होते।30 जनवरी 1948 की शाम को जब गांधीजी प्रार्थना सभा में भाग लेने जा रहे थे, तब हिन्दू कट्टरपंथी नाथूराम गोडसे ने गोली मारकर उनकी हत्या कर दी। कायदे से आज के दिन को फंडामेंटलिज्म-साम्प्रदायिकता के खिलाफ एकजुट संघर्ष के दिवस के रूप में मनाया जाना चाहिए।
महात्मा गांधी का मानना था- “मैं कितना ही तुच्छ होऊं, पर जब मेरे माध्यम से सत्य बोलता है तब मैं अजेय बन जाता हूं।”
गांधी जी के प्रेरक 12 विचार-
1.स्त्री का अंतर्ज्ञान पुरुष के श्रेष्ठ ज्ञानी होने की घमंडपूर्ण धारणा से अधिक यथार्थ है।
2.सादगी ही सार्वभौमिकता का सार है।
3.स्वच्छता, पवित्रता और आत्म-सम्मान से जीने के लिए धन की आवश्यकता नहीं होती।
4.मैं तो एक ऐसे राष्ट्रपति की कल्पना करता हूँ जो नाई या मोची का धन्धा करके अपना निर्वाह करता हो और साथ ही राष्ट्र की बागडोर भी अपने हाथों में थामे हुए हो।
5.हृदय में क्रोध, लालसा व इसी तरह की …..भावनाओं को रखना, सच्ची अस्पृश्यता है।
6.प्रेम कभी कुछ पाने का दावा नहीं करता, वह सदा देता ही है । प्रेम सदा सहन करता है; वह कभी विरोध नहीं करता, कभी बदला लेकर संतुष्ट नहीं होता ।
7.स्त्री जीवन के समस्त पवित्र एवं धार्मिक धरोहर की मुख्य संरक्षिका है।
8.मैं जानता हूं कि मुझे अभी बड़ा मुश्किल रास्ता तय करना है। मुझे अपनी हस्ती को बिलकुल मिटा देना होगा। जब तक मनुष्य अपने आपको स्वेच्छा से अपने सहचरों में सबसे अंतिम स्थान पर खड़ा न कर दे तब तक उसकी मुक्ति संभव नहीं। अहिंसा विनम्रता की चरम सीमा है।
9.हमारा समाजवाद अथवा साम्यवाद अहिंसा पर आधारित होना चाहिए जिसमें मालिक मजदूर एवं जमींदार किसान के मध्य परस्पर सद्भावपूर्ण सहयोग हो।
10.जब कोई युवक विवाह के लिए दहेज की शर्त रखता है तब वह न केवल अपनी शिक्षा और अपने देश को बदनाम करता है बल्कि स्त्री जाति का भी अपमान करता है।
11.मैंने कभी अपने आपको संन्यासी नहीं कहा। संन्यास बड़ी कठिन चीज है। मैं तो स्वयं को एक गृहस्थ मानता हूं जो अपने सहकर्मियों के साथ मिलकर, मित्रों की दानशीलता पर जीवन निर्वाह करते हुए, सेवा का विनम्र जीवन जी रहा है… मैं जो जीवन जी रहा हूं वह पूर्णतया सुगम और बड़ा सुखकर है, यदि सुगमता और सुख को मनःस्थिति मान लें तो। मुझे जो कुछ चाहिए, वह सब उपलब्ध है और मुझे व्यक्तिगत पूंजी के रूप में कुछ भी संजोकर रखने की कतई जरूरत नहीं है।
12.मैं सोचता हूँ कि वर्तमान जीवन से ‘संत’ शब्द निकाल दिया जाना चाहिए। यह इतना पवित्र शब्द है कि इसे यूं ही किसी के साथ जोड़ देना उचित नहीं है। मेरे जैसे आदमी के साथ तो और भी नहीं, जो बस एक साधारण-सा सत्यशोधक होने का दावा करता है, जिसे अपनी सीमाओं और अपनी त्रुटियों का अहसास है और जब-जब उससे गुटिया! हो जाती है, तब-तब बिना हिचक उन्हें स्वीकार कर लेता है और जो निस्संकोच इस बात को मानता है कि वह किसी वैज्ञानिक की भांति, जीवन की कुछ ‘शाश्वत सच्चाइयों’ के बारे में प्रयोग कर रहा है, किंतु वैज्ञानिक होने का दावा भी वह नहीं कर सकता, क्योंकि अपनी पद्धतियों की वैज्ञानिक यथार्थता का उसके पास कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं है और न ही वह अपने प्रयोगों के ऐसे प्रत्यक्ष परिणाम दिखा सकता है जैसे कि आधुनिक विज्ञान को चाहिए।
