30 दिसंबर,1952 को उत्तर प्रदेश के नजीबाबाद में जन्मे आनंद जी विभिन्न अवधियों में सब एडिटर, विशेष संवाददाता, सहायक संपादक, संपादकीय पेज के प्रभारी, नाइट एडीटर आदि पदों पर रहे। आखिर के चार वर्षो तक वह संपादक रहे।
नवभारत टाइम्स में उप संपादक के रूप में काम करते मुझे डेढ़-दो महीने ही हुए होंगे कि मैंने डेस्क पर एक हमउम्र युवा को देखा। करीने से कपड़े पहने, कलुष-रहित मुख, सुदर्शन व्यक्तित्व, चेहरे पर मुस्कराहट और आश्वस्ति का भाव। डेस्क पर आते ही उस युवा ने जेब से दो-तीन बालपेन निकाल कर टेबल पर रखे। पहली नज़र में ही उससे बात करने की लालसा पैदा हुई। एक सहयोगी ने बताया, ये मधुसूदन आनंद हैं।बंबई ( तब मुंबई का यही नाम था ) से ट्रांसफर होकर आए हैं। औपचारिक परिचय कई दिनों बाद हुआ। नये माहौल में पहल मैंने की थी या उन्होंने, अब याद नहीं। यह बात ज़रूर दिमाग में है कि उस दिन उनका अखबार में लेख छपा था,जिसका शीर्षक था-‘ पाकिस्तानी बम और हम ‘।
एक-दूसरे से परिचय के फौरन बाद बेतकल्लुफ़ी से इस लेख पर बहस होने लगी। हर हफ्ते हमारी ड्यूटी बदलती। वह रात में होते तो मैं दिन में।कभी इसका उलट भी होता। इस वजह से ज्यादा मिलना-जुलना नहीं हो पाता था।1979 की गर्मियों में 72 दिन की हड़ताल हो गई। आफिस दुबारा खुला तो आनंद जैन संपादक बन चुके थे। जल्दी ही मधुसूदन आनंद का पश्चिमी जर्मनी के रेडियो डोइचे वेले में चयन हो गया। उनकी विदाई पार्टी में मैं भी बोलना चाहता था पर बहुत नया होने के कारण मुझसे कहा नहीं गया।बहरहाल अपने एक अच्छे-सहृदय सहयोगी के पश्चिम जर्मनी जाने से मन में एक शून्य पैदा हुआ।
दो साल बाद वह लौटे, तब तक माथुर साहब संपादक के रूप में आ चुके थे। आनंद जी ने अपनी नई पारी संवाददाता के रूप में शुरू की। उनके व्यवहार में कोई परिवर्तन नहीं आया था। वह पहले की तरह सहज भाव से मिलते, जबकि कुछ वरिष्ठ अकडे रहते थे, मानो आसमान से उतरे हुए फरिश्ते हों। इन्हीं दिनों मुझसे बातचीत में आनंद जी के मुंह से निकला: ‘ कम्युनिस्ट पूर्वी जर्मनी तो पुलिस- स्टेट है।’ सोवियत खेमे का खांटी कम्युनिस्ट होने के नाते मैं उनसे इस पर झगड़ बैठा। मैंने कठोर टिप्पणी की -‘ यह आपकी निष्पक्ष समझ नहीं है। जर्मनी के मार्क(तब प्रचलित मुद्रा) की गर्मी आपसेे यह बुलवा रही है। इस घटना के बाद भी वह मुझसे पूर्ववत गर्मजोशी से मिलते रहे।
कई साल बाद पूर्वी जर्मनी की यात्रा के दौरान मैंने दो जर्मन राज्यों को विभाजित करने वाली बर्लिन वाल को दूर से देखकर प्रणाम किया – ‘अमर रहो, समाजवाद की रक्षक अभेद्य प्राचीर।’ आनंद जी की बात तब मेरे दिमाग में थी। ठीक पांच वर्ष बाद पूर्वी जर्मन जनता ने हथौड़ों और कुल्हाड़ियों से बर्लिन वाल को ध्वस्त कर डाला। ‘ नाटो ‘ की परम विध्वंसक सेनाएं -जो करने से अभी तक डरती रहीं- जनता ने वह कर दिखाया। कुछ हफ्ते बाद जर्मनी के एकीकरण के साथ द्वितीय विश्व युद्ध की यह कम्युनिस्ट विरासत खत्म हो गई। 2008 में संपादक बन चुके मधुसूदन आनंद ने रक्षा मंत्री प्रणव मुखर्जी की फ्रांस और जर्मनी यात्रा की कवरेज के लिए मुझे भेजा। बर्लिन वाल के संरक्षित अवशेषों के पास खड़ा होकर मैं सुधबुध खो बैठा था। साठ सालों का इतिहास मेरी आंखों के सामने तैरने लगा। बर्लिन के दोनों हिस्सों का विस्तृत भ्रमण करने के बाद मैंने महसूस किया कि आनंद जी ने पिछली शताब्दी में बिलकुल सही कहा था।
थोड़ा पीछे चलते हैं। नवभारत टाइम्स के लखनऊ संस्करण का प्रकाशन शुरू होने पर 1983 में मेरे वहां जाने से पहले आनंद जी मुझे पास के डाल्स म्यूज़ियम के रेस्तरां में लंच करवाया। अतीत की कड़ुआहट को वह पहले ही भुला चुके होंगे।
आनंद जी के विस्तृत अध्ययन का आभास मुझे टाइम्स आफ इंडिया की लाइब्रेरी के टूटने के वक्त हुआ। मुझ पर सदैव स्नेहभाव रखने वाले लाइब्रेरियन शर्मा जी ने बताया कि लाइब्रेरी टूटने जा रही है। जितनी चाहो, यहां की किताबें देखकर उनकी एक लिस्ट बनाकर मुझे दे दो। परसों सुबह उन्हें दस-दस रुपये में ले जाना। करीब सौ पुस्तकों का मैंने चयन किया था,जिनमें कुछ बहुत गंभीर किस्म की थीं,जैसे गुन्नार मिर्डल की ‘ एशियन ड्रामा ‘। पुस्तक की जिल्द से लगे इस्यू कार्ड पर जिज्ञासावश मैंने नज़र डाली -टाइम्स आफ इंडिया के संपादक गिरिलाल जैन के बाद सिर्फ आनंद जी ने इसे इस्यू कराया था।
30 दिसंबर,1952 को उत्तर प्रदेश के नजीबाबाद में जन्मे आनंद जी विभिन्न अवधियों में सब एडिटर, विशेष संवाददाता, सहायक संपादक, संपादकीय पेज के प्रभारी, नाइट एडीटर आदि पदों पर रहे। आखिर के चार वर्षो तक वह संपादक रहे।तब उनका नाम प्रिंट लाइन में जाता था। इसके साथ उनका रचनात्मक लेखन भी जारी रहा। उनका कविता संग्रह इसी बीच छपा।उनका कहानी की जगत में भी काफी नाम हुआ।अपने पहले कहानी संग्रह ‘ करौंदे का पेड़ ‘ से ही हिंदी के एक विशिष्ट कथाकार के रूप में अपनी एक बड़ी पहचान बनाई।उनकी टिड्डा, मोटा, मिन्नी, करौंदे का पेड़, विदेश में मौत आदि कहानियां बहुचर्चित रहीं।किसी प्रयास के बगैर उनकी चर्चा कथाकारों- आलोचकों आदि ने की।सभी प्रमुख पत्र- पत्रिकाओं में उनकी कविताएं -कहानियां प्रकाशित हुईं।आज भी उनका लेखन जारी है। व्यंग्य भी इसी बीच उन्होंने लिखे।हाल ही में उनका ध्यान संस्मरण विधा की ओर भी गया है।
बहरहाल मैंने 2006-08 तक उनके साथ संपादक ( समन्वय ) की हैसियत से काम किया। नवभारत टाइम्स के इतिहास में शायद वह पहले संपादक थे, जो रोज़ शाम को डेस्क प्रभारियों, चीफ रिपोर्टर और ब्यूरो प्रमुख के साथ मीटिंग में एक-एक खबर और पहले पेज की चुनींदा खबरों पर विचार -विमर्श किया करते थे। प्रायः यह भी तय कर दिया करते थे कि लीड स्टोरी कौन लिखेगा।यह जिम्मा अनेक बार मुझे दिया गया। सद्दाम हुसेन की फांसी जैसी कुछ बड़ी घटनाओं पर उन्होंने मुझसे त्वरित टिप्पणियां लिखवाईं। मैं उनके इस मत से सहमत था कि खासतौर से पहले पेज पर संपादक की अपनी विशिष्ट छाप दिखना चाहिए।
नफरतिया खबरें न छपें, इसके प्रति वह सजग रहे। इस विषय में उनकी सजगता का अंदाज़ा एक घटना से लगता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े और भारतीय जनता पार्टी में सक्रिय, एक ‘विचारक ‘ जी ने अपनी नई किताब के बहाने दो-ढाई हज़ार शब्दों का एक लेेख पेेल दिया। दोषपूर्ण भाषा मेंं लिखे उस ‘ विचारक ‘ के हस्तलेख में वह लेख मुझे दिखाते हुए उन्होंने पूछा, ‘ बताओ,क्या यह छापने लायक है ?’ मैंने कहा, ‘ बिलकुल छपना चाहिए।’ उन्होंने यह शर्त लगाई कि इनकी कोई महत्वपूर्ण बात या भाव को बदले बगैर एक हज़ार शब्दों में इसे सीमित करना होगा।इसके अलावा एक लेख लिखकर आप इसकी धज्जियां भी उड़ाएंगे। मैंने गुरु गोलवलकर समग्र और दीन दयाल उपाध्याय की किताबों के रेखांकित अंशों को पढ़कर एक लेख उन्हें दिया। उन्हीं दिनों भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने आत्मोत्सर्ग की मुद्रा में ऐलान किया कि आवश्यकता पड़ने पर हम ‘ सिविल वार ‘ के लिए भी तैयार हैं। आनंद जी ने कहा, ‘ यह क्या पागलपन है। इस पर एक लेेख लिखो।अपने कार्यकाल में वैचारिक वज्र प्रहार करने का कोई मौका उन्होंने नहीं छोड़ा।
रुई की हथेलियों वाले आनंद जी मौका पड़ने पर वज्र से भी अधिक कठोर हो जाते हैं। प्रबंधन में कई वरिष्ठ लोगों के सामने किसी कार्यकारी निदेशक को इस तरह वही बोल सकते हैं,’’ आप होंगे कार्यकारी निदेशक। मैं आप से असहमत हूं।‘’ इस पर कई मिनट तक सन्नाटा छाया रहा था। मैं कुछ घटनाओं का चश्मदीद रहा हूं। मैनेजमेंट अखबार को टब्लायाड बनाना चाहता था। वह लगातार टालते रहे।एक दिन मेरे साथ इस पर विचार किया था। मेरी प्रतिक्रिया थी, टाप मैनेजमेंट चाहता है,तो बना दीजिए घासलेटी अखबार,मैंने तो सांध्य टाइम्स में भी काम किया है;हमारा काम आसान हो जाएगा।मेरी बात को काटते हुए उन्होंने कहा था,नहीं जी,हमारे रहते कभी नहीं। वह चट्टान की तरह अड़े रहे। मैनेजमेंट ने अपनी जानकारी के आधार पर संपादकीय विभाग में एनपीए ( नान परफ़ार्मिंग असेट ) की सूची बनाई थी। आनंद जी ने अनुमोदन करने से इंकार कर दिया था। एक मैनेजर ने एकांत में मेरी राय मांगी थी। मेरा दो टूक जवाब था-मैं एकांत में आनंद जी के पीछे,खासतौर से जब वह छुट्टी पर हों,कोई मत व्यक्त नहीं कर सकता और न किसी महत्वपूर्ण कागज पर दस्तखत करूंगा। मैनेजर के सारगर्भित इशारे पर मैंने कुछ झुल्लाते हुए कहा था,मेरा तीन साल का अनुबंध छह महीने बाद पूरा हो जाएगा और उम्र के 58 साल भी पूरे हो जाएंगे;आनंद जी से संबंध स्थायी हैं।अनुबंध की अवधि पूरी होने पर इसी मैनेजर ने मुझसे कहा था,आप ने मेरी बात मानी नहीं थी,अन्यथा कंट्रैक्ट बढ़ जाता। मेरे इस उत्तर से उनका मुंह लटक गया था,’ मुझे कोई दुख नहीं,न आप आनंद जी को समझ पाए और न मुझे।‘
लंबे समय तक चले दुष्प्रचार को निराधार साबित करने के लिए,सनद की खातिर यह लिखना ज़रूरी हो जाता है कि किसी के भी जाने के पीछे आनंद जी का हाथ बिलकुल नहीं था। उनकी वजह से तो कुछ लोगों की नौकरी बची रही। यह भी इंसानी फितरत है कि इन लोगों ने उनका अहसान नहीं माना। शब्दों के अच्छे कारीगर,एक सक्षम सहयोगी के जाने की राजनीतिक वजहें थीं। वह मुझ पर पत्थर फेंकते रहे। मेरी कोई हैसियत ही नहीं थी कि उन्हें बचा पाता। आनंद जी ने बचाने की नाकाम कोशिश की थी। इन सहयोगी की,पहले पेज पर प्रमुखता से छपी रिपोर्ट को एक वरिष्ठ नेता ने अपने प्रतिकूल पाकर उच्चतम स्तर पर सीधे शिकायत की थी। लाइब्रेरी से इस रिपोर्ट की क्लिपिंग मंगाई गई थी। फोर्थ फ्लोर के आफिस में क्लिपिंग देने गए सहयोगी ने,पुराने संबंधों के नाते मुझे यह बात बताई थी। अनिवार्यतः जो होना था,वही हुआ। एक अन्य वरिष्ठ सहयोगी को अपनी करनी से जाना पड़ा था। दफ्तर में चीखने-चिल्लाने की अपनी आदत से मजबूर उन्होंने एक महिला सहयोगी को डाटते हुए कहा था,टीवी बंद करो,काम में बाधा पड़ रही है।कई लोगों ने सुना था। दो गवाहों के साथ इस सहयोगी ने लिखित शिकायत मुझे दी थी। बेनेट कोलमैन में इस तरह का आचरण अक्षम्य अपराध माना जाता है। इस शिकायत को दबाना हमारे लिए संभव नहीं था। तीर छूट चुका था। एनपीए की लिस्ट में इनका नाम पहले से ही था।
स्थितिप्रज्ञता के आनंद जी जैसे उदाहरण दुर्लभ हैं। उनसे यह गुण ग्रहण करने में मैं कभी सफल नहीं हो पाया। बड़े-बड़े जिन स्थितियों में विचलित हो जाएं,बिखर जाएं,वह उनमें भी सहज ढंग से मानसिक संतुलन बनाए रखते हैं। मेरे एक अनन्य मुसलमान मित्र अपने सामने मुसीबतों का पहाड़ देखकर कहते हैं,अल्लाह इम्तहान ले
रहा है। धार्मिक आस्थाओं पर मैं प्रायः किसी से बात नहीं करता। आनंद जी से भी नहीं की। अनुमान है कि वह इस मित्र की तरह अथाह गहराई तक ईश्वरवादी नहीं हैं। अगर वह पक्के नास्तिक होते,तब भी उनका स्वभाव यही होता। यह गुण भी गूलर के फूल जैसा है,क्योंकि नास्तिक व्यक्ति ईश्वर रूपी अंतिम रक्षात्मक पंक्ति से वंचित रहता है। मैंने देखा है,किसी ज़रूरतमंद के बारे में उनकी राय अच्छी भले न हो,यथासंभव वह सहायता कर देते हैं। नवभारत टाइम्स में उन्होंने जिन्हें सड़क पर से उठाकर कुर्सी दी,तरक्की दी,जिनकी नौकरी बचाई,प्रोफाइल बदला, नए सत्ता समीकरण के संकेतों को देख वे सब उनके सामने पड़ने से बचने लगे थे।कुछ लोग तो उनके और मेरे खिलाफ खुलकर बोलने लगे थे। धैर्य और अटूट साहस के मामले में उनका सार्वजनिक जीवन काफी हद तक निजी जीवन का विस्तार हो जाता है। संकट उन्हें तोड़ नहीं पाते। युवावस्था में मोटर साइकिल चलाते हुए पैर की हड्डी टूट गई ।ठीक होने के बाद फिर बाइक चलाने लगे। मधुमेह और दिल की बीमारी भी उन्हें प्रभावित नहीं कर पाती। परहेज करना स्वभाव में नहीं। बदपरहेजी के साथ ही ठीक कामचलाऊ सेहत बनाए रखी है। आयुर्विज्ञान के सर्वमान्य सिद्धांतों के विपरीत चलकर अकड़ से खड़े रहने का हौसला भी इसी अस्वस्थ हृदय से निकलता है। सार्वजनिक जीवन में भी वह जोखिम उठाते रहते हैं। ‘ बहुमुखी ‘ प्रतिभा के धनी एक ‘ मित्र ‘ को लंबी अवधि तक झेलते रहे। लेकिन उन्हें गलतफहमी नहीं रही।मेरे कोंच कर पूछने पर संक्षिप्त प्रतिक्रिया थी,इनके बारे में मुझे भ्रम कभी नहीं रहा,जीवन में ये सब चलता है। आज वह सज्जन जीवन में नितांत निस्संग हैं। आनंद जी ने कभी नाम तो नहीं लिया पर मेरा अनुमान है कि इन्हींने 2006 में मेरे नवभारत टाइम्स जॉइन करते समय कहा था,’ आप अपनी कुर्सी के नीचे टाइम बम लगा रहे हैं।‘ डेढ़ दशक की अवधि में आनंद जी से मेरा सामीप्य बढ़ा है और वह बहुत दूर जा चुके हैं। निजी संबंधों में असीमित प्रतिबद्धता,पारदर्शिता और बेलौस मोहब्बत का ही नतीजा है कि कोरोना की जानलेवा दूसरी लहर में जब वह सपरिवार बीमार थे, केरल में बैठे विष्णु नागर ने मुझसे कहा था,’ मेरी कामना है,उनकी मौत मुझ पर आ जाए। गांव से लेकर कई शहरों तक अपने वृहद परिचय के दायरे में मैंने दूसरा व्यक्ति नहीं देखा,जिसके लिए कोई मित्र यमराज को पटखनी देने के लिए रास्ता रोके खड़ा हो और खुद इसी वाइरस से सपरिवार ग्रस्त अन्य लोग उनके लिए ‘ ईश्वर ‘ से फरियाद कर रहे हों। मौतों के उस बेरहम दौर में हठी नास्तिकों की आस्थाएं थोड़ी-बहुत हिली थीं। आस्था पर यह ख्याल भारी पड़ा था,ईश्वर है या नहीं,इस बहस में पड़ने के बजाय प्रार्थना तो कर ही लेनी चाहिए।
इंसानी फितरत का एक और रूप। अतीत की सभी कड़वाहटों को भुलाकर नेकनीयत लोग संकट काल में खराब पड़ोसी का भी हाल-चाल पूछकर मदद के लिए तैयार दिखते हैं। 2022 की दूसरी छमाही में आनंद जी को कई दिन अस्पताल में रहना पड़ा था। जानकारी मिलने के बावजूद ‘ मित्र ‘ ने फोन करने का शिष्टाचार नहीं निभाया था। मैं यकीन से कह सकता हूं, ‘ मित्र ‘ की ऐसी स्थिति में आनंद जी स्वास्थ्य लाभ की कामना कर रहे होते ।
कुछ तो दिन-रात की झंझट वाले पेशे,पत्रकारिता में रहने और कुछ सेल्फ-मार्केटिंग में कमजोर होने के कारण आनंद जी के व्यक्तित्व के अन्य रचनात्मक पहलुओं पर पर्याप्त सार्वजनिक रोशनी नहीं पड़ी है। उनके कहानी संग्रह छपे हैं,पर थोड़ा सा उजाला,कारपोरेट स्मेल और प्रज़ेंटेबल जैसी श्रेष्ठ कहानियों के वह लेखक हैं,यह व्यापक तौर पर विदित नहीं है। उम्मीद है,योजनानुसार निकट भविष्य में नया कहानी संग्रह आ जाएगा। वह कविता संग्रह पर भी काम कर रहे हैं।
(लगभग तीन साल पहले यह संस्मरण प्रकाशित हुआ था फेसबुक पर। विष्णु नागर की फेसबुक पोस्ट)
