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मीर तकी मीर के व्यक्तित्व की विशेषता थी स्थिरता, दृढ़ता,भौतिक सुखो के प्रति लापरवाही,उच्च मूल्यों के प्रति निष्ठा और आत्म-नियंत्रण।ये सब गुण उनको विरासत में अपने पिता और चचा से मिले थे।
मीर तकी मीर के व्यक्तित्व की विशेषता थी स्थिरता,दृढ़ता,भौतिक सुखो के प्रति लापरवाही,उच्च मूल्यों के प्रति निष्ठा और आत्म-नियंत्रण।ये सब गुण उनको विरासत में अपने पिता और चचा से मिले थे।उनके व्यक्तित्व पर सूफियों का भी गहरा असर था।पिता ने उनको प्रेम सिखाया। यह शिक्षा दी कि संसार का सत्य है प्रेम।उसीसे संसार रचा गया है।पिता ने यह भी सिखाया इश्क में दिल खोना,प्रेम में डूबे रहना ही मानव का गौरव है।यही बातें उनके व्यक्तित्व और शायरी के नजरिए की धुरी बनीं।
हम कहते थे कहीं ज़ुल्फ़ ,कहीं रूख़ न दिख़ा।
इख्ति़लाफ़ आया न हिन्दू-मुसलमाँ के बीच ।।
एक दिन लखनऊ में कुछ प्रतिष्ठित लोग मीर साहब के घर भेंट करने और शेर सुनने पहुँचे,दरवाजे पर पहुँचकर आवाज दी।उनकी बेटी बाहर आई उसने पूछा फिर अंदर जाकर मीर से कहा कि कुछ लोग शेर सुनने आए हैं,वह अंदर से फटा टाट लेकर आई और आगन्तुकों को उस पर बैठने के लिए कहा।थोड़ी देर बाद मीर साहब आए,उन्होंने लोगों से आने का मकसद पूछा तो वे बोले कि शेर सुनने आए हैं,मीर ने पहले टाल-मटोल की फिर कहा ‘जनाब,मेरे शेर आप लोगोंकी समझ में नहीं आने के।’यद्यपि लोगों को बात बुरी लगी लेकिन सभ्यता के नाते उन्होंने फिर अनुरोध किया।प्रस्ताव इसबार भी अस्वीकृत हुआ।निदान उन लोगोंने पूछा ‘हज़रत, अनवरी व खाकानी के कलाम समझते हैं,आपका क्यों न समझेंगे ‘,मीर साहब ने फरमाया ‘यह दुरूस्त,मगर उनकी शरहें(टीकाएँ) मौजूद हैं,और मेरे क़लाम के लिए फ़क़त(केवल)- मुहाविरे-ए अहले उर्दू- (उर्दू बोलने वाले लोगों के मुहावरे) या जामा मस्जिद की सीढ़ियाँ।इन दोनोंसे आप महरूम है।इतना कहकर फिर शेर पढ़ा-
इश्क बुरे ही ख्याल पड़ा है,चैन गया आराम गया।
दिल का जाना ठहर गया है,सुबह गया या शाम गया।।
मीर के दूसरे बेटे का नाम था मीर फ़ैज़ अली।इनके नाम पर मीर ने ‘फ़ैजे मीर’ पुस्तक लिखी।मीर फ़ैज़ अली एक लड़की को प्रेम करते थे।शादी के कुछ ही दिन बाद इसकी मौत हो गयी।उसकी मौत पर मीर खूब रोए और उस पर लिखा-
अब आया ध्यान ऐ आरामे जाँ ! इस नामुरादी में,
क़फ़न देना तुम्हें भूले थे हम असबाबे शादीमें।।
उनका पूरा नाम मीर तक़ी था। मीर इनका तख़ल्लुस था। मीर साहब के तीन सन्तानें थीं,दो बेटे और एक बेटी।तीनों काव्य रचना में अव्वल थे.बड़े बेटे मीर अस्करी उर्फ मीर कल्लू बड़ी मस्त तबियत के आदमी थे और पहले राज और ,फिर अर्श के उपनाम से कविताएं करते थे इनका एक दीवान भी है ।दिलचस्प बात यह है कि बाप-बेटे की ज़बान एक जैसी थी।बड़े बेटे में दौलत और राजशाही के प्रति कोई मोह नहीं था।भाषा की वे इस कदर इज्जत करते थे कि उसी को अपनी सबसे कीमती चीज मानते थे। उनकी रचना देखें-
गर हो न ख़फ़ा तो कह दूँ जी की।
इस दम तुम्हें याद है किसी की।।मीर अस्करी।।
मृत्यु के ठीक पहले मीर ने यह शेर पढ़ा-
साज़ पेच आमादा है सब काफ़ले की तैयारी है।
मजनूँ हमसे पहिले गया है अबके हमारी बारी है।।
मीर फ़ैज़ अली की बेगम भी शानदार कविताएं लिखती थीं, वे ‘बेगम’ के नाम से कविताएं लिखती थीं।उनके कुछ शेर पढ़ें-
बरसों ख़मे गेसू में गिरफ्तार तो रक्खा,
अब कहते हो क्या तुमने मुझे मार तो रक्खा।।
कुछ बेअदबी और शबे वस्ल नहीं की,
हाँ यारके रूख़सार पै रूख़सार तो रक्खा।।
वह ज़िबह करे या न करे गम नहीं इसका,
सर हमने तहे ख़ंज़रे ख़ूँख़ार तो रक्खा।।
इस इश्क की हिम्मत के मैं सदके हूँ कि ‘बेगम’,
हर वक्त़ मुझे मरने पै तैयार तो रक्खा।।
