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आज की हिंदुत्ववादी राजनीति के शिखर पर जो बैठे हैं, वे खुद सभ्य नहीं हैं।यह अनजाने नहीं हो रहा है बल्कि असभ्यता, निरंकुशता, मानवीय संवेदनाओं से बढ़ती दूरी बनाना उनका एक सोचा-समझा अभियान है, ताकि नफ़रत का खुला खेल फर्रुखाबादी खेला जा सके क्योंकि कोई सभ्य जाति यह नहीं कर सकती।
हिंदुस्तान की सभ्यता अवश्य पांच हज़ार साल पुरानी है मगर इक्कीसवीं सदी के आरंभिक दशकों के हम लोग सभ्य नहीं कहे जा सकते। मुसलमानों, सिखों, ईसाइयों पर यह बात कितनी लागू होती है, यह नहीं कह सकता मगर जो आजकल अपने धर्म पर सुबह- शाम पता नहीं किस बात पर ‘गर्व’ करते हुए पाए जाते हैं, उनका एक बड़ा हिस्सा निश्चित रूप से असभ्य है।यह असभ्यता अकसर बर्बरता की सीमा को छूने लगी है।
सबसे पहले आज की हिंदुत्ववादी राजनीति के शिखर पर जो बैठे हैं, वे खुद सभ्य नहीं हैं।वे संस्कृति- संस्कृति का जाप रोज किया करते हैं मगर लगता है संस्कृति और सभ्यता उन्हें छू तक नहीं गई है।यह अनजाने नहीं हो रहा है बल्कि असभ्यता, निरंकुशता, मानवीय संवेदनाओं से बढ़ती दूरी बनाना उनका एक सोचा-समझा अभियान है, ताकि नफ़रत का खुला खेल फर्रुखाबादी खेला जा सके क्योंकि कोई सभ्य जाति यह नहीं कर सकती। रोज़- रोज़ के इनके वक्तव्य पढ़ लीजिए, व्यवहार देख लीजिए, इनके असभ्य और बर्बर होने के उदाहरण असंख्य हैं। प्रधानमंत्री स्वयं दंभी हैं और कोई भी दंभी कभी सभ्य नहीं कहा जा सकता।कोई नागरिक ही क्या उनका मंत्री, सांसद, विधायक इनके साथ कदम से कदम मिलाकर चलने की हिमाकत नहीं कर सकता, ऐसी असभ्यता उनमें समाई हुई है! ऐसा पहले कभी नहीं था।जब विपक्ष सवाल करता है तो जवाब नहीं दिया जाता। उन्होंने कभी किसी बहस में आमने-सामने भाग नहीं लिया, जिसका बौद्धिक स्तर इतना नीचा हो,वह सभ्य कैसे हो सकता है!उनकी पार्टी की ओर से सवाल करनेवालों का चरित्रहनन करना अब सामान्य बन चुका है!अभी इनका एक मंत्री तक जवाहरलाल नेहरू के ए आई से बने तथा कुछ आत्मीय चित्रों को लेकर उन्हें अय्याश सिद्ध करने की कोशिश कर रहा था। हिंदुस्तान के अब तक के सबसे बड़े और सबसे पढ़े-लिखे प्रधानमंत्री से जो इतनी खौफ खाते हों,उस पर अनर्गल आरोप लगाते हों,वे मंत्री हो सकते हैं,सभ्य और सुसंस्कृत नहीं! इन्होंने इंदिरा गांधी से लेकर सोनिया गांधी, राहुल गांधी सबके बारे में इतना झूठ फैला रखा है,जिसकी इजाजत किसी सभ्य देश का सभ्य प्रधानमंत्री और उसकी पार्टी का अध्यक्ष नहीं दे सकता मगर यहां तो ऐसा करनेवालों के नंबर प्रधानमंत्री की नजर में बढ़ जाते हैं, ऐसी असभ्यता है यहां,जबकि ये पाखंडी अपने को दुनिया के सबसे सभ्य और प्राचीन सभ्यता का अपने को हिस्सा भी बताते हैं!
यहां किसान आंदोलन करें तो वे आतंकवादी हो जाते हैं, छात्र आंदोलन करें तो नक्सल हो जाते हैं, देशद्रोही कहना तो रोजमर्रा की राम- राम का दर्जा पा चुका है। आदिवासी हक के लिए लड़ें,जंगल बचाने के लिए लड़ें तो वे भी नक्सली हो जाते हैं।हर पढ़ा लिखा मगर इनका विरोधी अर्बन नक्सली है,खान मार्केट गैंग का सदस्य है!इतने तो ‘सभ्य’ हैं ये! देवता जरूर इनकी सभ्यता देखकर आसमान से फूल बरसाते होंगे!
किस लिहाज से असम और उत्तर प्रदेश आदि के इनके मुख्यमंत्रियों को सभ्य देश का नागरिक नेता कहा जा सकता हैंं, जबकि ये बड़े संवैधानिक पदों पर बैठे हैं! जिन पर अपने प्रदेश की पूरी जनता की जिम्मेदारी है, वे अपने ही प्रदेश की जनता के एक हिस्से के विरुद्ध जहर उगलने में और उन्हें बर्बाद करने में आगे रहते हैं! गरीब रिक्शा मजदूर की मजदूरी पांच रुपए बनती हो तो चार रुपए देने के लिए अपनी जनता को प्रोत्साहित करनेवाला मुख्यमंत्री किस पैमाने से सभ्य देश का वासी कहा जा सकता है?जो नेता हजारों लोगों की हत्या की तुलना कार के नीचे कुत्ते के कुचलने से करता है, जो कपड़ों से लोगों को पहचानने की बात करता है, जो अपने को नान बायोलॉजिकल बताता है, वह चाहे कितनी ही ऊंची कुर्सी पर बैठा हो ,असभ्य है!जो झूठ बोलना अपना राजनीतिक कर्तव्य मानता हो, वह सभ्यता होने के अलावा कुछ और हो सकता है!
और वही अकेला नहीं,उसने अपनी तरह के लाखों-करोड़ों लोगों की पूरी जमात खड़ी कर दी है, जो संसद में भी है और बाहर भी और वह जमात बहुत हद तक कानून की जद से बाहर है! तथाकथित साधु-संत भी आजकल यही भाषा बोलने में अपना गौरव मानते हैं। कथावाचकों की भाषा भी यही हो चली है और वे यही संस्कार लोगों को दे रहे हैं!
जिन्हें सरकार चलाने का काम दिया गया है, वे देश के सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय को यह बताते हैं कि उसे किस तरह का खाना, खाना है, किस तरह के कपड़े पहनने हैं,उसे अपना त्योहार किस तरह मनाना है, कहां जाना है और कहां नहीं जाना है, अपनी दुकान पर अपना धर्म लिखना है।दस लोग मिलकर किसी खाली घर में नमाज पढ़ते पाए जाएं तो यह कानूनी गुनाह की श्रेणी में आ जाता है मगर मस्जिद पर भगवा फहराना, उसके सामने हनुमान चालीसा का पाठ करना हर हाल में ‘कानूनी’ है, यह हाल है और हम चाहते हैं कि हमें दुनिया सभ्य माने,सभ्य ही नहीं बल्कि विश्व गुरु माने!
सत्ता के तथाकथित सांस्कृतिक मठ का मठाधीश यह कभी नहीं कहता कि हम सब, हिंदू – मुस्लिम सब भारतीय हैं, बल्कि वह कहता है कि इस देश का मुसलमान भी हिंदू है।उस पर हिंदू होना लादा जाता है और फिर इन ‘ हिंदुओं ‘ के साथ क्या होता रहता है, इस पर हिंदुत्व के इस मसीहा की जुबान कभी नहीं खुलती!ये सब असभ्यता की निशानियां हैं।जिस देश में अपने ही देश के वासियों के खिलाफ घुसपैठियों के नाम पर अभियान हर चुनावी राज्य में छेड़ा जाता है, वह किसी भी तरह सभ्य देश नहीं कहा जा सकता! जहां सत्तर साल के बुजुर्ग को उसके धर्म के आधार पर बेइज्जत किया जाता हो और जो उसके बचाव में आता हो, उसे तरह- तरह से प्रताड़ित किया जाता हो, वह देश अपनी प्राचीन संस्कृति, साहित्य, संगीत, नृत्य, शिल्प में अपने अनोखेपन में यह तो बताता है कि यह देश सामंती युग में भी अपेक्षाकृत सभ्य था मगर आज जब इक्कीसवीं सदी का आरंभ है, जब विज्ञान और तकनालाजी का शोर और जोर है, वहां और कोई नहीं, असभ्यता ही सिंहासन पर बैठी है।
जहां आर्थिक और सामाजिक असमानता की परवाह नहीं की जाती, जहां सामाजिक- आर्थिक बराबरी की छोटी से छोटी पहल का भी विरोध होता है, जिस देश में न्याय की संभावना न्यूनतम होती जा रही हैं, वह सभ्य देश कैसे कहा जा सकता है! जहां नये विचारों की जगह नहीं, जहां मिली-जुली संस्कृति को तिरस्कृत किया जाता हो, जहां तर्क की जगह मां और बहन की गालियों ने ले ली हो, जहां दया, करुणा और सहानुभूति की जगह न हो, जहां अंधश्रद्धा और अंधविश्वास को महत्व दिया जाता हो, जहां दूसरे धर्मों के प्रति सम्मान का भाव न हो, जहां अंबेडकर की पूजा की जाती हो मगर संविधान तथा कानून को सत्ता में बैठे लोग धता बताते हों, जहां हत्यारों और बलात्कारियों को संरक्षण दिया जाता हो, उनके समर्थन में जुलूस निकाले जाते हों, जहां गंगा और यमुना जैसी नदियों पर एक धार्मिक समूह अपना एकाधिकार मानता हो, वहां सभ्यता की जगह कहीं कोने में बची हो तो बची हो! जहां सवालों से सत्ता घबराती हो, भयभीत होती हो, वहां से सभ्यता समझो कि पलायन कर चुकी है।
(विष्णु नागर की पोस्ट से साभार)
