सम्पादकीय

कॉंग्रेस की दुविधाः गांधी के राम या जय सियाराम- जीवेश चौबे

August 10, 2020

गौ़रतलब है कि तब गांधी उम्र के उसी पड़ाव में थे जिसमें आज राहुल गांधी हैं । तब यानि 100 वर्ष पूर्व तिलक के ब्राह्मणवादी और संभ्रांतवादी विचारधारा के विपरीत गांधी कॉंग्रेस की कट्टरवादी धर्म, जाति, संप्रदाय और लिंग भेद की सारी रूढ़ियों को तोड़ नई प्रगतिशील विचारधारा को आत्मसात करते हैं। आज 100 वर्ष […]

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भीष्म साहनी जयंती 8 अगस्त पर उनकी कहानी- चीफ की दावत

August 7, 2020

प्रेमचंद की तरह भीष्म साहनी ने भी समाज को उसी बारीकी से देखा-समझा था लेकिन, यह प्रेमचंद से आगे का समाज था इसलिए उनकी लेखनी ने विरोधाभासों को ज्यादा पकड़ा ।उनकी जयंती 8 अगस्त पर पढ़ें उनकी कहानी- चीफ की दावत आज मिस्टर शामनाथ के घर चीफ की दावत थी। शामनाथ और उनकी धर्मपत्नी को […]

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अल्काजी: एक बड़े पर्दे का गिरना – मंगलेश डबराल

August 7, 2020

अल्काजी 95 वर्ष की भरपूर उम्र में दुनिया को छोड़ कर गए हैं। लेकिन जाना हमेशा के लिए एक विशाल नाट्य-दृश्य के पर्दे का गिरना है जो अब कभी खुलेगा नहीं।  ‘ऐसे किले जब टूटते हैं तो अन्दर से भरभराकर टूटते हैं!’ सन 1972 में जब यह वाक्य दिल्ली के पुराने किले के ऐतिहासिक अवशेषों […]

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प्रेमचंद 140 : क्या क्रांतिकारी हिंसा जीवन के प्रति प्रेम को जन्म देती है?- अपूर्वानंद

August 4, 2020

भारत में मुक्ति या क्रांति के नाम पर हिंसा की वैधता को लेकर तीखी बहस रही है। हिंसक क्रांति या विद्रोह का विचार घातक रूप से आकर्षक बना हुआ है। भारत में एक हीन भावना अंग्रेज़ों से मिली आज़ादी को लेकर भी है। उसे अहिंसक मानते ही वह किंचित् हीन हो उठती है। इसी कारण […]

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प्रेमचंद 140 – प्रेमचंद : भोलेपन की बादशाहत –अपूर्वानंद

July 31, 2020

आत्मा को उल्लास देना और सत्यदर्शी आँखों के लिए शिक्षा की सामग्री जुटाना, यह साहित्य का दायित्व है। सत्य की परिभाषा भी आसान नहीं। प्रेमचंद उसे सत्य नहीं मानते जो प्रेम और सुंदरता के भाव से ख़ाली हो।…प्रेमचंद के 140 साल पूरे होने पर  ‘अज्ञेय की ‘शरणार्थी’ संग्रह की कहानी ‘बदला’ याद है?’ ‘मंदिर और […]

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प्रेमचंद- 140 : प्रेमचंद की ईद – अपूर्वानंद

July 25, 2020

हास्य अलग रस है भारतीय साहित्य शास्त्र में। हास्य-साहित्य की भी पूरी परंपरा है। हँसी एक तरह से आलोचना भी है। वह ताक़त के दावे को ख़ारिज करने का तरीक़ा है। ‘ईदगाह’ की याद इस प्रसंग में सहज ही आती है। प्रेमचंद का प्यारा हामिद हास्यपूर्ण युक्तियों का सहारा लेता है अपने दोस्तों से बदला […]

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पुण्यतिथि परः गीतों के राजकुंवर नीरज जिन्होंने कविता में अपना पता दर्द की बस्ती दर्ज किया था

July 19, 2020

नीरज को प्रेम और श्रृंगार का कवि माना जाता है लेकिन उनकी कविता में जीवन और उसकी नश्वरता की बहुत गहरी तलाश है. गोपालदास नीरज ने भरपूर जीवन जिया. उम्र के लिहाज से भी और कविता के लिहाज से भी. वे प्रेम के साथ दर्द को मिलाकर गाने वाले फ्ककड़ गीतकार थे. चार जनवरी 1925 […]

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दो घंटे नहीं बल्कि कम से कम दो हफ्ते के सुनियोजित संपूर्ण लॉकडॉउन पर विचार करें – जीवेश चौबे

July 15, 2020

बाजार का टाइम 2 घंटे कम कर दिया। अब रात 9 की बजाय शाम 7 बजे बन्द होंगे। अब रात के 2 घंटे बचाकर कोरोना के प्रभाव से क्या बचाव होगा ये तो वही बता पायेंगे जिन्होंने 7 बजे करवाया है । रोज़ नया प्रयोग ,नया फार्मूला । मगर हासिल आ रहा है शून्य। कौन […]

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कहानीः सीमा रेखाएं- कुँवर नारायण

July 13, 2020

कुँवर नारायण (19 सितम्बर 1927-15 नवम्बर 2017) नई कविता आन्दोलन के सशक्त हस्ताक्षर कुँवर नारायण अज्ञेय द्वारा संपादित तीसरा सप्तक (1959) के प्रमुख कवियों में रहे हैं। उन्हें साहित्य जगत के सर्वोच्च सम्मान ज्ञानपीठ पुरस्कार सहित कई पुरुस्कारों से सम्मानित किया गया। उनकी अनेक कृतियाँ प्रकाशित व कई भाषाओं में अनुदित हैं । ( संपादक) […]

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भीष्म साहनी : प्रगतिशील परंपरा के महत्वपूर्ण रचनाकार

July 11, 2020

प्रेमचंद की तरह भीष्म साहनी ने भी समाज को उसी बारीकी से देखा-समझा था लेकिन, यह प्रेमचंद से आगे का समाज था इसलिए उनकी लेखनी ने विरोधाभासों को ज्यादा पकड़ा आजकल महानगरों के कुछ ‘अतिकुलीन’ परिवारों में चलन शुरू हुआ है कि बच्चे अपने अभिभावकों को मम्मी-पापा कहने के बजाय उनका नाम लेते हैं. इस […]

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