सम्पादकीय

नामवरी जीवन और एकांत भरा अंतिम अरण्य- जीवेश प्रभाकर

February 19, 2020

हिंदी साहित्य की प्रगतिशील परम्परा का सबसे चमकदार सितारा अंततः अस्त हो गया। लगभग एक दशक पहले सुप्रसिद्ध साहित्यकार प्रियंवद को दिए एक साक्षात्कार में तब 80 पार के नामवर ने कहा था , मैं अपने पिता की तरह अकेला हो गया हूं । हालांकि वे तब काफी सक्रिय थे और लगातार देश भर में […]

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मौलिक अधिकार लगाते हैं राज्य की शक्तियों पर अंकुश-फैज़ान मुस्तफा

January 29, 2020

किसी भी देश का संविधान, नागरिकों और राज्य के बीच एक पवित्र बंधन है। इसके साथ ही वह एक संविदा भी है। संविधान की संकल्पना हॉब्स, लॉक और रूसो द्वारा दिए गए “सामाजिक संविदा” के सिद्धांत के आधार पर मूर्त रूप ले पाई। उनके अनुसार, राज्य की उत्पत्ति इसलिए हुई कि जो प्राकृतिक व्यवस्था थी, […]

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Religious Faith, Secularism and Gandhi-Gargi Chakravartty

January 28, 2020

The following paper was presented at an International Winter School on “Globalistion and Religious Diversity: Issues, Perspectives and the Relevance of Gandhian Philosophy”, organised by the Ambedkar University, Delhi and Aarhus University, on January 8-14, 2020. Commemorating the 150th birth anniversary of Mahatma Gandhi, I find it most relevant to talk about a subject like […]

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मुक्तिबोधः पत्रकारिता के प्रगतिशील प्रतिमान —-जीवेश प्रभाकर

December 6, 2019

पिछली आधी सदी से हिन्दी साहित्य मे मुक्तिबोध की गंभीर उपस्थिति एक  गहन बौद्धिक आवरण की तरह छाई हुई है । वर्ष 2017 उनका जन्म शताब्दी वर्ष रहा। पूरे देश में मुक्तिबोध पर केन्द्रित अनेक आयोजन हैं।एक बात ग़ौरतलब है कि अधिकांश आयोजन मुक्तिबोध की कविताओं पर ही ज्यादा केन्द्रित रहे । जाहिर है कि मुक्तिबोध […]

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