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आलेख
उर्दू हिंदी की साझी विरासत के अलम्बरदार -प्रेमचंद
कामरेड अकबर की याद में विगत 19 जनवरी 2019 को उर्दू हिंदी की साझी विरासत के आलमबरदार प्रेमचंद विषय पर एक गुफ्तगू का आयोजन किया गया। आयोजन में इलाहाबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के प्रोफेसर आशुतोष पार्थेश्वर मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित थे । कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि वरिष्ठ सम्पादक श्री ललित सुरजन तथा मुख्य अतिथि श्री महेंद्र मिश्र थे ।संचालन फैक्ट्स के संयोजक जीवेश चौबे ने किया ।
विमर्श    
कृष्णा सोबती : मध्यवर्गीय नैतिकता की धज्जियां उड़ाने वाली कथाकार -वैभव सिंह
कृष्णा जी का लेखन पंजाबी संस्कृति-समाज में स्त्री की स्थिति तथा उसके संघर्ष से आम हिंदी पाठक को परिचित कराने वाला लेखन रहा है। मर्जी से लिखना और तरह-तरह की घरेलू-पारिवारिक सत्ताओं पर सवाल खड़े करना उनके लेखन की शानदार उपलब्धि रही है। घरेलू-पारिवारिक सत्ता से लड़ने वाले उनके हौसले ने ही आगे चलकर उन्हें फासीवाद व सांप्रदायिकता से भी लड़ने के लिए तैयार किया। शायद किसी भी जेन्युइन लेखक की तरह किसी भी संरक्षण या लालच को नकार कर आगे बढ़ना ही उनकी बुनियादी प्रवृत्ति थी। लेखक की कलम को पकड़ लेना और उसे अपने हिसाब से लिखवाने के वे सख्त खिलाफ थीं।
हिन्दी प्रदेश पर बहुत कुछ निर्भर है --रवि भूषण
हिन्दी प्रदेश एक समय मुस्लिम सम्प्रदायवाद का केन्द्र था। आज वह हिन्दू सम्प्रदायवाद का केन्द्र है। इससे मुकाबला करने वाली शक्तियां नगण्य हैं। पूरा हिन्दी प्रदेश प्रतिक्रियावाद का गढ़ है। 1857 की लड़ाई में हिन्दी प्रदेश की प्रमुख भूमिका थी। अंग्रेजों से लड़ने में सब एक साथ थे। ऐसी एकजुटता फिर कभी देखी नहीं गयी। उसी समय से हिन्दी प्रदेश अंग्रेज शासकों की आंख में खटकता रहा। उन्होंने भाषा, धर्म के आधार पर पूरी तरह तोड़ा। आजादी या सत्ता हस्तांतरण के बाद भी इसमें कोई कमी नहीं आयी। हिन्दी प्रदेश को बार-बार कमजोर किया जाता रहा। अकबर के समय में सामंतवाद कमजोर हुआ था। बाद में इसे मजबूत किया गया।
नई करवट लेता भारत का किसान आन्दोलन
भारत का किसान आंदोलन आज एक नई करवट ले रहा है. एक तरफ देश में सत्तासीन भाजपा देश को कारपोरेट फासीवादी शासन की दिशा में धकेलने के लिए जोर लगाए है तो दूसरी ओर इन नीतियों से तबाह देश का किसान आंदोलन की नई इबारत लिखने की तैयारी में दिख रहे हैं. देश के 210 किसान संगठनों का एक मंच पर आना और किसान मुक्ति यात्रा से लेकर किसान मुक्ति संसद के बाद अब तक चल रहा किसानों का हाल का धारावाहिक राष्ट्रव्यापी आंदोलन यही संदेश दे रहा है. यह पहली बार है कि देश के 210 किसान संगठन अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति नाम के एक साझे मंच पर एकत्रित हुए हैं. यह भी पहली बार है कि असम से लेकर गुजरात तक और कश्मीर से लेकर तमिलनाडु तक के किसान संगठन इसमें शामिल हुए हैं
सरोकार      
3 मार्च को दिल्ली संसद मार्ग पर मज़दूर अधिकार संघर्ष रैली
मजदूरों पर बढ़ते हमले एवं पूंजीपति वर्ग के हित में केंद्र तथा विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा लागू किए जा रहे नव उदारवादी नई आर्थिक नीतियों के हमलों के प्रतिकार स्वरूप देशभर के जुझारू मज़दूर संगठन एक संघर्षशील मंच पर एकत्रित हुए। समझौताहीन जुझारू संघर्ष व देश में मजदूर आंदोलन का एक वैकल्पिक ताकत खड़ा करने के लिए मजदूर अधिकार संघर्ष अभियान (मासा) का गठन हुआ था, जिसमें देश के अलग-अलग राज्यों से 15 से ज्यादा घटक संगठन शामिल हैं।
निराश करता है 'भावेश जोशी
फिल्म सवाल तो कई उठाती है और उनके फिल्मी तथा कॉमिक बुक्सनुमा हल भी देती है परंतु बांधती नहीं।जुबानी खर्च करना आसान है। जमीन पर उतरकर काम करना कठिन। यही वजह है कि भ्रष्टाचार देश में खत्म नहीं होता। नेताओं की सत्ता पर पकड़ लगातार मजबूत होती है और आम आदमी की आवाज निरंतर कमजोर होती जाती है। यह एक डार्क फिल्म के रूप में सामने आती है। मुंबई के तीन दोस्तों को आज के हालात परेशान करते हैं और वे अपने स्तर पर उनसे निपटने की सोचते है। यू-ट्यूब पर इंसाफ टीवी चैनल बना कर वे प्रशासन और सत्ता से टकराते भी हैं।
क्या राफेल के दाग़ जवानों के खून से धुलेंगे
ये सिर्फ़ मोदी सरकार के ही समय में हुआ है कि सोये हुए जवानों पर हमला किया गया है। पहले पठानकोट, फिर उरी और अब पुलवामा में सोये हुए जवानों को निशाना बनाया गया है। इससे पहले तो जवान सिर्फ सीमा पर लड़ते हुए ही मारे जाते थे। सरकार जब भी राफेल जैसे स्कैम में फंसती है, या चुनाव नजदीक होते हैं बलि के बकरे की तरह जवान राष्ट्रवाद के देवता के आगे चढ़ा दिये जाते हैं। ये केवल इसी सरकार के समय में हुआ है कि जवान सो रहे हैं और उन्हें बड़ी संख्या में कथित आतंकी मारकर भाग जाते हैं।
हाशिये के लोगों को समर्पित होगा छठा उदयपुर फ़िल्म फेस्टिवल
छठे फ़िल्म फ़ेस्टिवल में पंजाब के भूमिहीन किसानों पर बनी दस्तावेज़ी फ़िल्म लैंडलेस का प्रीमियर शो भी होगा. इसके निर्देशक रणदीप सिंह भी फेस्टिवल में मौजूद रहेंगे. इसी तरह मीडिया के सत्र में चलचित्र अभियान के सफ़र को उनके दो एक्टिविस्ट विशाल और शाकिब दर्शकों के साथ साझा करेंगे. फेस्टिवल का उदघाटन शुक्रवार 28 दिसंबर को दुपहर 12 बजे पवन श्रीवास्तव के वक्तव्य से होगा जिसके तुरंत बाद होईचोई समूह के दो म्यूज़िक वीडियो रंग और एक देश कब बड़ा होता है से फेस्टिवल की विधिवत शुरुआत होगी. फ़िल्म फेस्टिवल में ही नवारुण से प्रकाशित कवि रमाकांत यादव विद्रोही के काव्य संग्रह नयी खेती का लोकार्पण भी होगा. गौरतलब है कि फेस्टिवल में विद्रोही पर बनी फ़िल्म मैं तुम्हारा कवि हूँ का प्रदर्शन भी किया जाएगा.