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ब्रेकिंग न्यूज़ :

रामनरेश राम : किसानों की मुक्ति के प्रति प्रतिबद्ध एक क्रांतिकारी कम्युनिस्ट-------------10 वां पटना फिल्मोत्सव ----------------असीमित अपेक्षाओं और वायदों के अमल की चुनौतियों की पहली पायदान पर ख़रे उतरे मुख्यमंत्री भूपेश बघेल----------नई करवट लेता भारत का किसान आन्दोलन------------------अजीत जोगी : न किंग बने न किंगमेकर -दिवाकर मुक्तिबोध----------------------- | राजनीति का समाजशास्त्रीय अध्ययन---प्रभाकर चौबे------मुफ्त सार्वजनिक परिवहन का यह एस्तोनियाई मॉडल बाकी दुनिया के लिए कितना व्यावहारिक है?------------कितना मुमकिन हैं कश्मीर में पंचायत चुनाव---------कुलदीप नैयर का निधन-------चे गेवारा : एक डॉक्टर जिसके सपने जाने कितनों के अपने बन गए--------निराश करता है 'भावेश जोशी--------तर्कशील, वैज्ञानिक, समाजवादी विवेकानंद-- डा दत्तप्रसाद दाभोलकर-------डॉनल्ड ट्रंप पर महाभियोग का कितना खतरा----- | राजनीति में शांत रस काल चल रहा -प्रभाकर चौबे सबके हबीब - जीवेश प्रभाकर'महागठबंधन' लोगों की भावना है न कि राजनीति, बीजेपी के खिलाफ पूरा देश एकजुट:राहुल गांधीफीफा वर्ल्ड कप , जानिए कुछ रोचक तथ्यचे गेवारा : एक डॉक्टर जिसके सपने जाने कितनों के अपने बन गए..निराश करता है 'भावेश जोशी.फीफा वर्ल्ड कप , जानिए कुछ रोचक तथ्य. | | नक्सली हिंसा छोड़े तो वार्ता को तैयार : मनमोहन | केन्द्रीय निगरानी समिति के अध्यक्ष ने राजधानी में किया दो राशन दुकानों का आकस्मिक निरीक्षण | मुख्यमंत्री से न्यायमूर्ति श्री वाधवा की सौजन्य मुलाकात | राशन वितरण व्यवस्था का जायजा लेंगे न्यायमूर्ति श्री डी.पी.वाधवा | सरकार कश्मीर के बारे में पूरी तरह बेखबर : करात | मुख्यमंत्री ने दी 'ओणम्' की बधाई |
आलेख
मंत्री पद की लालसा, संवैधानिक दिक्कतें और जनमानस-- जीवेश चौबे
जनमानस पर पड़ने वाला प्रभाव काफी महत्वपूर्ण होता है जिसकी ओर चुनाव जीतने के बाद कम ही ध्यान दिया जाता है । यह तथ्य समझना जरूरी है कि जनता बड़ी उम्मीद व अपेक्षाओं से किसी भी पार्टी को सत्ता में लाती है, मगर पार्टी के अंतर्कलह का उसके मानस पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है और उसे काफी निराशा होती है । विशेष रूप से छत्तीसगढ़ में जिस तरह हताश होकर जनता ने पूर्ववर्ती सरकार के प्रति आक्रोश व्यक्त करते हुए कॉंग्रेस को लगभग तीन चौथाई बहुमत से सत्ता सौंपी है उससे जन अपेक्षाओं के प्रति कॉंग्रेस की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है ।
विमर्श    
बुलंदशहरः दंगे के पीछे की कहानी -राम पुनियानी
दिसंबर 2018 की शुरुआत में, मुसलमानों का एक बड़ा जमावड़ा (इज्तेमा) बुलंदशहर में हुआ। इसमें लगभग 50 लाख मुसलमानों ने भागीदारी की। इस तरह के जमावड़े देश के विभिन्न भागों में अलग-अलग समय पर होते रहते हैं। इस जमावड़े के स्थल से कुछ ही किलोमीटर दूर, सियाना गाँव में यह घटना हुई। रपटों से ऐसा लगता है कि किसी ने एक कटी हुई गाय के शरीर के हिस्से एक खेत में फ़ेंक दिए। इसकी सूचना गाँव वालों ने पुलिस को दी, जिसने कानून के अनुसार कार्यवाही करने का निर्णय लिया। जब इन टुकड़ों को एक ट्रेक्टर ट्राली में ले जाया जा रहा था, अचानक 40-50 बाहरी युवकों गाँव में पहुँच गए और ट्रेक्टर ट्राली पर कब्ज़ा कर लिया। कुछ रपटों के अनुसार, गाय के टुकड़ों को भारतीय जनता युवा मोर्चा और बजरंग दल के सदस्यों ने ही फेंका था। कुछ पत्रकारों का कहना है कि पूरे घटना को बाहरी तत्वों ने अंजाम दिया।
हिन्दी प्रदेश पर बहुत कुछ निर्भर है --रवि भूषण
हिन्दी प्रदेश एक समय मुस्लिम सम्प्रदायवाद का केन्द्र था। आज वह हिन्दू सम्प्रदायवाद का केन्द्र है। इससे मुकाबला करने वाली शक्तियां नगण्य हैं। पूरा हिन्दी प्रदेश प्रतिक्रियावाद का गढ़ है। 1857 की लड़ाई में हिन्दी प्रदेश की प्रमुख भूमिका थी। अंग्रेजों से लड़ने में सब एक साथ थे। ऐसी एकजुटता फिर कभी देखी नहीं गयी। उसी समय से हिन्दी प्रदेश अंग्रेज शासकों की आंख में खटकता रहा। उन्होंने भाषा, धर्म के आधार पर पूरी तरह तोड़ा। आजादी या सत्ता हस्तांतरण के बाद भी इसमें कोई कमी नहीं आयी। हिन्दी प्रदेश को बार-बार कमजोर किया जाता रहा। अकबर के समय में सामंतवाद कमजोर हुआ था। बाद में इसे मजबूत किया गया।
नई करवट लेता भारत का किसान आन्दोलन
भारत का किसान आंदोलन आज एक नई करवट ले रहा है. एक तरफ देश में सत्तासीन भाजपा देश को कारपोरेट फासीवादी शासन की दिशा में धकेलने के लिए जोर लगाए है तो दूसरी ओर इन नीतियों से तबाह देश का किसान आंदोलन की नई इबारत लिखने की तैयारी में दिख रहे हैं. देश के 210 किसान संगठनों का एक मंच पर आना और किसान मुक्ति यात्रा से लेकर किसान मुक्ति संसद के बाद अब तक चल रहा किसानों का हाल का धारावाहिक राष्ट्रव्यापी आंदोलन यही संदेश दे रहा है. यह पहली बार है कि देश के 210 किसान संगठन अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति नाम के एक साझे मंच पर एकत्रित हुए हैं. यह भी पहली बार है कि असम से लेकर गुजरात तक और कश्मीर से लेकर तमिलनाडु तक के किसान संगठन इसमें शामिल हुए हैं
सरोकार      
10 वां पटना फिल्मोत्सव
10 वें पटना फिल्मोत्सव के आखिरी दिन की शुरुआत कार्लोस सलदान्हा निर्देशित एनिमेशन फिल्म फर्दीनांद से हुई। एक प्यारा-से बछड़े की कहानी है, जिसका नाम फर्दीनांद है। जो अपने हमउम्र बछड़ों से एक लाल रंग के फूल को बचाने की कोशिश करता है। उसके हमउम्र बछड़े अपने पिताओं की ताकत की तारीफ करते हैं, दावे करते हैं कि उनके पिता ही बुल फाइटिंग के लिए चुने जाएंगे। वे आपस में झगड़े भी करते हैं। लेकिन फर्दीनांद को उनकी शैतानियों में कोई दिलचस्पी नहीं है। उसे तो फूूल-पत्तों से प्यार है। उसे लड़ाई पसंद नहीं है। संयोग से फर्दीनांद के पिता ही बुल फाइटिंग के लिए चुने जाते हैं। उन्हें विदा करते हुए फर्दीनांद सवाल करता है कि क्या बिना लड़े कोई जीत नहीं सकता? पिता के पास इसका जवाब नहीं है।
निराश करता है 'भावेश जोशी
फिल्म सवाल तो कई उठाती है और उनके फिल्मी तथा कॉमिक बुक्सनुमा हल भी देती है परंतु बांधती नहीं।जुबानी खर्च करना आसान है। जमीन पर उतरकर काम करना कठिन। यही वजह है कि भ्रष्टाचार देश में खत्म नहीं होता। नेताओं की सत्ता पर पकड़ लगातार मजबूत होती है और आम आदमी की आवाज निरंतर कमजोर होती जाती है। यह एक डार्क फिल्म के रूप में सामने आती है। मुंबई के तीन दोस्तों को आज के हालात परेशान करते हैं और वे अपने स्तर पर उनसे निपटने की सोचते है। यू-ट्यूब पर इंसाफ टीवी चैनल बना कर वे प्रशासन और सत्ता से टकराते भी हैं।
रामनरेश राम : किसानों की मुक्ति के प्रति प्रतिबद्ध एक क्रांतिकारी कम्युनिस्ट
किसान-मजदूरों, दलित-वंचित-उत्पीड़ित समुदायों और लोकतंत्रपसंद लोगों के पसंदीदा नेता, 60 के दशक के लोकप्रिय मुखिया और 1995 से लगातार तीन बार विधायक रहने वाले अत्यंत ईमानदार और जनप्रिय विधायक का. रामनरेश राम का पूरा जीवन एक प्रतिबद्ध क्रांतिकारी कम्युनिस्ट का जीवन था। 1924 में जन्मे का. रामनरेश राम जब मीडिल स्कूल में पढ़ रहे थे, तभी 1942 का आंदोलन हुआ। उसी साल 15 सितंबर को भोजपुर के लसाढ़ी गांव में आंदोलनकारियों की तलाश में गए ब्रिटिश हुकूमत के सैनिकों का किसानों ने परंपरागत हथियारों के साथ प्रतिरोध किया और उनकी मशीनगन की गोलियों से शहीद हुए। का. रामनरेश राम उन शहीद किसानों को कभी भूल नहीं पाए। स्कूल की पढ़ाई छूट गई और वे आंदोलन का हिस्सा हो गए। उसके कुछ वर्षों बाद ही तेलंगाना का किसान विद्रोह हुआ, उसके नेतृत्वकारी बालन और बालू की फांसी की खबर और आंदोलनकारियों पर लादे गए फर्जी मुकदमों के विरुद्ध कानूनी लड़ाई लड़ने के लिए फंड जुटाने के लिए की गई कम्युनिस्ट पार्टी की अपील उन तक पहुंची और वे फंड जुटाने के कार्य में लग गए।
हाशिये के लोगों को समर्पित होगा छठा उदयपुर फ़िल्म फेस्टिवल
छठे फ़िल्म फ़ेस्टिवल में पंजाब के भूमिहीन किसानों पर बनी दस्तावेज़ी फ़िल्म लैंडलेस का प्रीमियर शो भी होगा. इसके निर्देशक रणदीप सिंह भी फेस्टिवल में मौजूद रहेंगे. इसी तरह मीडिया के सत्र में चलचित्र अभियान के सफ़र को उनके दो एक्टिविस्ट विशाल और शाकिब दर्शकों के साथ साझा करेंगे. फेस्टिवल का उदघाटन शुक्रवार 28 दिसंबर को दुपहर 12 बजे पवन श्रीवास्तव के वक्तव्य से होगा जिसके तुरंत बाद होईचोई समूह के दो म्यूज़िक वीडियो रंग और एक देश कब बड़ा होता है से फेस्टिवल की विधिवत शुरुआत होगी. फ़िल्म फेस्टिवल में ही नवारुण से प्रकाशित कवि रमाकांत यादव विद्रोही के काव्य संग्रह नयी खेती का लोकार्पण भी होगा. गौरतलब है कि फेस्टिवल में विद्रोही पर बनी फ़िल्म मैं तुम्हारा कवि हूँ का प्रदर्शन भी किया जाएगा.