दिल्ली दंगाःदेवांगना के कथित भड़काऊ भाषण का कोई वीडियो अदालत में पेश नहीं कर पाई दिल्ली पुलिस

दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा पिंजरा तोड़ की सदस्य और जेएनयू की शोध छात्रा देवांगना कालिता की ज़मानत याचिका पर सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट की ओर से वीडियो मांगने पर पुलिस ने कहा कि उसके पास उस समय के कोई वीडियो नहीं हैं जिससे साबित हो कि पिंजरा तोड़ समूह के लोग और देवांगना कालिता, दंगों की घटना के दौरान कथित तौर पर भड़काऊ भाषण दे रही थी।

दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा पिंजरा तोड़ की सदस्य और जेएनयू की शोध छात्र देवांगना कालिता की ज़मानत याचिका पर सुनवाई के दौरान कोर्ट ने दिल्ली पुलिस से कहा कि उत्तर-पूर्वी दिल्ली में सांप्रदायिक हिंसा के दौरान भड़काऊ भाषण देते हुए पिंजरा तोड़ की सदस्य के वीडियो दिखाए। लेकिन पुलिस ने कहा कि उसके पास उस समय के वीडियो नहीं हैं जब पिंजरा तोड़ समूह के लोग और वांगना, भड़काऊ भाषण दे रहीं थी।

दिल्ली पुलिस का ये ज़वाब किसी के लिए भी पचा पाना मुश्किल है क्योंकि आजकल पुलिस हर छोटे बड़े प्रदर्शनो की वीडियोग्राफी करती है। दिल्ली हमले या दंगे को लेकर दिल्ली पुलिस की जांच को लेकर लगातार पुलिस की कार्रवाई को लेकर गंभीर सवाल खड़े करती है।

गौरतलब है कि जिस दिन और जगह की घटना का जिक्र पुलिस कर रही है वहां एक तो मीडिया का जमघट था साथ ही आजकल सोशल मीडिया पर भी वीडियो खूब मिलते हैं इसके अलावा आजकल सबके हाथ में मोबाइल है जिसमे वीडियो रिकॉर्डिंग होती है। ऐसे में पुलिस का ये कहना कि उसके पास कोई फुटेज नहीं है जब वह भीड़ को उकसा रही थीं! इससे क्या समझ आता है यही कि ये पिंजरा तोड़ और देवांगना पर आरोप बिना किसी ठोस सबूत के लगा दिए गए।

ये दिल्ली दंगे से जुड़ा कोई पहला मामला नहीं है जब पुलिस के दावे संदिग्ध हैं और उसके तर्क पर विश्वास करना मुश्किल हो रहा हो। कोर्ट ने भी पुलिस के बयान पर सवाल किया जिसका जवाब दिल्ली पुलिस के पास नहीं था। वो बस एक बात दोहरा रही है कि पिंजरा तोड़ के सदस्यों ने लोगो को हिंसा के लिए उकसाया लेकिन उसको प्रमाणित करने के लिए अभी तक वो कोई भी ठोस सबूत नहीं दे सकी।

पुलिस के कमज़ोर तर्क और कोई सबूत न दे पाने के कारण देवांगना को दो अन्य मामलों में जमानत चुकी है। लेकिन पुलिस जब भी उन्हें किसी मामले में ज़मानत मिलती तुरंत उन्हें नए मामले में गिरफ़्तार कर लेती है। पुलिस ने उन्हें 23 मई से पुलिस हिरासत में ले रखा है, लेकिन पुलिस अब तक उनके दिल्ली दंगे में शामिल होने का कोई भी सबूत नहीं दे पाई है। इसको लेकर सामाजिक संगठन और कई लोग लगातार सवाल उठा रहे हैं। उनका कहना है कि पुलिस एक झूठी पटकथा के तहत जन आंदोलनों के नेता, छात्रों, शिक्षाविदों को दिल्ली दंगे के मामले में फंसा रही है लेकिन पुलिस अपने दावों के समर्थन में कोई भी सबूत पेश नहीं कर पा रही है।

विदित हो कि कलिता और समूह की एक अन्य सदस्य नताशा नरवाल को मई में दिल्ली पुलिस की अपराध शाखा ने गिरफ्तार किया था और उन पर भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज किया गया था, जिसमें दंगा, गैरकानूनी विधानसभा और हत्या का प्रयास शामिल था। दंगों में कथित रूप से एक “पूर्व-निर्धारित साजिश” का हिस्सा होने के लिए, उन्हें एक अलग आतंकवाद निरोधक कानून यूएपीए के तहत गिरफ़्तार किया गया है।

कुल मिलाकर, कालिता के खिलाफ चार मामले दर्ज किए गए हैं, जिसमें इस साल के शुरू में पूर्वोत्तर दिल्ली दंगों के संबंध में और पुरानी दिल्ली के दरियागंज इलाके में पिछले साल दिसंबर में नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) के खिलाफ विरोध प्रदर्शन के दौरान हिंसा शामिल है। कलिता को दो मामलों में दरियागंज और एक पूर्वोत्तर दिल्ली में जमानत मिल चुकी है।​​​

(एजंसियां)

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