मनोरंजन

महिला-विरोधी फिल्मों के बीच पितृसत्ता की बेड़ियां तोड़ती ‘द लास्ट कलर’

March 8, 2021

श्रेया हाल में ही एमज़ॉन प्राइम पर आई फिल्म ‘द लास्ट कलर’ इस पितृसत्तात्मक समाज की बेड़ियों को तोड़ती हुई महिलाओं, मूलतः विधवाओं के हकों की बात करती है। बनारस में फिल्माई गई यह फिल्म महिला केन्द्रित फिल्म है जो विधवाओं के साथ होने वाले अमानवीय बर्ताव के अलावा और भी कई संजीदा विषयों के […]

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नरेंद्र शर्मा: यूसुफ को ‘दिलीप कुमार’ बनाने वाले कवि, लेखक, गीतकार

March 2, 2021

एम.ए. समीर नरेंद्र शर्मा पहले मदन मोहन मालवीय की पत्रिका ‘अभ्युदय’ से जुड़े, उसके बाद उन्होंने सिनेमा, आकाशवाणी और दूरदर्शन से भी जुड़े. भारतीय सिनेमा के अभिनय सम्राट को ‘दिलीप कुमार’ नाम देने वाले और भारतीय रेडियो प्रसारण में आकाशवाणी के सबसे लोकप्रिय चैनल ‘विविध भारती ’ को ‘विविध भारती’ नाम देने वाले भी नरेंद्र […]

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कुलभूषण खरबंदा: कालीन भैया के बाऊ जी…

February 23, 2021

सुनील मिश्र “कुलभूषण खरबंदा ऐसे कलाकार हैं, जिनके लिए भूमिकाएं लिखी नहीं जा सकतीं, क्योंकि वे किसी किरदार को निभाते नहीं, बल्कि जीते हैं” मिर्जापुर के दो सीजन देखते हुए ध्‍यान कुलभूषण खरबंदा पर एकाग्र हो जाता है। सामने एक किरदार बैठा है जिसका नाम है, सत्‍यानंद त्रिपाठी। उसका बेटा अखंडानंद त्रिपाठी मिर्जापुर का बाहुबली […]

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नसुड़ी यादव: कहु धौं छूत कहां सों उपजी, तबहि छूत तुम मानी

February 20, 2021

 रामजी यादव नसुड़ी यादव बिरहा गायन के इतिहास के सबसे अलग, विलक्षण और बोल्ड गायक थे। वे बिरहा के आदि विद्रोही थे और उन्होंने पूर्वांचल के समाज में व्याप्त सांस्कृतिक जड़ता, अज्ञानता, धार्मिक अंधविश्वासों और मिथकों पर इतना जोरदार प्रहार किया कि खुद मूर्तिभंजन के एक मिथक बन गए। अपने जीवनकाल में ही वे किम्वदंती […]

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‘सामने ईसा मसीह का जीवन चरित्र चल रहा था तो मेरे मन के चक्षु भगवान राम के चित्र देख रहे थे’- दादा साहब फालके

February 17, 2021

दादा साहब फालके का लिखा यह आलेख 1913 में तब की मशहूर पत्रिका नवयुग में छपा था. इसमें उन्होंने अपने संघर्षों की कहानी कही है 1910 में बंबई के अमरीका-इंडिया पिक्चर पैलेस में मैंने ‘द लाइफ ऑफ़ क्राइस्ट’ फिल्म देखी. इससे पहले, कई बार अपने परिवार या मित्रों के साथ फिल्में देखी होंगी, लेकिन क्रिसमस […]

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ग़ालिब अगर शायर न होते तो उनके ख़त ही उन्हें अपने दौर का सबसे ज़हीन इंसान बना देते

February 16, 2021

अनुराग भारद्वाज अपनी मौत से एक दिन पहले ग़ालिब ने नवाब लोहारू के खत का जवाब कुछ यूं लिखवाया- मुझसे क्या पूछते हो कि कैसा हूं? एक या दो दिन ठहरो फिर पड़ोसी से पूछ लेना सौं उससे पेश-ए-आब-ए से बेदरी है (मैं झूठ बोलूं तो प्यासा मर जाऊं), शायरी को मैंने नहीं इख़्तियाया (अपनाया). […]

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बंसी कौल : संकुचित होते रंगकर्म की एक और भयानक क्षति

February 7, 2021

अनिल शुक्ल ​बंसी कौल ने अंततः ड्रामा स्कूल से निकलने के 11 साल बाद भोपाल में जमने का फ़ैसला करते हैं। यहाँ 1984 में उन्होंने ‘रंग विदूषक‘ नाट्य संस्था की स्थापना की। …ऐसे दौर में जबकि हिंदी रंगकर्म का आकार निरंतर संकुचित होता जा रहा है और ज़रूरत उसके भीतर लोक नाट्य के नए-नए तत्वों […]

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अल्लाह जिलाई बाई : जिनकी वजह से ‘केसरिया बालम’ दुनिया को राजस्थान का न्योता बन गया

February 2, 2021

पुलकित भारद्वाज ढोला-मारू की प्रेम कहानी से जुड़ा यह लोकगीत सदियों से राजस्थान की मिट्टी में बसा है, लेकिन इसे सम्मान के सर्वोच्च शिखर तक पहुंचाया अल्लाह जिलाई बाई ने । सुनिए नग्मा- आसमान तक ऊंचे रेत के धोरे और रेत की ही सुनहरी चादर में लिपटी जमीन. दूर-दूर तक दिखता रेत का अनंत सैलाब […]

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ओपी नैयर : जो तालियों, सीटी और घोड़े की टापों से संगीत निकालते थे

January 29, 2021

अंजलि मिश्रा अक्खड़पन और स्वछंदता ओपी नैयर की पहचान थी और शायद इसी असर ने उनके संगीत को इतना लोकप्रिय बनाया यदि विद्रोह किसी के व्यक्तित्व का अभिन्न हिस्सा है तो उसका जिद्दी होना भी कोई असामान्य बात नहीं है. नैयर जिद्दी भी खूब थे. तभी तो लता मंगेशकर जैसी गायिका से कभी न गवाने […]

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‘तांडव’ हिंदू विरोधी नहीं बल्कि कुछ जगहों पर प्रो-हिंदू है

January 22, 2021

शुभम उपाध्याय भगवान शिव वाले सीन से जुड़े अनावश्यक विवाद में कोई तांडव के उस पक्ष की ओर क्यों नहीं देखता जो प्रो-हिंदू है? एक लोकतांत्रिक किरदार जिसका नाम शिवा है वह अपनी पार्टी खड़ी करते वक्त कहता है कि ‘हम सबके अंदर एक गुस्सा है. बहुत सारा गुस्सा… और मेरा तो नाम ही शिवा […]

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