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मनोज रूपड़ा प्रकरण में लेखक और लेखक संगठन तो लेखक के अपमान के खिलाफ़ अपना आक्रोश और विरोध प्रकट कर रहे हैं मगर यह सवाल तो खड़ा होता ही है कि अफसोसनाक घटना के पश्चात केंद्रीय विश्वविद्यालय की धूमिल होती प्रतिष्ठा और बदनामी को लेकर उस विश्वविद्यालय का प्राध्यापक संघ चुप क्यों हैं?
मनोज रूपड़ा प्रकरण में लेखक बिरादरी का आक्रोश सामूहिक रूप से खुलकर सामने आ रहा है। एक लंबे अरसे के बाद ऐसा माहौल दिख रहा है जो स्वागतेय है।
किसी भी संस्थान के प्रमुख से ऐसे अशोभनीय व्यवहार की अपेक्षा नहीं की जा सकती ,विशेषकर केंद्रीय विश्वविद्यालय जैसे महत्वपूर्ण शैक्षणिक संस्थान के कुलपति द्वारा आमंत्रित अतिथि को अपमानित करना निश्चित रूप से निंदनीय है। इसकी जितनी भर्त्सना की जाए कम है।
कुछ सवाल जो मनोज रूपड़ा प्रकरण में कौंध रहे हैं कि जहां एक लेखक का अपमान किया गया उससे क्या उस विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठा धूमिल नहीं हो रही? क्या छत्तीसगढ़ के केंद्रीय विश्वविद्यालय की देश भर में बदनामी नहीं हुई ?
लेखक और लेखक संगठन तो लेखक के अपमान के खिलाफ़ अपना आक्रोश और विरोध प्रकट कर रहे हैं मगर यह सवाल तो खड़ा होता ही है कि अफसोसनाक घटना के पश्चात केंद्रीय विश्वविद्यालय की धूमिल होती प्रतिष्ठा और बदनामी को लेकर उस विश्वविद्यालय के प्राध्यापक चुप क्यों हैं? उस विश्वविद्यालय के प्राध्यापक संगठन,यदि गठित है, सहित प्रदेश भर के प्राध्यापक संगठनों ने चिंता या नाराजगी जताई क्या ?और क्यों नहीं जताई? भयभीत हैं या निर्लिप्त।
एक समय प्राध्यापक संघ बहुत दमदार और प्रभावशाली हुआ करता था,और संवेदनशील भी। ऐसे अवसरों पर प्राध्यापक संगठन की भूमिका बहुत अहम होती थी क्योंकि विश्वविद्यालय की मान मर्यादा के मसलों पर वे खुलकर वीसी, प्रशासन और कई बार तो सरकार के खिलाफ तक आवाज़ उठाते नजर आ जाया करते थे।
अब क्यों नहीं आते? अब क्या हुआ?
लेखकों को बुलाना तो चाहते हैं मगर जब लेखक का अपमान होता है तो मेज़बान पल्ला झाड़ लेते हैं। अपने आमंत्रित अतिथि के साथ दुर्व्यवहार के खिलाफ नहीं तो विश्वविद्यालय की छवि के लिए ही सही, विश्वविद्यालय के प्राध्यापक संघ,कर्मचारी संगठन और यहां तक कि छात्र संघ भी कुछ नहीं बोलते। या तो बोल नहीं पाते या शायद बोलना ही नहीं चाहते।
खबर आ रही है कि वीसी के दुर्व्यवहार की इस घटना के चलते विश्वविद्यालय को साहित्य अकादमी द्वारा आगामी आयोजनों के लिए कोई अनुदान नहीं दिए जाएंगे। इससे किसका नुकसान हो रहा है? वीसी तो अपना कार्यकाल खत्म कर चले जाएंगे मगर इसका खामियाजा तो विश्वविद्यालय के प्राध्यापकों और छात्रों को ही भुगतना पड़ेगा।
शैक्षणिक संस्थानों के प्रशासनिक पदों पर बैठे बदमिजाज अधिकारियों की बदजुबानी, गुंडागर्दी और तानाशाही के चलते संस्थानों की बदनामी होती है,लगातार हो रही है। इन संस्थानों में कार्यरत प्राध्यापकों, कर्मचारियों में इसको लेकर कभी किसी तरह की कोई प्रतिक्रिया,सरोकार,नाराजगी या चिंता सामने नज़र नहीं आती।
प्राध्यापकों और प्राध्यापक संगठनों का मूक समर्थन, निष्क्रियता और मुर्दा चुप्पी का ही नतीजा है कि एक बदजुबान कुलपति के दुर्व्यवहार की सज़ा विश्वविद्यालय भुगत रहा है। विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठा और इसकी गरिमा को मृतप्राय बनाने में ये ही ज्यादा जिम्मेदार है।
अपने शैक्षणिक संस्थानों और प्रदेश की प्रतिष्ठा बचाने के लिए खुद प्राध्यापकों,कर्मचारियों और छात्रों को भी अपनी ज़ुबान खोलनी होगी,इनके संगठनों को आगे आना ही होगा ।
