यह नारा उस उन सारे साहित्यिक, सांस्कृतिक संदर्भों की मुखालिफत है जिसके जरिए मर्द ने औरत की जिस एक चीज को मारा , कुचला या पालतू बनाया है , वह है उसकी आजादी ।
‘एक कचौरी, दो समोसा, इन मर्दों का क्या भरोसा ‘ – पर कुछ परम्परावादियों, शुचितावादियों, कर्मकांडी आख्यानों के जरिए औरत को मर्द सत्ता का भौतिक – मानसिक उपनिवेश बनाने की कवायदों के हिमायतियों की टिप्पणियों से उबकाई आ रही है । ये कौन लोग हैं , कैसे लोग हैं जिन्हें यह गीतात्मक नारा चुभ रहा है ?
अपनी नियति पहचानने वाली ऐसी अभिव्यक्ति से उन्हें ही तकलीफ हो सकती है जो औरत को ‘ खूबसूरत दुश्मन ‘ मानते हैं । उसके साथ ‘ होना ‘ नहीं, केवल ‘ सोना ‘ चाहते हैं । औरत के साथ होने और केवल सोने की चाह में बहुत फर्क है ।
इस गीतात्मक नारे के बहुत गहरे संदर्भ हैं । इसे सतही या नकारात्मक नजर से देखना मर्द होने के हमारे तमाम पूर्वाग्रहों prejudices, biases, या preconceptions का नतीजा भी हो सकता है ।
मुझे फ़रहत एहसास का शेर याद आ रहा है —
” तमाम पैकर -ए- बदसूरती है मर्द की ज़ात
मुझे यक़ीं है ख़ुदा मर्द हो नहीं सकता… “
- पैकर -ए – बदसूरती मतलब बदसूरती का रूप या प्रतीक ( क्रूरता, अहंकार या मर्दवादी कठोरता के संदर्भ में ) । ज़ात का मतलब नस्ल या वजूद ।
( इस शेर में शायर ने मर्द जात की क्रूरता, अमानवीयता और पितृसत्तात्मक कठोरताओं पर कटाक्ष किया है । उनका कहना है कि मर्द का वजूद जिस तरह की बदसूरती और तंगख्याली का पैकर बन गया है, उसे देखकर यह पूरा यकीन हो जाता है कि इस कायनात का ख़ालिक़-ए-मुतल्क़ (सबका मालिक और रचने वाला ) सृजनहार, वह दयालु और सुंदर ख़ुदा, कभी पुरुष नहीं हो सकता )
हमारी बेटियों ने यह तो नहीं कहा — पुरूष जात पर नहीं भरोसा
संस्कृत में ‘ पुरुष ‘ शब्द की व्युत्पत्ति ‘ पुर् + कुषन् ‘ प्रत्यय के योग से मानी जाती है जिसका अर्थ है – ‘ पुरि शेते इति पुरुषः ‘ ( पुरि अर्थात् देह में तथा शेते यानी शयन करता है, वही पुरुष है ) ।
जीव के शयन – कक्ष को ही ‘ देह ‘ कहा गया है, जो देह को धारण करता है उसे ‘ देही ‘ कहा जाता है । भगवद् गीता में पुरुष /आत्मा के अर्थ में ‘ देही ‘ शब्द का ही प्रयोग किया गया है ।
‘ पुरुष ‘ शब्द का पहला अर्थ – मानव जाति का प्राणी, जिसे हम पुंल्लिंग या स्त्रीलिंग रूप से जानते हैं । यह शब्द प्राणिमात्र के लिए प्रयोग किया जाता रहा क्योंकि जीव शब्द लिंग – निरपेक्ष है, पुंल्लिंग स्त्रीलिंग दोनों में समान रूप से ही बरता जाता है । इस तरह पुरुष शब्द भी लिंग-निरपेक्ष है । सभी मानव के लिए इस शब्द का प्रयोग होता रहा किसी स्त्री या पुरुष के संदर्भ में नहीं ।
परन्तु अब यह शब्द नर जाति का ही वाचक हो गया, फलतः नारी जाति के लिए हमने स्त्री शब्द गढ़ लिया, आज का पुरुष केवल नर का ही वाचक है न कि स्त्री का, जबकि इस शब्द का आरंभिक व्याकरण ऎसा नहीं था ।
यही पुरुष शब्द नर, मनुष्य, आदमी आदि अनेक शब्दों का पर्याय बन गया है । पुरुष ही मनुष्य है,परंतु दोनों शब्दों की व्युत्पत्ति बहुत अलग – अलग है ।
सांख्य दर्शन में यही पुरुष प्रकृति का मार्गदर्शक बन जीव के मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता हुआ नज़र आता है । प्रकृति इसी के सान्निध्य में सृष्टि की रचना करती है । जहाँ यह न तो उत्पन्न होता है न किसी को उत्पन्न करता है, यह तो निष्क्रिय रहता हुआ केवल द्रष्टा भाव से ही अपना कार्य पूर्ण करता है।
पुरुष से ही निकला पौरुष, पुरुषार्थ, शौर्य , पराक्रम । मुझे इसका स्रीलिंग नहीं मालूम । अगर कोई विद्वान मार्गदर्शन करें तो उनकी कृपा होगी ।
यह गीतात्मक नारा मर्द दबंगई के खिलाफ है
‘ लोक हुंकार ‘ के संयोजक प्रो. देवेश दुबे कहते हैं — ‘ एक कचौरी दो समोसा, इन मर्दों का क्या भरोसा ‘ , ‘ एक सुट्टा दो चाय, मर्द जात हाय – हाय ‘, ‘ ठंडी चाय गरम करो, मर्द जात शर्म करो ‘, ‘ एक जीरा, दो अजवाइन, मर्द समाज करो रिजाइन ‘ , जैसे नारे दरअसल मर्द दबंगई Male Chauvinism ( एक ऐसी सामाजिक और मानसिक धारणा जिसमें पुरुषों को महिलाओं की तुलना में स्वाभाविक रूप से अधिक श्रेष्ठ, सक्षम और बुद्धिमान माना जाता है ) के खिलाफ हैं ।
यह नारा उस उन सारे साहित्यिक, सांस्कृतिक संदर्भों की मुखालिफत है जिसके जरिए मर्द ने औरत की जिस एक चीज को मारा , कुचला या पालतू बनाया है , वह है उसकी आजादी । हैनरी मिलर औरत को सिर्फ ‘ कण्ट ‘ लिखता है और पंत लिखते हैं — योनि मात्र रह गयी मानवी । ये नारे इस सोच की मुखालिफत हैं ।
socio-political economist , ‘ भारत जोड़ो यात्रा ‘ के शिल्पी विजय महाजन कहते हैं —
पुणे में आयोजित ‘ छात्रों की गूंज ‘ में राहुल गांधी जी ने छात्राओं को संबोधित करते कहा था — ‘ आप किसी के अधीन नहीं हैं , आप केवल अपने लिए हैं । पिता, पति या भाई से रिश्ते हो सकते हैं, लेकिन आपकी पहचान उनसे ही तय नहीं होती । ‘
उन्होंने छात्राओं से पितृसत्तात्मक सोच और मनुस्मृति की मानसिकता के खिलाफ मुखर होकर आवाज उठाने की अपील की । उन्होंने देश की महिलाओं को सबसे बड़ी पूंजी बताते हुए कहा कि महिलाएं पुरुषों की तुलना में अधिक संवेदनशील और दयालु होती हैं ।
विजय महाजन कहते हैं — राहुल गांधी जी के आह्वान के बाद अगर छात्राओं में आयी यह जागरूकता थोड़ी बेतरतीब और अनगढ़ भी है तो इसका एहतराम होना चाहिए । इस जागरूकता को बेहतर Social – Cultural Order समय के साथ खुद ब खुद मिल जायेगा ।
गंदगी भरे दिमाग़ , कुंठित, यौन विकृतों को छोड़िए , — ‘ कहते हैं कि दुनिया अगर चार पहाड़ों के बोझ तले पिस रही है , तो औरतों पर पांच पहाड़ों का बोझ है और पांचवा पहाड़ पुरुष सत्तात्मक विधान का है ‘ ( राजेंद्र यादव : आदमी की निगाह में औरत ) । ये नारे चलताऊ हो सकते हैं लेकिन हैं उसी मर्द सत्तात्मक विधान के खिलाफ । समाज बदलने की शुरुआत ऐसे ही होती है ।
जब तक शोषण, संघर्ष और उससे मुक्ति के सपने हमारे पास हैं न मार्क्सवाद खत्म हो सकता है न स्री – दलित विमर्श । हमें खुशी होनी चाहिए कि मुक्ति की यह चेतना किचेन और बेडरूम तक पहुंचने लगी है । ये गीतात्मक नारे भी किचेन और बेडरूम से निकले हैं , उसी की शब्दावली हैं । इस पर कथित सभ्य समाज को क्यों आपत्ति होनी चाहिए ?
नेहरू रिव्यू से साभार
