स्वच्छ भारत अभियान : बड़े पर्दे पर प्रतिध्वनियाँ

– उषा वैरागकर आठले 

माना जाता है कि फिल्म का माध्यम निर्देशक का माध्यम होता है। निर्देशक पटकथा प्राय: अपने विज़न के अनुरूप लिखवाता है। फिल्म की शूटिंग के उपरांत अभिनेताओं का फिल्म-निर्माण में रोल खत्म हो जाता है और निर्देशक तथा एडिटर मिलकर फिल्म को अंतिम आकार देते हैं। इस प्रक्रिया में अनेक दृश्य कट जाते हैं तो अनेक शॉट ज्यादा उभारे जाते हैं। इस सबके पीछे निर्देशक का विज़न महत्वपूर्ण होता है। अन्य सभी तकनीकी पक्ष उसके अनुरुप ही काम करते हैं। इसीलिए विषय या थीम एक होने के बावजूद भिन्न प्रकार की फिल्में बनती हैं।

पिछले कुछ वर्षों में स्वच्छ भारत अभियान पूरे देश में लागू करने की बड़े पैमाने पर कोशिश की गई। इस विषय पर अनेक फिल्में बनाई गईं, जिसमें बड़े बजट की ज्यादा प्रचारित-प्रसारित फिल्म ‘टॉयलेट : एक प्रेमकथा’ काफी लोकप्रिय भी हुई। लॉकडाउन के दौरान दो फिल्में इसी विषय पर मैंने देखीं। दोनों की मुख्य थीम झुग्गी-बस्ती में हरेक घर में टॉयलेट न होने के कारण होने वाली ज़िल्लत है। इसी परिप्रेक्ष्य में 2018 और 2019 में बनी दो फिल्में क्रमश: ‘हलका’ और ‘मेरे प्यारे प्राइम मिनीस्टर’ पर एक साथ बात कर रही हूँ। दोनों फिल्मों में एक समानता है कि दोनों फिल्मों में टॉयलेट बनाने के संघर्ष के केन्द्र में 8 से 10 साल के बच्चे हैं।

हिंदी में बच्चों पर केन्द्रित काफी फिल्में बनी हैं जिनमें तत्कालीन समस्याओं को चित्रित किया गया है। दो कलियाँ, परिचय जैसी कई फिल्में आज भी स्मृति में बसी हुई हैं। झुग्गी-बस्ती की ज़िंदगी को चित्रित करती अनेक फिल्में भी हिंदी सिने-जगत में प्रसिध्द हुई हैं। झुग्गी-बस्ती के बच्चों पर बनी स्लमडॉग मिलेनियर तो ऑस्कर तक भी पहुँची हैं।

नील माधव पंडा की 2018 में प्रसारित हुई फिल्म ‘हल्का’ एक ऐसे बच्चे पिचकू की कहानी है, जिसकी माँ एक अगरबत्ती उद्योग में काम करती है और पिता रिक्शा चलाता है। पिचकू नन्हा था, तब उसकी माँ उसे अपने काम पर साथ ले जाती थी। उसे गोद में सुलाकर अगरबत्ती बनाती। वह रोने लगता तो अपना सुगंधित हाथ उसके नाक के पास रखती और पिचकू चुप हो जाता। बड़े होने पर भी सोते वक्त वह माँ के हाथों को अपने नाक पर रखकर सूँघता है। इस सुगंध-प्रेम के एक नतीजे के रूप में उसे गंदगी में या खुले में शौच जाने से परहेज है। वह अपने घर में अपने लिए टॉयलेट बनवाना चाहता है, मगर उसका एक कमरे का घर बहुत छोटा है और टॉयलेट के लिए पैसा खर्च करने के लिए उसका पिता कतई तैयार नहीं है। बच्चे के खुद का टॉयलेट होने के सपने को फिल्म एक यूटोपिया की तरह रचती है। इसीतरह 2019 में जारी हुई राकेश ओमप्रकाश मेहरा की फिल्म ‘मेरे प्यारे प्राइम मिनिस्टर’ में भी एक आठ साल का बच्चा कान्हा अपने घर में टॉयलेट बनवाना चाहता है ताकि उसकी माँ के साथ फिर से कोई ज्यादती न हो पाए। वह पहले तो खुद बाँस-बल्ले और माँ की साड़ी से टॉयलेट बनाने की कोशिश करता है, फिर मुंबई महानगर पालिका के दफ्तर से होता हुआ सीधे प्रधानमंत्री भवन दिल्ली जाकर अपना आवेदन पत्र देता है। अंत में उसके मुहल्ले में सार्वजनिक शौचालय बन जाता है।

इन दोनों फिल्मों की कथा की मूल समस्या एक-सी होने के बावजूद कहानी में कुछ समानताएँ हैं और काफी अंतर भी हैं। दोनों फिल्में महानगर की झुग्गी-बस्ती में फिल्माई गई है। पहली फिल्म मुंबई के झुग्गी-बस्ती की है, दूसरी दिल्ली के गांधीनगर बस्ती की है। दोनों बस्तियाँ रेल पटरी के किनारे बसी हैं। ‘मेरे प्यारे प्राइम मिनिस्टर’ में कथा का केन्द्र देश की एक बहुत बड़ी आबादी का शौचालय विहीन होना है। स्त्रियों को शौचालय के अभाव में मुँहअंधेरे निपटने जाना पड़ता है। इस दौरान अनेक स्त्रियाँ अनेक प्रकार की दुर्घटनाओं का शिकार बनती हैं। एक बच्चे की माँ के साथ हुई ‘गंदी बात’ के कारण बच्चा अपनी माँ के लिए शौचालय बनवाने को कटिबध्द हो जाता है। वहीं ‘हलका’ में बच्चा खुद के लिए टॉयलेट बनवाना चाहता है। यह सच है कि रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा और स्वास्थ्य के साथ-साथ मल-मूत्र-विसर्जन के लिए साफ-सुथरी उचित जगह का होना भी बहुत ज़रूरी है। यह हरेक व्यक्ति की मूलभूत आवश्यकता है।

दोनों फिल्मों में समानता यह है कि, पिचकू और कान्हा दोनों ही बच्चे अपनी माँ के साथ गहरे तक जुड़े हुए हैं। माँ-बेटे का स्वाभाविक जुड़ाव फिल्म में कोमलता लाता है। दोनों बच्चों को महानगर पालिकाओं के उच्चाधिकारी संवेदनशील मिलते हैं, जो उनकी समस्या को सुलझाने में मदद करते हैं। पिचकू और कान्हा, दोनों ही अपने-अपने स्तर पर अर्थार्जन करते हैं। पिचकू कूड़ा अलग-अलग करने का काम अनेक बच्चों के साथ करता है और कान्हा पेपर बेचने के अलावा अन्य छिटपुट काम करता है। इन बच्चों को अंग्रेज़ी से कतई डर नहीं लगता। जो व्यक्ति उनसे अंग्रेज़ी में बात करता है, वे उसे सीधे हिंदी में बात करने के लिए बेझिझक कहते हैं।

पहली फिल्म शुरु ही इस गाने से होती है – ”मेरे प्यारे प्राइम मिनिस्टर/मेरी अर्जी कर लो रजिस्टर/डब्बे लेकर खड़ी हुई हैं/हाइवे पे मदर और सिस्टर।” दोनों फिल्मों में बच्चों के आसपास अनेक अच्छे पात्र हैं, जो इनकी मदद करते हैं और इनके साथ बड़े प्यार से पेश आते हैं। पिचकू को मिलने वाला ‘बड़े’ स्कूल का एक बच्चा, वहाँ की प्रिंसिपल, मॉल में सैनिटरी शॉप का सेल्समैन, उसका पिता, जो कोई नशा नहीं करता, बस उसे अपना रिक्शा बेचकर ऑटोरिक्शा लेने की धुन सवार है, उसकी बहुत समझदार माँ, गोपी, बाबा – इस तरह के अनेक पात्र हैं जो पिचकू के सपने में कहीं न कहीं सहायता ही पहुँचाते हैं। इधर कान्हा को मदद करने वालों में उसकी माँ, पप्पू पांडे, पड़ोसी राबिया, उसका पति सैफू, दोस्त रिंगटोन, निराला और मंगला हैं। म्युनिसिपल कार्पोरेशन के कर्मचारियों के पास कान्हा और उसके दोस्त पहुँचते हैं। वे गांधीनगर में टॉयलेट बनाने की माँग करते हैं। बुजुर्ग कर्मचारी उन्हें समझाता है कि उनकी पूरी बस्ती ही अवैध रूप में बसी है इसलिए शासन की नज़र में वहाँ के निवासियों का कोई अस्तित्व ही नहीं हैं। रिंगटोन पूरे विश्वास से कहता है, ‘मगर हम तो हैं।’ बौखलाकर वे कान्हा से प्रधानमंत्री को पत्र लिखने के लिए कहकर अपना पीछा छुड़ाना चाहते हैं। कान्हा इस बात को गंभीरता से लेकर प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर अपनी आपबीती सुनाता है और माँ के साथ फिर से कोई गलत बात न हो इसलिए टॉयलेट बनाना कितना ज़रूरी है, इस पर ज़ोर देता है। निराला और रिंगटोन के साथ कान्हा दिल्ली पहुँच जाता है। पता लगाते हुए वे प्रधानमंत्री आवास पहुँचते हैं। वहाँ उनकी शक्ल-सूरत देखकर उन्हें अंदर नहीं जाने दिया जाता। वे शोर मचाने लगते हैं। प्रधानमंत्री का पीए उन्हें बुलवा लेता है। मिलने पर उनकी बातें सुनकर उनका पत्र रखकर उसकी फोटो कॉपी पर सील लगवाकर उन्हें सौंपता है। उसके बच्चों के साथ संवाद और ‘हल्का’ में पिचकू के म्युनिसिपल कमिश्नर के साथ संवाद और दोनों अधिकारियों की संवेदनशीलता अविश्वसनीय लगने के बावजूद मन को स्पर्श करती है। ‘मेरे प्यारे प्राइम मिनिस्टर’ में पीए की भूमिका में अतुल कुलकर्णी और बच्चों में जो बात होती है, उस दौरान सभी का अभिनय अद्भुत है। ऑंखें, चेहरे और देहभाषा से बच्चे की टॉयलेट की ज़रूरत की अर्ज़ी का मर्म अतुल कुलकर्णी जिस तरह अभिव्यक्त करते हैं, उतना बारीक अभिनय बहुत कम दिखाई देता है।

झुग्गी-बस्ती के बच्चों को अनेक प्रकार के अनुचित कामों और बातों का किसतरह कम उम्र से ही सामना करना पड़ता है! ‘मेरे प्यारे प्राइम मिनिस्टर’ में नशीली गोलियाँ बच्चों से बनवाया जाना, वहीं अश्लील फिल्मों का दिखाया जाना, किसी एनजीओ की विदेशी महिला द्वारा बच्चों से कंडोम बँटवाकर उन्हें पैसे देने जैसे कई अनैतिक कामों में बच्चों को जोड़ा जाता है। बच्चों की प्रतिक्रियाएँ, उनकी बातचीत में इस ‘एक्सपोज़र’ से एकप्रकार का बड़प्पन का भाव आ जाता है जो उनके बचपन के साथ गूँथकर अजीब मासूमियत को व्यक्त करता है। इसतरह के एक्सपोज़र के कारण पिचकू और उसका साथी गोपी तथा उधर कान्हा और उसके दोस्त निराला, रिंगटोन और मंगला काफी निडर और अपनी-अपनी सोच रखने वाले बेझिझक व्यक्ति के रूप में दिखने लगते हैं। वे पिचकू और कान्हा को उनका सपना पूरा करने में हरसंभव मदद करते हैं। वे म्युनिसिपल कर्मचारियों, अधिकारियों से सीधे सवाल करने का माद्दा भी रखते हैं। उस छोटी सी उम्र में वे अमीरी-गरीबी और सुख-सुविधाओं के असमान वितरण पर अपनी तरह से टिप्पणियाँ करते हैं। कान्हा और रिंगटोन को कहीं-कहीं बड़ों की तरह सोचते-समझते दिखाया गया है। एक दृश्य में कान्हा को उसकी माँ भगवान से माफी माँगने के लिए कहती है। कान्हा हनुमान जी से सीधे सवाल करता है – ”तुझे मंदिर की क्या ज़रूरत है? हमें टॉयलेट की ज्यादा ज़रूरत है, मंदिर की नहीं।” माँ फिर उसे डाँटकर माफी माँगने के लिए कहती है। कान्हा फिर मूर्ति पर सवाल उछालता है – ”तेरे साथ रेप हुआ है, मैं क्यों माफी मांँगू? ;माँ से; इससे बोल तेरे से माफी माँगे। मैं नहीं माँगूंगा माफी इससे।” बस्ती के बच्चों के लिए रेप, कंडोम जैसे शब्द अपरिचित नहीं रहते।  

स्वच्छ भारत अभियान के साथ पिचकू का स्वच्छता-प्रेम अनायास गूँथ जाता है। फिल्म में जो बहुत आकर्षित करता है, वह है पिचकू का निरंतर विपरीत परिस्थितियों के बीच भी अपने टॉयलेट के सपने के लिए हरसंभव परिश्रम करना। वह रद्दी बीनने के काम के घंटे बढ़ा देता है। इधर कान्हा और उसके साथी अनेक प्रकार के स्वांग रचकर पैसा कमाते हैं मगर पकड़े जाते हैं और उनके सारे पैसे पुलिस छीन लेती है। ‘मेरे प्यारे प्राइम मिनिस्टर’ में अपनी निराशा के दौरान कान्हा और रिंगटोन गगनचुंबी इमारतों और झुग्गीबस्ती के बीच बिछी पाइपलाइन पर बैठकर अपने उम्र से बड़ी दार्शनिक बातें करते हुए अमीरी-गरीबी की गहरी खाई को महसूसते हुए गणित लगाते हैं कि सामने दिख रही बिल्डिंग में कम से कम पचास ‘माले’ हैं। हरेक माले में दस-दस ‘खोली’, टू बीएचके, मतलब हरेक में दो-दो टॉयलेट, कुल मिलाकर एक हजार से अधिक टॉयलेट!! वह भी एक बिल्डिंग में। ऐसी कितनी सारी बिल्डिंग्स मुंबई में हैं। हमारी बस्ती में एक लाख से ज्यादा लोग हैं मगर एक भी टॉयलेट नहीं!!! दोनों इस बात पर सयानों की तरह एकदूसरे को देखकर मुस्कुराते हैं और फिर इस विसंगति पर हँसने लगते हैं। बच्चों का बचपन इसतरह की घटनाओं द्वारा लगातार कुचला जा रहा है। वे असमय वयस्क हो रहे हैं। यह त्रासदी इन बच्चों के माध्यम से भलीभाँति व्यक्त हो रही है।

पूरी फिल्म में महसूस होता रहता है कि मनुष्य की प्राथमिक ज़रूरतों में पेट भर अच्छा खाना, साफ पेय जल, रहने के लिए हवादार मकान के साथ-साथ मनुष्य के लिए पेट हल्का करने के अत्यावश्यक कर्म के लिए भी साफसुथरे सुविधाजनक स्थान का होना निहायत ज़रूरी है। जब से खुले में शौच करने के विरुध्द पूरे देश भर में शासकीय अभियान चलाया गया तो इस समस्या की असलियत की पोल खुली। शौचालय के मामले में वर्गों का अंतर और स्पष्ट हो गया। देश का उद्योगपति अपने घर में पचीस लाख की टॉयलेट बनवाता है मगर पिचकू जैसे बहुत बड़ी संख्या में लोग सामान्य सुविधा से भी वंचित हैं। दूसरी ओर बड़े स्कूल के बच्चों का सफाई अभियान के प्रोजेक्ट के तहत सड़क किनारे की झुग्गी-बस्ती के पास आकर सफाई करना, दो वर्गों के बच्चों का एकदूसरे के प्रति नज़रिया वर्ग-विभाजन के स्पष्ट अंतर को रेखांकित करता है। मॉल में विशाल सॅनिटरी शॉप से कार्टन उठाने जाने के बहाने पिचकू और गोपी का एक एकदम नई दुनिया से परिचित होना और टॉयलेट के सपने को एक आकार मिलना, ये सब बातें दो दुनियाओं के गहरे अंतर को उभारती हैं। बाज़ारवाद का प्रभाव किसतरह गरीबों से लेकर अमीरों तक फैला हुआ है, जिससे पूरी जीवनचर्या दो विपरीत छोरों पर सिमटती जा रही है।

इसतरह की फिल्में कुछ अतिरंजित चित्रणों के बावजूद समाज की विसंगतियों पर तीखी टिप्पणी करती हैं और यथार्थ के ऐसे कोनों-कतरों का दर्शन कराती हैं, जिससे अधिकतर पढ़ा-लिखा वर्ग वाकिफ नहीं होता।

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