हागिया सोफ़िया को लेकर पश्चिम देशों का कोई स्पष्ट रूख़ नहीं

एम. के. भद्रकुमार 

यदि आज एक जनमत संग्रह होता है, तो तुर्की के लोग निस्संदेह एर्दोगन के फ़ैसले का समर्थन करेंगे।

जब यूरोपीय संघ (ईयू) के विदेश मंत्रियों ने 13 जुलाई को एक वर्चुअल बैठक की थी, जिसका एजेंडा तुर्की के साथ इस समूह के रिश्ते को लेकर था, तो दरअस्ल यह एक निर्णायक क्षण था, लेकिन इस पर किसी का ध्यान नहीं गया।

मगर, इस बैठक में इस्तांबुल स्थित हागिया सोफ़िया में मुस्लिम धर्मावलंबियों के फिर से प्रवेश को लेकर चर्चा हुई। इस चर्चा को यूरोपीय संघ के विदेश नीति के प्रमुख जोसेप बोरेल ने बाद में कुछ इस तरह अभिव्यक्त किया:

“तुर्की यूरोपीय संघ के लिए एक ऐसा महत्वपूर्ण देश है, जिसके साथ हम अपने रिश्तों को मज़बूत और विकसित होते देखना चाहते हैं। ऐसा यूरोपीय संघ के मूल्यों, सिद्धांतों और हितों के सम्बन्ध में किया जाना चाहिए…सदस्य देशों के बीच एक आम सहमति है कि यूरोपीय संघ के तुर्की के साथ मौजूदा सम्बन्ध तनावपूर्ण चल रहे हैं, ख़ास तौर पर पूर्वी भूमध्यसागर और लीबिया में यूरोपीय संघ के हितों को प्रभावित करने वाले घटनाक्रम इस चिंता के कारण हैं…”

“मंत्रियों ने हागिया सोफ़िया को फिर से मस्जिद में बदले जाने के तुर्की के इस फ़ैसले की भी निंदा की, क्योंकि यह फ़ैसला अनिवार्य रूप से अविश्वास की आग को हवा देगा, धार्मिक समुदायों के बीच नये सिरे से विभाजन को बढ़ावा देगा और बातचीत और सहयोग के प्रयासों को कमज़ोर करेगा। हालांकि इस फ़ैसले पर पुनर्विचार करने और अपने फ़ैसले को वापस लेने के क़दम पर रोक लगाने के लिए तुर्की के अधिकारियों को तत्काल व्यापक समर्थन हासिल है।”

पूर्वी भूमध्यसागरीय क्षेत्र में तेल और गैस की खोज और लीबिया में तुर्की के हस्तक्षेप के चलते “इस समय यूरोपीय संघ के हितों को प्रभावित” होने के कारण यूरोपीय संघ का तुर्की के साथ एक तनावपूर्ण सम्बन्ध है। हालांकि हागिया सोफ़िया एक गौण मुद्दा है। फिर भी, हागिया सोफ़िया पर अपने फ़ैसले को वापस लेने के ख़िलाफ़ तुर्की सरकार को “व्यापक समर्थन” मिला हुआ है।

बहरहाल, सर्वसम्मति यही है कि तुर्की के साथ किसी भी तरह की टकराहट मोल नहीं लिया जाए, बल्कि तनावों को कम करने के लिए “आगे का उपाय ढूंढा जाए” और विशेष रूप से पूर्वी भूमध्यसागर और लीबिया में “यूरोपीय संघ के हितों को प्रभावित करने वाले चिंताजनक घटनाक्रम” पर समझ विकसित करने की कोशिश की जाए।

संक्षेप में कहा जा सकता है कि हागिया सोफ़िया का घटनाक्रम यूरोपीय संघ-तुर्की के बीच की टकराहट का कारण नहीं बनेगा। तुर्की के साथ किसी भी तरह का टकराव जोखिम भरा हो सकता है। इसके अलावा, यूरोपीय संघ के भीतर इसे लेकर अलग-अलग विचार हो सकते हैं। कम से कम कुछ यूरोपीय देशों को तो याद होगा कि यूरोपीय संघ ने उस “मुस्लिम तुर्की” को बाहर रखकर नये-नये वजूद में आये बाल्कन देशों को स्वीकार करते हुए एक ईसाई क्लब की तरह व्यवहार किया था, जो दशकों से उसके दरवाज़े पर दस्तक देता रहा है, जबकि तुर्की के पास लोकतांत्रिक साख की कोई कमी नहीं है और भागीदार बनने के रूप में पेश किये जाने वाले को लेकर उसके पास बहुत कुछ है।

हम इस बात की अनदेखी कर जाते हैं कि हागिया सोफ़िया पर राष्ट्रपति रेसेप एर्दोगन का मुस्लिम प्रार्थनाओं को फिर से शुरू करने, लेकिन ग़ैर-मुस्लिमों को भी इस इमारत में जाने की अनुमति देने का यह फ़ैसला अनिवार्य रूप से एक राजनीतिक फ़ैसला है। उन्होंने दरअस्ल 1934 में अतातुर्क द्वारा लिये गये उस “प्रशासनिक फ़ैसले” को उलट दिया है, जिसे 29 अक्टूबर 1923 को मुस्तफ़ा कमाल ने आधुनिक तुर्की राज्य के पहले राष्ट्रपति के रूप में पदभार ग्रहण करने के एक दशक बाद लिया था।

अतातुर्क ने तब इसके लिए राष्ट्रीय स्तर पर विचार-विमर्श नहीं किया था, जब उन्होंने यह फ़ैसला लिया था कि हागिया सोफ़िया में मुस्लिम प्रार्थनाओं को बंद कर दिया जाना चाहिए। यदि आज एक जनमत संग्रह होता है, तो तुर्की के लोग निस्संदेह एर्दोगन के इस फ़ैसले का समर्थन करेंगे। बेशक, एर्दोगन को ख़ुद ही यह बात पता होना चाहिए कि उन्होंने एक “लोकप्रिय” फ़ैसला लिया है। तुर्की कोई संगठित समाज नहीं है और यहां समान राय रखने वाला वर्ग भी नहीं है, ख़ास तौर पर यहां पश्चिमीवाद की ओर झुकाव रखने वाला वर्ग है,जो यह महसूस करता है कि तुर्की “पश्चिम” की अनदेखी कर रहा है।

हालांकि, यह धर्मनिरपेक्षता और इस्लाम धर्म के बीच का कोई संघर्ष नहीं है। तुर्की की धर्मनिरपेक्ष प्रकृति सदियों पुरानी है, जिसका इतिहास ओटोमन तक जाता है। हालांकि, ओटोमन साम्राज्य इस्लाम और इस्लामी संस्थानों से प्रेरित और संचालित था, लेकिन इसकी कामयाबी के पीछे इसकी उस बेहद व्यावहारिक राजनीतिक संस्कृति को ज़िम्मेदार ठहराया जाता है, जिसके तहत यह अन्य संस्कृतियों से सर्वश्रेष्ठ विचारों को ले रहा था और उन्हें अपना रहा था।

ओटोमन साम्राज्य की आर्थिक ताक़त के पीछे व्यापारियों को इस्तांबुल आने के लिए प्रोत्साहित करते हुए वहां व्यापारियों की संख्या बढ़ाने की नीति थी, जिसके तहत साम्राज्य में मिलाये गये नये-नये क्षेत्रों से भी व्यापारियों को जबरन पुनर्व्यवस्थित किया जाता था। ओटोमन ने ख़ास तौर पर यूरोप के उन यहूदी व्यापारियों को प्रोत्साहित किया, जो रूढ़िवादी ईसाई शासकों के अधीन उत्पीड़न का शिकार होकर इस्तांबुल पलायन कर गये और यहां आकर अपने कारोबार को स्थापित किया।

ये ग़ैर-मुस्लिम समुदाय मिल्लत प्रणाली के तहत संगठित थे। इस व्यवस्था के तहत अल्पसंख्यक धार्मिक / जातीय / भौगोलिक समुदायों को तुर्क प्रशासन के समग्र आधिपत्य के तहत अपने ख़ुद के मामलों को विनियमित करने के लिए सीमित मात्रा में अधिकार हासिल थे। दिलचस्प बात है कि पहला रूढ़िवादी ईसाई मिल्लत 1454 में सुल्तान मेहमत द्वितीय द्वारा कॉन्स्टेंटिनोपल पर कब्ज़ा करने के एक साल के भीतर स्थापित किया गया था। इसने उस बुज़ुर्ग के नेतृत्व में एक एकल समुदाय वाले रूढ़िवादी ईसाइयों को यहां बसाया था, जिनके पास सुल्तान द्वारा दिये गये काफी अधिकार थे।

अर्मेनियाई ईसाई, यहूदी और अन्य मिल्लत भी समय-समय पर आते रहे। कुछ मिल्लतों ने राज्य को कर का भुगतान किया, जबकि ज़्यादतर को करों से छूट दी गयी थी, क्योंकि उन्हें राज्य की सेवा के लिए अहम समझा जाता था। हालांकि मेहमत प्रथम ने कई चर्चों को मस्जिदों में बदल दिया था, लेकिन उसने ख़ुद ईसाई धर्म को मानने वालों का दमन कभी नहीं किया था।

उनके हिसाब से ईसाई वहां की आबादी का सबसे बड़ा समूह था और इस नाते संघर्ष की तुलना में उनके लिए सह-अस्तित्व शायद कहीं ज़्यादा फ़ायदेमंद था; और, दूसरी बात कि चर्च की संस्थाओं को मेहमत के नियम को लागू करने के लिए एक मंच मुहैया कराया गया। कुल मिलाकर, ओटोमन इस इस्लामिक नियम से प्रभावित थे कि मुसलमानों को हर एक धर्म के प्रति सम्मान का भाव रखना चाहिए।

सुल्तान ने अपने धार्मिक नेताओं के ज़रिये ग़ैर-मुस्लिम समुदायों (मिल्लतों) पर नियंत्रण रखा। और इन समुदायों को शहरों के अपने अलग क्षेत्र दिये गये थे, जहां वे रहते थे और पूजा करते थे। उन्हें अपनी आस्था और विश्वास के मुताबिक़ जीवन जीने की बहुत ज़्यादा स्वतंत्रता थी, और इसलिए वे अपने मुस्लिम अधिपतियों के ज़बरदस्त समर्थक थे।

इतिहास को संक्षेप में दुहराना ज़रूरी होता है, वास्तव में हागिया सोफ़ीया को लेकर एर्दोगन का फ़ैसला तुर्की राष्ट्रवाद का उत्सव है। एक तरफ़ यह यूरोप के साथ तुर्की के गहन मोहभंग की अभिव्यक्ति है, जबकि दूसरी ओर, जैसा कि सत्तारूढ़ अभिजात वर्ग के क़रीबी एक प्रमुख तुर्की स्तंभकार, यूसुफ़ कापलान ने इस सप्ताह लिखा था कि “यह तुर्की की पुनर्वापसी है, इसकी पहचान, इतिहास और आत्मा, इसकी मानसिक मुक्ति को फिर से पाने जैसा है… हागिया सोफ़िया मस्जिद का फिर से खोला जाना वह चिंगारी है, जो उस महान सफ़र को रफ़्तार देगा, जिसके लिए हमारा आह्वान किया गया है कि हम पश्चिम द्वारा बुने गये उस चक्र से बाहर आ सकें, जिसमें नये युग के निर्माण के लिए हमने ख़ुद ही प्रवेश किया था…

“हागिया सोफ़िया ग़ैर-मुसलमानों की धार्मिक स्वतंत्रता और मुसलमानों की सत्ता के तहत अपने ख़ुद की आस्था के आसपास अपने जीवन का निर्माण करने की गारंटी की एक बहुत ही शक्तिशाली अभिव्यक्ति है… हागिया सोफ़िया का धार्मिक रूपांतरण हम पर एक महान दायित्व वाला बोझ डाल देता है।”

कापलान के आख़िरी वाक्य में व्यापक मार्मिकता है। उनके मुताबिक़ हागिया सोफ़िया का एक थर्रा देने वाला इतिहास है, लेकिन यह इतिहास ओटोमन सुल्तानों के हाथों नहीं बना है

चौथे धर्मयुद्ध के सूरमाओं ने 1204 में कांस्टेंटिनोपल को आग के हवाले कर दिया था, और वे लूट, हवस और ख़ून बहाने जैसे शैतानी गतिविधियों को अंजाम देते रहे थे। कैथोलिक विजेताओं ने अनुष्ठानों और यूनानी आस्था वाले चर्चों का अपमान किया और उन्होंने हागिया सोफ़िया तक को नहीं छोड़ा। धर्मयोद्धाओं ने बीजान्टिन साम्राज्य को तहस-नहस करके एक मलबे में बदल दिया और कॉन्स्टेंटिनोपल जिस ऐश्वर्य और वैभव के लिए जाना जाता था,वह सब तबाह हो गया, इसके कारोबार की अनदेखी हुई,लिहाजा सब बर्बाद और तहस-नहस हो गया।

विजयी धर्मयोद्धाओं ने कांस्टेंटिनोपल को तीन-तीन बार भीषण आग के हवाले किया,इससे कांस्टेंटिनोपल का एक बड़े हिस्सा राख के सुनसान मलबे और काले खंडहर में तब्दील हो गया था। इस पृष्ठभूमि के साथ एक महान संकट में फ़ंसे इस साम्राज्य में तुर्की अमीर अब सुल्तानों की तुलना में मजबूत  होता गया, इन अमीरों ने यूनानियों को समुद्री क्षेत्रों में वापस जुटाना शुरू कर दिया।

यह नयी शक्ति तेज़ी के साथ अपने क़दम आगे बढ़ा रही थी, और एशिया माइनर जल्द ही हमेशा के लिए यूनानियों के हाथों में चला गया। लेकिन, तुर्क एशिया तक ही सीमित नहीं रहे। उन्होंने बोस्फ़ोरस और डार्डानेल्स की संकरे सीमाओं को पार कर लिया, और जल्द ही कॉन्स्टेंटिनोपल की शाही सरकार की निर्भरता तुर्की के भाड़े के सैनिकों पर ख़ास तौर हो गयी। तुर्कों ने आख़िरकार कॉन्स्टेंटिनोपल को अपने साम्राज्य की राजधानी बन लिया।

आज उस  मामले को लेकर ईसाई यूरोप या पोप किस मुंह से तुर्की को कुछ कह पायेंगे ? इस मामले पर अटलांटिक के उस पार से राष्ट्रपति ट्रम्प ने एक भी शब्द नहीं कहा है। इस मामले को पूर्वी ईसाई धर्म के दो ध्रुवों-ग्रीस और रूस पर छोड़ दिया गया है, ये दोनों अपनी प्रतिद्वंद्विता को अलग रखते हुए रूढ़िवादी धर्मावलम्बियों की आत्मा के लिए तुर्की की लानत-मलानत करते हुए इतिहास में दर्ज हो रहे हैं।

सौज- न्यूजक्लिक-अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को आप नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं

https://www.newsclick.in/West-Has-No-Standing-Hagia-Sophia

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