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हे विदूषक तुम मेरे प्रियः प्रभाकर चौबे 11 वीं कड़ी – गंदगी भगाने विदूषक का सुझाव

सुप्रसिद्ध साहित्यकार,प्रतिष्ठित व्यंग्यकार व संपादक रहे श्री प्रभाकर चौबे लगभग 6 दशकों तक अपनी लेखनी से लोकशिक्षण का कार्य करते रहे । उनके व्यंग्य लेखन का ,उनके व्यंग्य उपन्यास, उपन्यास, कविताओं एवं ससामयिक विषयों पर लिखे गए लेखों के संकलन बहुत कम ही प्रकाशित हो पाए । हमारी कोशिश जारी है कि हम उनके समग्र लेखन को प्रकाशित कर सकें । हम पाठकों के लिए उनके व्यंग्य उपन्यास‘हे विदूषक तुम मेरे प्रिय’को धारावाहिक के रूप में प्रकाशित कर रहे हैं । विदित हो कि इस व्यंग्य उपन्यास का नाट्य रूपांतरभिलाई के वरिष्ठ रंगकर्मी मणिमय मुखर्जी ने किया है । इसका ‘भिलाई इप्टा’द्वारा काफी मंचन किया गया है ।आज प्रस्तुत है

11 वीं कड़ी – गंदगी भगाने विदूषक का सुझाव

दराबर के उच्च पदाधिकारियों की सभा में महाराज ने कहा_दीवानजी, राज्य की सफाई व्यवस्था पर आज चर्चा होगी। राज्य के स्वास्थ्य-अध्यक्ष कहाँ हैं।

दीवान ने कहा_महाराज, स्वास्थ्य अध्यक्ष राज्य की सफाई व्यवस्था का जायजा लेने राज्य के दौरे पर हैं।

महाराज ने कहा_स्वास्थ्य अध्यक्ष को आज की सभा का कार्य विवरण पता था। वे जानते थे कि आज राज्य की सफाई व्यवस्था पर गहन विचार मंथन होना है। फिर भी वे दौरे पर चले गए।

मंत्री ने कहा_महाराज, स्वास्थ्य अध्यक्ष ने राज्य में सफाई व्यवस्था का गहन अनुसंधान कराया है और पूरी जानकारी एक लाख पृष्ठ की इस पंजी में पंजीबध्द है।

महाराज ने कहा_एक लाख पृष्ठों में राज्य की सफाई व्यवस्था का विवरण है।

मंत्री ने कहा_हाँ महाराज। स्वास्थ्य अध्यक्ष ने खूब परिश्रम किया है।

महाराज ने कहा_उनका परिश्रम अपनी जगह, लेकिन इन एक लाख पृष्ठों के वाचन में हमें कितना परिश्रम करना होगा। इसे समझने में हमारे दीमाग में कितना जोर लगेगा।

मंत्री ने कहा_महाराज, एक दिन में कितने पृष्ठ पत्रढ लेंगे आप।

महाराज ने कहा_मंत्रीजी, और भी तो काम हैं कि बस राज्य की गंदगी ही दिन भर पत्रढते रहें।

मंत्री ने कहा_हाँ महाराज, और भी काम हैं। दरबार लगाना, फिर नृत्य-गान, हंसी-ठठ्ठा, फिर शिकार पर जाना आदि

महाराज ने कहा_तो आप ही बताइए कि एक लाख पृष्ठ पत्रढने में कितने दिन लगाएं।

मंत्री ने कहा_महाराज, यह खजांची से पूछें। वे हिसाब लगाकर बता देंगे।

खजांची ने कहा_महाराज, दरबार की बैठक रोज तीन घंटे चलती है। सफाई व्यवस्था के अध्ययन के लिए बैठक का समय चार घंटे कर दिया जाए। इस तरह रोज चार घंटे में चालीस पृष्ठ पत्रढे जा सकते हैं।

दीवान ने कहा_बस, चार घंटे में चालीस पृष्ठ।

खजांची ने कहा_समझकर पत्रढना होगा, यूं सरसरी नजर से देखा नहीं जा सकता। आखिर राज्य की सफाई व्यवस्था का प्रश्न है।

महाराज ने कहा_ठीक है, रोज चालीस पृष्ठ पत्रढे जाएंगे तो यह बताइए कि एक लाख पृष्ठ पत्रढने में कितने दिन लगेंगे।

खजांची ने कहा_एक दिन में चालीस पृष्ठ तो एक लाख पृष्ठ दो हजार पांच सौ दिन में। और तीस दिन का एक महीना और बारह महीने का एक साल। महाराज आपको एक लाख पृष्ठ पत्रढने में सात साल दो माह लगेंगे।

महाराज ने कहा_केवल विवरण पत्रढने में सात साल दो माह लग जाएंगे। तो सफाई व्यवस्था सुधारने की योजना बनाने में कितने साल लगेंगे।

खजांची ने कहा_दोगुना समय लगेगा। लेकिन पक्का हिसाब करने के बाद ही ठीक अवधि बताई जा सकती है, महाराज।

महाराज ने कहा_इतने वर्षों में तो युवराज गद्दी सम्भाल लेंगे। हम क्या करें इस सफाई व्यवस्था के लिए।

मंत्री ने कहा_हाँ महाराज, कुछ सोचा जाए।

महाराज ने कहा_विदूषक जी, आप ही कुछ उपाय बताएं। राज्य में गंदगी है। सफाई कैसे को जाए। गंदगी दूर कैसे करें।

विदूषक ने कहा_महाराज, आप चिंता छोत्रडें। स्वास्थ्य अध्यक्ष की यह रिपोर्ट मैंने पत्रढ ली है। और राज्य की सफाई व्यवस्था दुरुस्त करने का उपाय भी सोच लिया है। कुछ धन की व्यवस्था करनी होगी। खजांची जी से कहैं कि वे सफाई व्यवस्था के लिए राजकोष से धन उपलब्ध कराते रहें।

महाराज ने कहा_सफाई व्यवस्था के लिए धन की कमी नहीं होने दी जाएगी। आप बेखटके अपनी योजना प्रस्तुत करें।

विदूषक ने कहा_महाराज, सबसे पहले मूल प्रश्न यह है कि राज्य में गंदगी है और दुर्गंध है।

दीवान ने कहा_हाँ।

विदूषक ने कहा_गंदगी क्यों है। क्योंकि सफाई नहीं होती। और सफाई व्यवस्था में लाखों मुद्राएँ चाहिए।

खजांची ने कहा_हाँ।

विदूषक ने कहा_तो मूल प्रश्न यह है कि राजकोष से व्यय कम से कम हो और गंदगी मिटे। दुर्गंध दूर हो और सुगंध फैले।

मंत्री ने कहा_हाँ, ऐसा ही चाहिए।

विदूषक ने कहा_महाराज, मूल प्रश्न यह है कि राज्य में सुगंध फैले।

महाराज ने कहा_हाँ, सुगंध फैले। अभी जिधर से निकलो उधर दुर्गंध।

विदूषक ने कहा_महाराज, अगर गंदगी रहे और सुगंध फैले तो।

मंत्री ने कहा_ऐसा कैसे हो सकता है।

महाराज ने टोका_मंत्रीजी, आप बीच में न टोंकें। विदूषक जी कुछ उपाय सुझा रहे हैं। हम विदूषक की राय से ही राजकाज चला रहे हैं।

मंत्री ने कहा_क्षमा महाराज।

महाराज ने कहा_विदूषक जी, आप आगे बताइए। विदूषक ने कहा_मेरा सुझाव है कि पूरे राज्य में रोज सुबह-शाम इत्र का छित्रडकाव हो।

महाराज ने कहा_एकदम अभिनव सुझाव, इत्र का छित्रडकाव।

विदूषक ने कहा_अब मशक में इत्र भर कर सेवक सत्रडकों पर इत्र का छित्रडकाव करेंगे। गंदे जल की निकासी करने वाली नालियों में इत्र डाला जाए। नुक्कत्रडों में कचरे के ऊपर इत्र उत्रडेला जाए। राज्य की नदियों, सरोवरों, तालाबों में इत्र डाला डाए।

महाराज ने कहा_बहुत बत्रिढया। इसे कहते हैं, सुझाव। आखिर विदूषक ने ही गंदगी व दुर्गंध भगाने का सुझाव दिया।

विदूषक ने कहा_सब आपकी कृपा है महाराज।

महाराज ने कहा_लेकिन विदूषक जी, इतना इत्र आएगा कहाँ से?

विदूषक ने कहा_महाराज, अपने राज्य से बहुत दूर एक राज्य है ईरान, वहाँ से मँगा लेंगे। और महाराज सात समुद्र पार एक जगह है पेरिस, वहाँ का इत्र बहुत सुगंधी होता है, वहाँ से मँगाएंगे।

महाराज ने कहा_आपको कैसे पता कि पेरिस का इत्र बहुत सुगंधी होता है।

विदूषक ने कहा_महाराज में वहाँ कवि सम्मेलन में हर वर्ष बुलाया जाता हूँ। कवि सम्मेलन के आयोजक मुद्राओं के साथ इत्र भी भेंट में देते हैं।

महाराज ने कहा_आप कवि सम्मेलन में सात समुद्र पार परदेश जाते हैं।

विदूषक ने कहा_हाँ महाराज, वहाँ अपने कुछ लोग हैं, वे यहाँ के हर राज्य के विदूषकों को कवि सम्मेलन में बुलाते हैं। उन्हें विदूषकों की कविताएँ पसंद आती हैं।

महाराज ने कहा_वाह! विदूषक जी, हमारे राज्य का नाम रौशन कर रहे हैं।

विदूषक ने कहा_महाराज, यह भी सुझाव है कि पेरिस के इत्र से ही आप, महारानी, राजकुंवर तथा सारे दरबारी रोज स्नान करें। कपत्रडे भी पेरिस के इत्र से धुलें। फिर देखिए सारा राज्य, पूरा दरबार सुगंध से भर जाएगा। गंदगी दूर होगी। दुर्गंध भाग जाएगी।

महाराज ने कहा_वंडरफुल आइडिया, वेरीगुड।

मंत्री ने कहा_महाराज, आप अंग्रेजी में बोले।

विदूषक ने कहा_अब अंग्रेजी ही बोलेंगे। अंग्रेजी न बोलेंगे तो राज नहीं कर सकेंगे। जो अंग्रेजी बोलेगा, वही राज करेगा, यह ज्ञान आयोग की खोज है।

महाराज ने कहा_आपको बधाई। आभार। धन्यवाद। खजांची जी पेरिस, ईरान और अन्य राज्यों से जहाज भर-भर कर इत्र मँगाने मुद्रा की व्यवस्था करें। राज्य के स्वास्थ्य अध्यक्ष को विदूषकजी के सुझाव से अवगत करा दें और हमारा आदेश सुना दें। राज्य में सफाई व्यवस्था को लेकर अब हमारी चिंता मिटी। हर दरबार में विदूषक हों तो ऐसे सुंदर सुझाव आते रहें।

अगले अंक में जारी

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