गाँधी: विद्रोह की आध्यात्मिकता- नन्दकिशोर आचार्य

      मेरा जीवन ही मेरा सन्देश है – महात्मा गाँधी के इस प्रसिध्द कथन का वास्तविक तात्पर्य क्या है? क्या इस का आशय उनकी निजी जीवन शैली से है अर्थात् अपरिग्रह प्रेरित न्यूनतम आवश्यकताओं पर आधारित सादा जीवन-शैली से अथवा इस कथन को उनके सार्वजनिक जीवन के सन्दर्भ में व्याख्यायित किया जाना चाहिए। महात्मा गांधी अपनी आत्मकथा को ‘सत्य के साथ मेरे प्रयोग’ कहते हैं। क्या सत्य को वैयक्तिक और सार्वजनिक खाँचों में बाँट कर, समझ कर अनुभव किया जा सकता है?

      लेकिन जब गाँधीजी सत्य और ईश्वर को एक मानते हैं, तो क्या सत्य के साथ प्रयोग को ईश्वर के साथ प्रयोग माना जा सकता है? क्या ईश्वर प्रयोग की वस्तु हो सकती है? इसे समझने के लिए हमें गाँधीजी की ईश्वर संबंधी अवधारणा को समझना होगा? यह सभी जानते हैं कि शुरू में वह ‘ईश्वर सत्य है’ कहते थे, जिसे बाद में थोड़ा बदल कर उन्होंने ‘सत्य ईश्वर है’ कहना शुरू कर दिया। इन कथनों में प्रथम को कुछ लोग ईश्वर को व्यक्ति रूप मानने के अर्थ में ले  सकते हैं और दूसरे कथन को निर्वैयक्तिक सत्य को ईश्वर मानने के अर्थ में । लेकिन, तब हमें महात्मा गाँधी की सत्य की अवधारणा पर भी विचार करना होगा और देखना होगा कि सत्य और ईश्वर ये दोनों अवधारणाएँ किस तरह गांधी चिन्तन में एकमेक हो जाती हैं।

      पी.जी. मैथ्यू को लिखे एक पत्र में गाँधी जी सत्य को पारिभाषित करते हुए लिखते हैं: सत्य अर्थात सत्, जिसका अर्थ है ‘है’ ‘- इसलिए सत् में सत्य निहित है।’ तात्पर्य यह कि अस्तित्व मात्र सत्य है, इसलिए वही ईश्वर है। अस्तित्व मात्र को सत्य मानने के कारण वहीं गाँधीजी के लिए ईश्वर भी है। वह कहते हैं। ”मुझे एक क्षीण अनुभूति होती है कि जहाँ मेरे चारों और मौजूद सभी चीजें निरन्तर परिवर्तनशील हैं, निरन्तर नाशवान हैं, वहाँ इन सारे परिवर्तनों के पीछे एक जीवन्त शक्ति है, जो परिवर्तनरहित है, जो सबको धारण करती है, सब की सृष्टि करती है, संहार करती है और पुन: सृजन करती है। सभी को अनुप्राणित करने वाली यह शक्ति अथवा आत्मा ही ईश्वर है”। दूसरे शब्दों में, गांधीजी के लिए ईश्वर का अर्थ अस्तित्व का नियम है क्योंकि जो कुछ परिवतर्नशीलता अस्तित्व में दिखायी देती है, उसकी पृष्ठभूमि में वह नियम सक्रिय  है, जो अपरिवर्तनशील है और अस्तित्व को धारण किये है। हमारी परम्परा में भी तो ‘धारयतीति धर्म:’ कहा गया है। अपनी बात को और स्पष्ट करते हुए महात्मा गाँधी अन्यत्र कहते हैं: ”मैं ईश्वर को व्यक्ति नहीं मानता … ईश्वर का नियम और ईश्वर, दो पृथक पदार्थ या तथ्य नहीं हैं, जैसे लौकिक राजा और उसके नियम पृथक होते हैं। ईश्वर तो प्रत्यय है, स्वयं नियम है, इसलिए ईश्वर द्वारा नियम तोड़े जाने की कल्पना असम्भव है।” तात्पर्य यह कि जब नियम ही ईश्वर है, तो उसे तोड़ा जाना स्वयं उसके लिए भी सम्भव नहीं है। यदि मनुष्य इस नियम को तोड़ता है, तो वह सत्य से दूर चला जाता है, या वह ईश्वर से दूर चला जाता है। कहना न होगा कि वर्तमान समाज में जो भी समस्याएं और परेशानियाँ दिखायी दे रही हैं – चाहे वे सामाजिक – राजनीतिक तनावों से सम्बन्धित हों या आर्थिक शोषक अथवा प्रकृति के विनाश और पारिस्थितिकीय असन्तुलन आदि से – वे सभी अस्तित्व के नियम के उल्लंघन के ही परिणाम हैं।

      तो क्या पारिस्थितिकी के नियम ही अस्तित्व के नियम नहीं हैं? क्या उन्हें ही सत्य स्थानीय अर्थात् ईश्वर स्थानीय नहीं मानना चाहिए? गाँधी जी तो कम-से-कम यही मानते दिखायी देते हैं। इसलिए उनकी आर्थिकी-सामाजिकी आदि को भी इसी सन्दर्भ में समझे जाने की जरूरत है। लेकिन पारिस्थितिकी क्योंकि सम्पूर्ण अस्तित्व और जीवन को एक ‘अखंड’ मानती है, जो पारस्पारिक अन्तर्ग्रंथन पर आधारित है, इसलिए यह समझना भी ज् ारूरी होगा कि सम्पूर्ण अस्तित्व और जीवन के एकत्व का यह नियम अर्थात् पारिस्थितिकी में सक्रिय सत्य मानवीय जीवन में कैसे प्रतिपादित होता है और जिसके टूट जाने पर मानव जीवन विविध आयामों में विनाशोन्मुख हो जाता है। दूसरे शब्दों में कहें तो यह देखना होगा कि अस्तित्व का नियम अथवा ईश्वर मानव जीवन के व्यवहर में बन्ध रूप ग्रहण करता है।

      गाँधी जी के अनुसार अस्तित्व का नियम अथवा सत्य अथवा ईश्वर मानव-जीवन में अहिंसा के रूप में प्रतिफलित होता है। मार्क्सवादी दर्शन में जैसे प्रकृति की द्वन्द्वात्मकता का नियम मानव जीवन में वर्ग-संघर्ष की द्वन्द्वात्मकता में आत्म व्यक्त होता है, वैसे ही गाँधी चिन्तन में जीवन के एकत्व का नियम प्रेम अथवा अहिंसा के नियम से प्रेरित व्यवहार के रूप में प्रतिफलित होता है। एम.एन. राय जैसे विचारक इसे ‘सहकार’ की संज्ञा देते हैं। गाँधी जी लिखते हैं: ”जब आप सत्य को ईश्वर रूप में पाना चाहते हैं तो एकमात्र अनिवार्य साधन प्रेम अर्थात् अहिंसा है और क्योंकि मैं मानता हूँ कि साधन और साध्य पर्यायवाची है, मुझे यह कहने में कोई हिचक नहीं कि ईश्वर प्रेम है।” अपनी धारणा को स्पष्ट करते हुए वह अन्यत्र कहते हैं : ”सत्य की सार्वभौम और सर्वव्यापी भावना के प्रत्यक्ष दर्शन वही कर सकता है जो दुर्लभ प्राणी से भी उतना ही प्रेम कर सके जितना कि वह स्वयं को करता है। और जो ऐसा करने का आकांक्षी हो, वह जीवन के किसी क्षेत्र से अपने को असम्पृक्त नहीं रख सकता। यही कारण है कि सत्य के प्रति मेरे अनुराग ने मुझे राजनीति के क्षेत्र में ला खड़ा किया है, और मैं बिना हिचक किन्तु विनम्रता पूर्वक कह सकता हूँ कि जो यह कहते हैं कि धर्म का राजनीति से कोई लेना देना नहीं है,  वे यह नहीं जानते कि धर्म क्या है।”

      लेकिन, सवाल यह उठता  है कि सब को प्रेम करने का अर्थ क्या है, यदि वह कष्ट में पड़े प्राणियों के कल्याण के लिए सक्रिय नहीं होता? ंगालिब कहते हैं: ”रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं कायल, जो आंख से ही न टपका तो फिर लहू क्या है।” महात्मा गांधी के लिए भी प्रेम कोई दैहिक या निष्क्रिय भावना नहीं है। यदि वह अस्तित्वगत के ऐक्य का नियम है तो उसे सदैव सक्रिय रहना होगा। इसीलिए महात्मा गांधी बुराई के विरुध्द संघर्ष को प्रेम का अर्थात् सत्य और ईश्वर का ही रूप मानते प्रतीत होते हैं: ”मैं यह भी जानता हूँ कि यदि मैं बुराई से न लड़ूँ और इस संघर्ष में प्राणों की बाजी न लगा दूं तो मैं कभी ईश्वर को नहीं जान पाऊँगा। मेरे साधारण और सीमित अनुभव ने मेरे इस विश्वास को और भी दृढ़ कर दिया है।” एक और स्थल पर वह कहते हैं: ”मेरे लिए ईश्वर सत्य और प्रेम है, ईश्वर नैतिकता है, ईश्वर निर्भयता है, ईश्वर जीवन और आलोक का  स्रोत है…ईश्वर अन्तरात्मा है।” इन सब लक्षणों को मिला कर पढ़ें तो स्पष्ट हो जाता है कि ईश्वर वह नैतिक आचरण है, जो सत्य और प्रेम पर आधारित संघर्ष से बुराई को चुनौती देता है।

      क्या यह ईश्वर और धार्मिक आचरण की पारम्परिक अवधारणाओं को पूरी तरह रूपान्तरित कर देना नहीं है? गाँधीजी ईश्वर को मानवता से अलग करके नहीं देख पाते, इसलिए मानव सेवा को ही ईश्वर सेवा समझते हैं। सामान्यत: यही माना गया है कि आध्यात्मिक में नैतिक समाहित है, लेकिन गाँधीजी इस से उलट इस बात भी जोर देते हैं कि ”मेरे लिए नैतिक में आध्यात्मिक समाविष्ट है…सुधारक के रूप में, मैंने हर चीज को नैतिक दृष्टि से देखा है। चाहे मैं किसी राजनीतिक समस्या से जूझ रहा हूँ अथवा सामाजिक या आर्थिक समस्या से, उसका नैतिक पक्ष सदैव प्रबल हो कर सामने आ जाता है और मेरे सम्पूर्ण दृष्टिकोण पर छा जाता है।” स्पष्ट है कि महात्मा गाँधी ईश्वर की  रूढ़  अवधारणा से असहमत होते हुए उसे एक भिन्न रूप और आयाम दे देते हैं। बुराई या अन्याय से संघर्ष उनके लिए एक आध्यात्मिक अनुभूति हो जाता है। वह कहते भी हैं: ”ईश्वर को प्राप्त करने का एक ही उपाय है कि उसे उसकी सृष्टि में देखा जाए और उसके साथ एकाकार हुआ जाए ।” एक और स्थल पर वह कहते हैं – ”मैं ईश्वर को मानवता की सेवा के जरिए पाने का प्रयास कर रहा हूँ, क्योंकि मैं जानता हूँ कि ईश्वर न स्वर्ग में है, न पाताल में बल्कि हम सब में है।” इसीलिए महात्मा गांधी की आध्यात्मिकता किसी भी प्रकार की धार्मिक कही जाने वाली औपचारिक प्रक्रियाओं या तान्त्रिक साधनाओं तथा रूढ़िबध्द अवधारणाओं से मुक्त होकर, इसी समाज की दैनन्दिन गतिविधियों और मनुष्य मात्र के कष्टों, वेदनाओं के समाधान तथा अन्याय के विरुध्द न्यायपूर्ण संघर्ष के माध्यम से जीवन के उत्कर्ष के प्रयासों में प्रतिफलित होती है। उनका प्रसिध्द कथन है: ”यदि  मैं अपने को यह विश्वास दिला पाता  कि ईश्वर हिमालय की गुफा में मिलेगा तो मैं तत्काल वहाँ के लिए प्रस्थान कर देता । लेकिन, मैं जानता हूँ कि मैं उसे मानवता से पृथक नहीं पा सकता” और भी, ”मैं यह नहीं मानता कि आध्यात्मिक नियम के प्रवर्तन का अपना कोई विशिष्ट इलाका है। इसके विपरीत वह जीवन के दैनन्दिन क्रियाकलाप के मध्यम से ही स्वयं को अभिव्यक्त करता है। इस प्रकार, वह आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक सभी क्षेत्रों को प्रभावित करता है।”

      उपर्युक्त कथनों से यह स्पष्ट हो जाता है कि महात्मा गाँधी के लिए बुराई से संघर्ष की व्याप्ति केवल वैयक्तिक जीवन तक सीमित नहीं है बल्कि सार्वजनिक जीवन का हर रूप और आयाम उसकी परिधि में आ जाता है। महात्मा गांधी के लिए क्योंकि प्रत्येक बुराई किसी न किसी प्रकार की हिंसा है, इसलिए कह सकते हैं कि वह हिंसा के सभी रूपों के विरूध्द संघर्ष को आध्यात्मिक साधना का ही रूप मानते हैं। आध्यात्मिकता के आग्रह के कारण सामान्यत: गाँधीजी के विद्रोही चरित्र की अनदेखी हो जाती है या कभी उसे केवल स्वतन्त्रता के  लिए राजनितिक संघर्ष तक ही सीमित कर देखा जाता है। कभी-कभी आश्चर्य होता है कि कबीर को, उनकी आध्यामिकता के बावजूद उन्हें क्रांतिकारी या विद्रोही मानने वाले विद्वान, महात्मा गाँधी की कबीर के समकक्ष बल्कि शायद अधिक व्यापक आध्यात्मिकता के क्रांन्तिकारी चरित्र को क्यों नहीं समझ पाते? महात्मा गांधी तो भारत की आजादी के लिए अपने संघर्ष को भी अपनी आध्यात्मिक साधना का ही रूप मानते हैं। क्योंकि विदेशी शासन एक बुराई है, अन्याय है, हिंसा है और वह इस हिंसा से पीड़ित भारत की जनता को उससे मुक्त करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, वह मानते हैं कि भारत की मुक्ति और उनकी निजी मुक्ति सहोदर हैं। वह कहते हैं: ”जब मैं कहता हूँ कि मैं अपनी मुक्ति को सर्वाधिक, यहाँ तक कि भारत की मुक्ति से भी अधिक महत्व देता हूँ, तो इसका आशय यह नहीं है कि मेरी निजी मुक्ति के लिए भारत की राजनीतिक अथवा किसी अन्य प्रकार की मुक्ति की बलि देनी होगी। इनका अनिवार्य आशय यही होता है कि दोनों सहगामी हैं।”

      यदि आध्यात्मिकता या सत्य की साधना में हिंसा के विरुध्द संघर्ष एक अनिवार्यता है, जो महात्मा गाँधी के लिए तो है ही, तो हिंसा के विविध रूपों पर भी थोड़ा विचार कर लेना आवश्यक है। जोहन गाल्तुंग हिंसा को पारिभाषित करते हुए बताते हैं :”मानवीय आत्मसिद्धि  में कोई भी निवारणीय अवरोध हिंसा है।” स्पष्ट है कि गाँधी चिन्तन में ऐसे किसी भी अवरोध को मिटाने का प्रयास तक आध्यात्मिक प्रयास है। मानवीय आत्मसिद्धि को भी केवल मानव केन्द्रित मानना भूल होगी क्योंकि गाल्तुंग मानवीय आवश्यकताओं की अपनी सूची में भौतिक और भावात्मक आवश्यकताओं का उल्लेख करते हुए प्रकृति से सहज मिलन और  सहभागिता को भी आत्मसिध्दि के लिए जरूरी मानते हैं। भाव हिंसा को जैन दर्शन द्रव्य हिंसा से बड़ा पाप मानता है और यदि भाव हिंसक है तो आत्मसिध्दि कैसे सम्भव हो सकती है?

      यदि हम हिंसा के विविध रूपों पर विचार करें तो देख सकते हैं कि वह प्रत्यक्ष भी होती है और परोक्ष  भी। प्रत्यक्ष हिंसा किसी कर्ता द्वारा अन्य पर आघात है। लेकिन समाज में हिंसा के कई परोक्ष रूप भी होते हैं, जो कई बार प्रत्यक्ष हिंसा से भी भयंकर हो सकते हैं। गाल्तुंग इन्हें संरचनागत और सांस्कृतिक हिंसा कहते और स्पष्ट करते हैं कि हमारी सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक संरचनाओं के हिंसक रूपों की पृष्ठभूमि में सांस्कृतिक हिंसा में हमारे विश्वास सक्रिय रहते हैं, जो केवल संरचनागत हिंसा को ही नहीं, कई बार प्रत्यक्ष हिंसा को वैध ठहराने के लिए इस्तेमाल किये जाते हैं। यह उल्लेखनीय है कि गाल्तुंग के विश्लेषण से बहुत पहले, महात्मा गांधी न केवल हिंसा के इन संरचनागत रूपों को पहचान पाते हैं बल्कि उन सबकी पृष्ठभूमि में सक्रिय हमारी विश्वास प्रणाली और सांस्कृतिक हिंसा को भी चुनौती देते हैं।

      ‘ईश्वर सत्य है’ के  बजाय ‘सत्य ईश्वर है’ का आग्रह प्रकारान्तर से ईश्वर की जगह सत्य को प्रतिस्थापित करना, तथा सत्य की अनुभूति किसी उपासना पध्दति के बजाय बुराई या हिंसा से संघर्ष में सम्भव मानना, ईश्वर और आध्यात्मिकता की रूढ़ अवधारणाओं तथा उसकी उपलब्धि के धर्मशास्त्रीय अनुष्ठानों के  प्रति एक प्रकार का विद्रोह ही है, जो हमारे तत्सम्बन्धी विश्वास समूह और प्रणालियों को चुनौती देता है । यही चुनौती तो अपने तरीके से कबीर जैसे सन्त भी देते हैं और इसीलिए ऐसे सन्त विद्रोही  कहे जाते हैं। अवतार का  सिध्दान्त हिन्दू धर्म के सभी सम्प्रदायों में बध्दमूल है, लेकिन, महात्मा गाँधी इसकी एक बिल्कुल भिन्न और मानव केन्द्रित व्याख्या करते हैं। वह उसे प्रत्येक मनुष्य की पूर्णता के लिए आकांक्षा की अभिव्यक्ति बताते हुए  लिखते हैं: ”ईश्वर अवतार में विश्वास मनुष्य की उच्च आध्यात्मिक आकांक्षा का प्रमाण है। मनुष्य जब तक ईश्वर की बराबरी पर नहीं पहुँच पाता, उसे शान्ति नहीं मिलती । इस अवस्था को प्राप्त करने का प्रयास ही एकमात्र सार्थक, स्वैच्छिक आकांक्षा है और यही आत्म-साक्षात्कार है।”

      ज् ााहिर है इस उच्चतम आकांक्षा की सिध्दि, महात्मा गाँधी के अनुसार, हिंसा के सभी रूपों के प्रति विद्रोह से ही हो सकती है। यही कारण है कि महात्मा गाँधी न केवल हमारी रूढ़िबध्द धारणाओं और विश्वासों को चुनौती देते बल्कि उनसे प्रेरित संरचनागत और प्रत्यक्ष हिंसा के सभी रूपों के खिलाफ संघर्षरत होते हुए, उन्हें अहिंसक रूपों से प्रतिस्थापित करने का प्रस्ताव व प्रयास करते हैं। यही कारण है कि सत्य के उनके प्रयोगों की ज़मीन किन्हीं साधना  प्रक्रियाओं में नहीं बल्कि ठोस सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक संरचनाओं और परिस्थियों में है। कह सकते हैं कि महात्मा गांधी की आध्यात्मिकता एक प्रकार का आध्यात्मिक विद्रोह है, जिसके माध्यम से वह सत्य की अनुभूति की  साधना के प्रयोग करते हैं। यह आध्यात्मिकता उस विद्रोही या क्रान्तिकारी की आध्यात्मिकता ही कही जा सकती है, जो न केवल संरचनागत हिंसा के विरुध्द संघर्ष करता है, बल्कि, साथ ही, हमारी रूढ़िगत विश्वास प्रणाली को भी बदलने का बीड़ा उठाता है।

नन्दकिशोर आचार्य से हिन्दी जगत खूब अच्छी तरह परिचित है। कविता, नाटक, विचार, इतिहास, लेख, दर्शन के साथ अन्य विषयों पर भी इनकी बहुत सी किताबें प्रकाशित हैं। गम्भीर अध्येता और कुशल वक्ता हैं । बीकानेर में रहते हैं सौज-। अकार गांधी अंक में प्रकाशित लेख

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