देवर्तमान में देश के पास तीन विकल्प हैं। पहला विकल्प स्वैच्छिक दासता का है, दूसरा विकल्प चुनाव से सरकार बदल देने का है और तीसरा विकल्प आंदोलन से सरकार गिरा देने का है।यह तीनों स्थितियां समाज में चल रही हैं।
विशेष गहन पुनरीक्षण के नाम पर पूरे देश में चल रही वोट चोरी (नहीं डकैती) के समक्ष देश के पास तीन विकल्प हैं। पहला विकल्प स्वैच्छिक दासता का है, दूसरा विकल्प चुनाव से सरकार बदल देने का है और तीसरा विकल्प आंदोलन से सरकार गिरा देने का है। ऐसा नहीं है कि यह विकल्प यह स्तंभकार अपनी ओर से प्रस्तुत कर रहा है। यह तीनों स्थितियां समाज में चल रही हैं। हम तो इन्हीं स्थितियों का अवलोकन और विश्लेषण कर रहे हैं। स्वैच्छिक दासता वह स्थिति है जिसमें 2014 के बाद भारतीय समाज का बड़ा हिस्सा ठेल दिया गया है। धार्मिक स्थलों के विवादों के नाम पर, ऐतिहासिक और धार्मिक प्रतीकों में पैदा किए जाने वाले टकराव के नाम पर और चुनाव के मौके पर या समय समय पर दी जाने वाली तथाकथित सम्मान राशि या बहना योजनाओं जैसी रिश्वत के बहाने समाज में एक ऐसा वर्ग तैयार कर लिया गया है जो लगातार यह दावा करता रहता है कि यह सरकार अगले तीस साल तक चलने वाली है या अगले पचास साल तक चलने वाली है। यह ढपोरशंखी भाषा इसलिए सिखाई गई है ताकि पांच पांच साल पर होने वाली चुनाव की लोकतांत्रिक प्रक्रिया को महज औपचारिक बताया जा सके।
कुछ विश्लेषकों का मानना है कि यह सोच भारतीय समाज में 2014 के बाद आई है। वरना लोगों ने लोकतंत्र को पूरी तरह से आत्मसात कर लिया था। लेकिन हम इतिहास पर नजर दौड़ाएंगे तो पाएंगे कि हर समाज में ऐसी सोच रहती है। उसे विचार और कर्म के माध्यम से तोड़ना पड़ता है। उसी सोच पर प्रहार करते हुए सोलहवीं सदी के फ्रांसीसी विचारक एतिने द ला बोइसी(1530-1563) ने –‘द डिस्कोर्स आफ वॉलन्टरी सर्विट्यूड’ जैसा महत्त्वपूर्ण लेख लिखा। तब उनकी उम्र 20-22 साल थी। वह लेख इस सवाल से पैदा हुआ था कि लाखों लोग राजसत्ता के आदेश का स्वैच्छिक पालन क्यों करते हैं जबकि वे आदेश स्वयं उनके हितों पर आघात करने वाले होते हैं। इस लेख में बोइसी यह सवाल उठाते हैं, “अपने दुर्भाग्य के प्रति कृतसंकल्प और अपने कल्याण के प्रति अंधे, निर्धन, बदनसीब और मूर्ख लोगों और राष्ट्रों! तुम अपनी आय के सर्वोत्तम अंश से अपनी ही आंखों के सामने अपने को वंचित होने देते हो। तुम्हारे खेत लूटे जाते हैं, तुम्हारे घर उजाड़े जाते हैं, तुम्हारी पारिवारिक सम्पदा छीन ली जाती है। तुम किसी भी चीज पर स्वत्व का दावा नहीं कर सकते हो; और ऐसा लगता है कि तुम अपनी संपत्ति, परिवारों और अपने जीवन तक को ऋणी बनाकर भी स्वयं को भाग्यवान समझते हो।”
इन स्थितियों को और स्पष्ट करते हुए बोइसी सवाल करता है “तुम्हारे अपने हाथों के बिना तुम्हें पीटने के लिए उसे इतने हाथ कहां से मिल सकते हैं? तुम्हारे नगरों को वह जिन पांवों से रौदता है, वे स्वयं तुम्हारे सिवा किसके हो सकते हैं? यदि तुम्हारा ही सहयोग न हो तो वह कैसे तुम पर आक्रमण कर सकता है? यदि तुम स्वयं अपने को लूटने वाले चोर को अनुमति न दो, तुम्हीं अपने को मारने वाले हत्यारे के सह अपराधी न हो, स्वयं अपने प्रति धोखा न करो, तो वह कर क्या सकता है।”
उनका निष्कर्ष है कि तानाशाह न तो हरकुलिस है और न ही सैमसन, वह तो सर्वाधिक कायर और पौरुषहीन व्यक्ति है। उसे पराजित करने का तरीका यही है कि स्वैच्छा से उसके आदेशों को मानने से इंकार कर देना। उनका कहना है कि दासता कोई प्राकृतिक गुण नहीं है। प्राकृतिक गुण तो स्वतंत्रता है जो कि प्रकृति के हर जीव जन्तु में पाया जाता है। जरूरत उसे पहचानने की है।
नोटबंदी, लाकडाउन, जीएसटी और अब एसआईआर जैसे सरकार के हर कदम को शिरोधार्य करने वाले लोग वास्तव में स्वैच्छिक दासता के उस सोच के शिकार हैं जो शासकों ने तमाम कानूनों, धार्मिक पाखंडों और राष्ट्रवाद के भावुक और खोखले नारों के माध्यम से उन पर थोपा है। बदले में उन्हें कुछ टुकड़े फेंक दिए जाते हैं या फिर लूट में थोड़ी भागीदारी दे दी जाती है। इसी से वे प्रसन्न रहते हैं और अपने पड़ोसी या मित्रों को समझाया करते हैं कि जो हो रहा है वह ठीक हो रहा है और देखो इंटरनेट ने कितनी पारदर्शिता कायम कर रखी है। बिना इस बात का जिक्र किए कि चुनाव आयोग के इंटरनेट ने ही संविधान द्वारा प्रदत्त आप के बहुत बुनियादी अधिकार छीन लिए हैं।
इससे बाहर आने का जो आरंभिक तरीका बोइसी ने सुझाया है वो यह है कि तानाशाह के आदेश को मानने से इंकार कर दिया जाए। हमारे राजनीतिक दलों को जो तरीका सूझता है वो यह कि किसी प्रकार से चुनाव के माध्यम से उसे हराया जाए और फिर सत्ता पर काबिज होकर लोगों के लोकतांत्रिक अधिकारों को बहाल किया जाए। वे ऐसा दर्शाते भी हैं कि इस प्रयास में लगे हुए हैं। लेकिन वे इस बारे में सोचने और उपाय करने को कम तैयार होते हैं कि आखिरकार वे बार बार विफल क्यों होते हैं। क्यों नहीं मौजूदा तानाशाह के विरुद्ध सत्ताविरोधी जनमत बनता। हालांकि वे जानते हैं कि इसका विकल्प आंदोलन है ताकि जनता को जगाया जा सके और तानाशाह से इतनी अवज्ञा की जाए कि वह परेशान होकर हथियार डाल दे।
मुश्किल यह है कि जो लोग आंदोलन करने में प्रभावी होते हैं वे चुनाव नहीं जीत पाते और जो चुनाव जीत लेते हैं उनके किए आंदोलन नहीं होता। आज भारतीय राजनीति इसी कशमकश में फंसी हुई है। अगर ऐसा न होता तो 140 साल पुरानी कांग्रेस पार्टी और कुछ महीने पहले हंसी मजाक में पैदा हुई काकरोच जनता पार्टी के बीच नोंकझोंक न चल रही होती। काकरोच जनता पार्टी के सहसंयोजक आशुतोष रांका ने एक्स पर पोस्ट में लिखा “ खुद को उदारवादी कहने वाला इकोसिस्टम अभिजीत दीपके की आलोचना करने के लिए सक्रिय हो गया है। वह इस बात से परेशान है कि लंबे समय बाद वह लाखों भारतीयों की कल्पना और ध्यान को अपनी ओर खींचने में कामयाब रहे हैं। मजेदार बात यह है कि यह पूरा इकोसिस्टम सिर्फ ट्विटर पर मौजूद है। लेकिन किसी भी तरह उन्हें लगता है कि लोकतंत्र की रक्षा करने की जिम्मेदारी सिर्फ उसी की है।”
यह बहस लंबी हो चली है और काकरोच जनता पार्टी ने धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे को हासिल करके जो कामयाबी पाई उसके बाद जंतर मंतर के दूसरे चरण का एलान करके उसने राजनीतिक दलों के पैरोकारों में एक किस्म का डाह पैदा कर दिया है। ऐसे तमाम बौद्धिक काकरोच जनता पार्टी की फंडिंग को लेकर भी सवाल उठा रहे हैं।
लेकिन श्रेय लेने की यह डाह सिर्फ काकरोच जनता पार्टी और कांग्रेस पार्टी के बीच नहीं है। यह डाह समाजवादी पार्टी और कांग्रेस पार्टी के भीतर भी चल रही है। 30 सितंबर को जब इंडिया समूह की दिल्ली में बैठक हुई और दो अक्तूबर से आगे आंदोलन करने का फैसला किया गया तब समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव की अनुपस्थिति से भी ऐसी चर्चाएं गर्म हैं। यह उदार इकोसिस्टम आरोप लगा रहा है कि अखिलेश यादव धनराज नाथवानी के राज्यसभा नामांकन का बहाना बनाकर बैठक में नहीं आए। उनकी पार्टी विधान परिषद और दूसरे चुनावों का बहाना बनाकर एसआईआर और मुख्य चुनाव आय़ुक्त के विरोध में चल रहे आंदोलन में सक्रिय हिस्सेदारी नहीं कर रही है। आरोप यह भी है कि धनराज नाथवानी जैसे रिलायंस समूह के अधिकारी की भला कौन सी समाजवादी और लोकतांत्रिक निष्ठाएं हो सकती हैं। उनके पिता तो भाजपा और एनडीए के सहयोग से राज्यसभा में गए हैं। इस खींचतान में राजनीतिक दलों के हाथ से आंदोलन खिसक कर फिर सिविल सोसायटी और काकरोच जनता पार्टी जैसे नए संगठनों के हाथ में जा रहा है और राजनीतिक दलों के पैरोकार छाती पीटने में लगे हैं, जबकि जरूरत इन सभी शक्तियों के बीच समन्वय और सहयोग की है।
राजनीतिक दल इस बात को लगातार भूलते जा रहे हैं कि उनका काम सिर्फ चुनाव जीतकर शासन करना ही नहीं होता बल्कि जनता के भीतर चेतना के स्तर को बढ़ाना होता है और व्यवस्था को लगातार उन्नत अवस्था में पहुंचाने का होता है। ताकि मानव समाज विकास कर सके। उनके लिए विकास का मतलब हाईवे, पुल और रेलगाड़ी होती है। इस सोच में मानसिक विकास पीछे छूट जाता है। आज आवश्यकता इस बात की है कि जो लोग स्वैच्छिक दासता से मुक्त हैं उनके भीतर एकता कायम की जाए और जो लोग स्वैच्छिक दासता में फंसे हैं उन्हें उससे मुक्ति दिलाई जाए। भारत में यह दासता राजनीतिक आर्थिक के साथ गहरे तौर पर सामाजिक भी है। इसलिए यहां अधिक मेहनत और आंदोलन की आवश्यकता है।
अरुण कुमार त्रिपाठी की पोस्ट से
