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2027 के र्विश्व पुस्तक मेले में लेखकों और छोटे प्रकाशनों के लिए न्यूनतम राशि अब पहले से दोगुनी यानि 38 हजार 940 रुपये कर दी गई है। सीमित बजट से चलने वाले और कई बार परिवर्तनवादी विचारों, आंदोलनों से भी जुड़े रहने वाले छोटे प्रकाशकों और छोटी पत्रिकाओं के लिए वहां स्टाॅल लगाना असंभव होता जाएगा।
अगले मेले में स्टॉल लगाने का शुल्क और बढ़ा , हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओँ की स्टॉल की संख्या और घटेगी।
लखनऊ में अभी 12 से 20 सितंबर तक गोमती पुस्तक मेला हुआ। इसका आयोजन नेशनल बुक ट्रस्ट ने किया था। लखनऊ में ही 1 अक्तूबर से शुरू हुआ एक अन्य राष्ट्रीय पुस्तक मेला 11 अक्तूबर तक चलेगा। इसी तरह के आयोजन देश के विभिन्न शहरों में होते रहते हैं। नेशनल बुक ट्रस्ट मेले का आयोजन सरकारी किस्म का होता है जबकि दूसरे आयोजन विभिन्न संस्थाएं प्रकाशकों की मदद से करती हैं। आम तौर पर इनमें बिकने वाली किताबें, यहां होने वाले आयोजन, उनमें होने वाली बातचीत, इनके माहौल आदि से ही आपको लग जाएगा कि ये पहले वाले से किस तरह और क्यों अलग हैं, हालांकि ऐसे आयोजनों पर भी थोड़ी-बहुत तो सरकारी छाया पड़ने ही लगी है।
इसमें शक नहीं कि दिल्ली से लेकर किसी भी शहर में नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा आयोजित होने वाले मेलों में चमक-दमक बढ़ रही है, प्रधानमंत्री के कटआउट के साथ सेल्फी पाॅईंट्स की तादाद भी बढ़ रही है, इनके इर्द-गिर्द खाने-पीने के स्टाॅलों पर चाय से लेकर सभी आयटमों की कीमतें भी बढ़ रहीे हैं, प्रवेश मुफत करने के चलते मेले में पहुंचनेवालों की तादाद भी बढ़ रही है। मगर बारीकी से गौर करें तो पाएंगे कि मेले का स्वरूप रफ्ता-रफ्ता बदला जा रहा है। ट्रस्ट द्वारा दिल्ली में आयोजित होने वाले विश्व पुस्तक मेले का आगाज 1972 में हुआ था। तत्कालीन राष्टपति वी. वी. गिरी ने उसका उदघाटन किया था। यह अकारण नहीं कि ‘प्रकाशन में एकाधिकार की नीतियां वापस लेने’ तथा ‘पठन-पाठन की संस्कृति और विविधता पर हमलों’ पर चिंतित सरोकार संपन्न लेखक, पत्रकार, रचनाकार और प्रबुद्ध पाठक ही नहीं, मेले में नियमित पहुंचनेवाले भी पुस्तक मेले के इस बदलते स्वरूप से चिंतित हैं और उनका आकलन है कि अगर यह सिलसिला जारी रहा तो यह ‘समाप्त हो जाएगा’।
पर्वतारोही, ग्राफिक डिजाइनर, साहसभरी यात्राओं के बारे में नियमित तौर पर लिखने वाले और अंग्रेजी तथा हिन्दी में कई किताबों के लेखक राजिन्दर अरोड़ा पिछले दो दशकों से अधिक समय से पुस्तक मेले में नियमित आते रहे हैं। उन्होंने 10 से 18 जनवरी तक दिल्ली में हुए 2026 के पुस्तक मेले के बारे में बेहद भावुक ढंग से लिखा कि ‘अगर आप किसी चीज या जगह को जबरदस्त पाॅलिश करते जाते हैं, तो मुमकिन है कि वह कुछ समय तक चमके, मगर उसकी आत्मा को चोट पहुंचती है। भारत मंडपम में सालाना होने वाले विश्व पुस्तक मेले को इस साल इसी तरह झेलना पड़ा। भारत मंडपम के पांच हाॅलों में फैला पुस्तक मेला गोया ‘सैनिटाइज्ड, साफ-सुथरा अस्पताल वाॅर्ड’ लग रहा था – जहां हर थीम, हर स्टाॅल, हर वस्तु, और असहमति रखनेवाला हर नजरिया/ परिप्रेक्ष्य या ‘प्रतिकूल/ मुखालिफ किताब को एक ‘तीसरी आंख’ ने यांत्रिक ढंग से जांच लिया था और सुनियोजित ढंग से हटा दिया था।’
इस मेले में ‘काले चश्मे और यूनिफाॅर्म में, असली रायफलों को थामे सैनिकों के दस्ते लगातार मौजूद रहे, जो ‘जीत’ का ऐलान करते तिरंगे के साथ मिल रहे थे; मेले के केन्द्र में तीनों सैन्य दलों का हार्डवेयर भी खड़ा मिला था,’ आर्मर्ड वाहन, अर्जुन बैटल टैंक, आदि, ‘वहां एक बड़े अहाते में युद्धपोत और लड़ाकू विमान भी मौजूद थे।’ वहीं ‘कुछ क्षण के लिए आपको महसूस हो सकता था कि आप पुस्तक मेले में नहीं बल्कि डिफेन्स एक्स्पो में पहुंचे हैं।’ और यह सब कवायद इसलिए की गई थी कि मेले का फोकस ‘भारत का सैन्य इतिहास’ बनाया गया था।
अगर हम 16 जनवरी से 24 जनवरी 2027 तक दिल्ली में प्रस्तावित पुस्तक मेले की तैयारियों पर गौर करें, तो यह बात आंकड़ों, तथ्यों के जरिये भी समझ आएगी। मिसाल के तौर पर, लेखकों और छोटे प्रकाशनों के लिए न्यूनतम राशि अब 38 हजार 940 रुपये कर दी गई है। वर्ष 2026 में यह 17 हजार 641 रुपये थी। जाहिर है, सीमित बजट से चलने वाले और कई बार परिवर्तनवादी विचारों, आंदोलनों से भी जुड़े रहने वाले छोटे प्रकाशकों और छोटी पत्रिकाओं के लिए वहां स्टाॅल लगाना असंभव होता जाएगा। पहले छोटे प्रकाशनों के लिए स्टैण्ड भी मिलते थे। पिछले एक दशक से अधिक समय से स्टैण्ड की व्यवस्था बंद कर दी गई है। मतलब, स्टाॅल बुकिंग के साथ इसके लिए अलग से खर्च करना होगा।
मेले के बदलते स्वरूप को हिन्दी और विभिन्न भाषाओं के स्टाॅलों की उपस्थिति के हिसाब से भी देखा जा सकता है। हिन्दी स्टाॅलों की संख्या 2014 में 323 थी। वर्ष 2026 आते-आते यह 156 हो गई। भारतीय भाषाओं की मौजूदगी भी घटती जा रही है। वर्ष 2026 में यहां केवल आठ भारतीय भाषाओं की उपस्थिति थी। 2025 मेले की तुलना में 6 भाषाएं कम हो गई थीं। ये सभी आंकड़े पुस्तक मेले के आयोजक नेशनल बुक ट्रस्ट की तरफ से मेलों के लिए जारी साहित्य, डायरेक्टरी से ही लिए गए हैं।
पुस्तक मेला 2014 में दक्षिणपंथी हुकूमत के आगमन के बाद से ही धीरे-धीरे केसरिया रंग में रंगता जा रहा है। स्टाॅलों के जरिये अंधश्रद्धा का प्रसार होता दिखेगा, नफरत भरी बातों का प्रचार होता मिलेगा। उदाहरण के लिए, 2020 में पुस्तक मेले के अंदर ही ‘नक्षत्र 2020’ नाम से एक समूचा हाॅल बना था। यहां ‘विशेषज्ञ’ कहलाने वाले लोग ‘भविष्यवाणियां’ बेच रहे थे। ये कथित विशेषज्ञ लोगों की हस्तरेखाएं देखकर, उनके ग्रहों की दशा-दिशा की अनर्गल बातें सुनाकर उन्हें रंगबिरंगे पत्थर भी बेच रहे थे। जिस मुल्क का संविधान वैज्ञानिक चिंतन के प्रचार-प्रसार को नागरिकों के बुनियादी कर्तव्यों में शुमार करता है और जहां डाॅ. दाभोलकर, प्रो. कलबुर्गी, काॅमरेड गोविंद पानसरे और गौरी लंकेश-जैसे तर्कवादी, प्रगतिशील विचारों के हिमायतियों को महज इसलिए मारा गया कि वे ऐसी तमाम बातों का प्रचार करते थे, अंधश्रद्धा और अवैज्ञानिकता का विरोध करते थे, वहां के सरकारी आयोजन में ऐसा होना विडंबना ही है। इसका उत्तर कोई नहीं देता कि जहां राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर के लेखक, विद्वान आते हों, वहां अंध श्रद्धा के प्रचार-प्रसार के लिए मंच प्रदान करना पुस्तक मेले के उददेश्य से किस तरह जुड़ता है।
बात सिर्फ अंधश्रद्धा को बढ़ावा देने तक सीमित नहीं थी, वहां नेशनल बुक ट्रस्ट के सौजन्य से तमाम आध्यात्मिक और धार्मिक संगठनों की भी गोया बाढ़ आई है, जो अपने बड़े बड़े स्टाॅल लगाते हैं और केसरिया पहने उनके कर्मचारी/ साधु अपना साहित्य बेचने से लेकर ‘आत्मा के शुद्धिकरण’ के लिए अन्य बहुत सारी सामग्री बेचते रहते हैं।
दरअसल, 2014 में हिन्दुत्व वर्चस्ववादी हुकूमत कायम होने के बाद ‘न्यू इंडिया’ के प्लान को अमल करने के खयाल से पुस्तक मेले के इस रैडिकल रूपांतरण के बीज डाले गए थे। प्रगति मैदान तीन विशाल सभागार थेः हाॅल आफ नेशन्स, हाॅल ऑफ इंडस्ट्रीज और नेहरू पैविलियन। यहां पुस्तक मेले, ट्रेड फेयर तथा अन्य भव्य कार्यक्रमों के आयोजन होते थे। उन्हें ध्वस्त करने की योजना के तहत भारत मंडपम जैसा हाॅल बनाया गया जहां सत्ताधारी पार्टी की बैठकें, सम्मेलन आदि अधिक होते हैं।
दरअसल, ये विशाल हाॅल आजादी की पचीसवीं सालगिरह- 1972 के अवसर पर बने थे। उन्हें आधुनिकता और तरक्की के प्रतीक के तौर पर दुनिया भर में सराहा जाता था। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आधुनिक वास्तुशिल्प के इतिहास में इन्हें भारत के अहम योगदान के तौर पर भी समझा जाता था। इस अवसर को सेलिब्रेट करने के लिए विशेष पोस्टेज स्टाम्प भी जारी किए गए थे। पुस्तक मेले का आयोजन इन्हीं हाॅल में होते थे। दुनिया के अग्रणी वास्तुशिल्पियों, बुद्धिजीवियों ने इन हाॅल के ध्वस्तीकरण की योजना को स्थगित करने की अपील प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से की थी। उन्होंने यह भी कहा था कि समूचे प्रगति मैदान में महज 2 फीसद जगह घेर रहे इन हाॅल का संरक्षण करना और आगे ले जाना यह इस पीढ़ी की जिम्मेदारी है।
अग्रणी वास्तुशिल्पी राज रेवल ने हाॅल ऑफ नेशन्स और हाॅल ऑफ इंडस्ट्रीज का नक्शा बनाया था। इसके लिए उन्हें अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार मिले थे। नेहरू पेविलियन का नक्शा अग्रणी वास्तुशिल्पी हबीब रहमान ने किया था जिन्होंने नेहरू काल की तमाम इमारतों का खाका बनाया था। हबीब रहमान के बेटे राम रहमान इतिहासकार और फोटोग्राफर हैं। उन्होंने कहा था कि इन्हें ध्वस्त करने की योजना विचारधारा से प्रेरित है। उन्होंने कहा था कि ‘यह, दरअसल, नेहरू काल की विरासत और नेहरू के आधुनिक भारत के प्रतीकों को नष्ट करने का संगठित प्रयास है।’
क्या यह कहना मुनासिब होगा कि विश्व पुस्तक मेले में लाया जा रहा यह रैडिकल बदलाव भी नेहरू की ऐतिहासिक विरासत को धूमिल कर हिन्दू राष्ट्र के एजेंडे को ही मजबूती दिलाने की कवायद का हिस्सा है?
( साभार : ‘संडे नवजीवन’)
