बीसवीं सदी के उन शुरुआती सालों में जनता में एक गुस्सा था, लेकिन कोई राह नहीं थी. अहिंसा से आजादी की लड़ाई लड़ने का कन्सेप्ट भारत क्या, दुनिया के किसी देश के पास नहीं था. गांधी के विश्व पटल पर आने से पहले दुनिया की सत्ता और जनता दोनों तलवार की भाषा ही जानते थे.
गांधी स्मरण की इस वेला में गांधी जी का बुनियादी काम कहीं पीछे छूटा जा रहा है. वह काम जिसके लिए दुनिया उन्हें पूजती है. जिसके लिए दुनिया का दबा कुचला आदमी उनकी ओर यानी उनके विचार की ओर देखता है.
वह ताकत थी अहिंसक युद्ध की ताकत. आप को लग सकता है कि जब गांधी जी का जिक्र आता है तो अहिंसा की बात तो कर ही ली जाती है, बल्कि साथ में सत्य की चर्चा और हो जाती है. लेकिन फिर कहना पड़ेगा कि सत्य-अहिंसा शब्दों का प्रयोग अब इतने चलताऊ ढंग से होने लगा है कि उनसे गांधी की विराट छवि नौजवानों के सामने नहीं बनती.
इस छवि को समझना हो तो हमें 20वीं सदी के उन शुरुआती सालों में जाना होगा जब गांधी पहले दक्षिण अफ्रीका में और फिर भारत में अपनी छाप छोड़ने जा रहे थे.
आज लोकतंत्र की कल्पना करना, लोकतांत्रिक तौर-तरीकों से काम करना हमारे रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा है. कोई बात ज्यादा बिगड़ गई तो हड़ताल करना या धरने पर बैठ जाना भी हमारे जीवन का हिस्सा बन गया है. क्रमिक उपवास और आमरण उपवास जैसे प्रयोग भी हम देखते रहते हैं.
लेकिन जब गांधी यह सब शुरू करने वाले थे, तब दुनिया और थी. भारत का बड़ा भूभाग अंग्रेजों की गुलामी में था. इसके अलावा दूसरा बड़ा भूभाग सैकड़ों राजे रजवाड़ों का गुलाम था. अंग्रेजों के आने से पहले यह राजा आपस में लड़ा करते थे. अंग्रेजों से परास्त होने के बाद ये राजा आपस में नहीं लड़ पाते थे, बल्कि खुद भी अंग्रेजों के चाकर हो गए थे. लेकिन जनता पर उनकी हुकूमत पहले की तरह कायम थी. इन राजाओं के अलावा एक बड़ी फौज जमींदार और जागीरदारों की थी.
बीसवीं सदी के उन शुरुआती सालों में जनता में एक गुस्सा था, लेकिन कोई राह नहीं थी. अहिंसा से आजादी की लड़ाई लड़ने का कन्सेप्ट भारत क्या, दुनिया के किसी देश के पास नहीं था. गांधी के विश्व पटल पर आने से पहले दुनिया की सत्ता और जनता दोनों तलवार की भाषा ही जानते थे. फ्रांस की मशहूर क्रांति रक्तरंजित थी. 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में भारत खून से नहा गया था. महात्मा गांधी जब भारत में पांव जमा रहे थे और चंपारण जैसे सत्याग्रह शुरू कर रहे थे. तब तक दुनिया पहले विश्वयुद्ध का स्वाद चख चुकी थी. सोवियत रूस में 1917 में जो जनक्रांति हुई थी वह भी हिंसा के जोर पर हुई थी. इतनी हिंसा से दुनिया का मन नहीं भरा था और उसके बाद वह दूसरे विश्व युद्ध की तैयारी में जुटी रही और अंत में लड़कर ही मानी.
पूरी दुनिया तानाशाह पैदा करने में जुटी थी. हर देश में अपना अपना तानाशाह नायक बना घूमता था. हिटलर, मुसोलिनी, स्टालिन और यहां तक कि चर्चिल अपनी अपनी तरह के अतिवादी थे. ताबाही की बातें देशभक्ति की बातें समझी जाती थीं. लोग जंग लड़ने के लिए मरे जा रहे थे, तब दो विश्व युद्धों के बीच में अहिंसक युद्ध को ईजाद करना और उस पर 36 करोड़ भूखे, गरीब लोगों को चलाना कितना बड़ा चमत्कार रहा होगा. वह देश जिसके दशावतार अस्त्र शस्त्र से ही दुष्टों का संहार करते रहे हों. जिसके मन में वीरता की कल्पना का मतलब पृथ्वीराज चौहान और आल्हा ऊदल रहे हों. जिस देश में यह कहावत चलती हो- जा को बैरी जिंदा बैठो ता के जीवे पे धिक्कार’, उस देश में वह अहिंसा के बारे में कैसे सोच रहा था.
और सोच भी रहा था तो क्या उसे अंग्रेज, बल्कि यों कहें कि यूरोप के समाज की ताकत का अंदाजा नहीं था. यूरोप के गोरों ने सिर्फ हिंदुस्तान को गुलाम नहीं बनाया था, वे पूरी दुनिया पर बेरहमी से राज कर रहे थे. यूरोप के गोरों ने अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया जैसे महाद्वीपों में तो वहां के मूल निवासियों को तकरीबन खत्म ही कर दिया था. आज जो ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका हम देख रहे हैं, वह इन गोरों से ही बना है. वहां के मूल निवासी आज भी हमारे विमर्श में नहीं आ पाते. यह वही गोरे थे जिन्होंने अफ्रीका महाद्वीप के लोगों को गुलाम बनाकर एक महाद्वीप से दूसरे महाद्वीप तक ले जाते थे. गुलामों के इस कारोबार ने अफ्रीका को तहस नहस कर दिया. एक एशिया को छोड़ दें तो वे पूरी दुनिया पर न सिर्फ राज कर रहे थे, बल्कि वहां के मूल निवासियों के साथ जानवरों से बुरा व्यवहार कर रहे थे.
इतने ताकतवर, क्रूर और हथियारों के अनुसंधान में चरम पर पहुंच चुके शत्रु के सामने गांधी अहिंसा का अस्त्र लेकर उतर रहे थे. उनके साथ हथियार बंद फौज या युद्धों की ट्रेनिंग हासिल किए लोगों के बजाय अधनंगे किसान होने वाले थे. इस पूरे दृश्य को एक साथ मिलाकर देखिए कि महात्मा गांधी कितना बड़ा चमत्कार करने की तैयारी कर रहे थे. और जब वे यह सब करने जा रहे थे तो दुनिया के ताकतवर मुल्क और तानाशाह उनके बारे में क्या सोचते होंगे.
लेकिन गांधी को पता था कि वे क्या करने वाले हैं. उन्हें पता था कि फौज और हथियारों की जरूरत उन्हें होती है, जिन्हें किसी को हराना हो. जिन्हें कोई भौतिक युद्ध लड़न हो. गांधी को पता था कि उनका युद्ध मुक्ति का युद्ध है. यह मुक्ति हर बुराई से एक साथ होनी है. भारत को अंग्रेजों से मुक्त होना है, गरीबी से मुक्त होना है, हिंदू मुस्लिम के भेद से मुक्त होना है, छुआछूत की बीमारी से मुक्त होना है, अज्ञान के अंधेरे से मुक्त होना है, भोग में डूबी सभ्यता के नशे से मुक्त होना है. मुक्त होने के लिए युद्ध की नहीं त्याग की जरूरत पड़ती है. गांधी ने यही किया. उन्होंने पहली बात अपने लोगों से से जो कही वह थी- अपना भय त्याग दो. दूसरी बात उन्होंने कही कि खुद को आजाद मान लो. यही दो बातें वे पूरी लड़ाई में अपने लोगों को सिखाते रहे. उन्होंने अनेक बाद कहा कि जिस दिन भारत के लोग मन से खुद को अंग्रेजों से मुक्त मान लेंगे, उस दिन भारत आजाद हो जाएगा भले ही शारीरिक रूप से अंग्रेज यहां बने रहें.
वे हर कांग्रेसी को अहिंसा का सिपाही बनाते रहे. जिसकी जरूरतें कम से कम हों. इतनी कम कि वह पहनने के लिए अपने कपड़े खुद कात सके. खाने के लिए खुद उगा सके. जिसके हाथ में तिरंगा हो. तिरंगा का मतलब आजादी का विचार. जो व्यक्ति अपनी इंद्रियों की गुलामी से आजाद हो सकता है, उसे दुनिया की कोई फौज चाहे कितनी भी शक्तिशाली क्यों न हो, गुलाम नहीं बना सकती. इन्हीं सिद्धांतों के साथ उन्होंने करीब 30 साल तक भारत का नेतृत्व किया. इस नेतृत्व ने भारत को अंग्रेजों से लड़ने के साथ ही स्वाभिमान से जीना सिखाया. उन्हें लोकतंत्र के सबक दिए.
इसी सबक ने भारत को और देशों से अलग बनाया. जब भारत आजाद हुआ तो दुनिया के और भी देश आजाद हुए. लेकिन जरा गौर से देखिए उन मुल्कों में लोकतंत्र की स्थिति क्या है. वहां के लोग कितने आजाद हैं. वहां महिलाओं ओर वंचितों के साथ कितनी बराबरी का व्यवहार हो रहा है. पश्चिम में पाकिस्तान से लेकर पूरा अरब जगह घूम आइये, आपको अंदाजा लग जाएगा कि वे लोग किस दुनिया में जी रहे हैं. चीन चले जाइये, वहां की सरकार आपको बताएगी कि वहां सब इतना ज्यादा अच्छा है कि आप कभी यकीन नहीं कर पाएंगे, क्योंकि वहां आजादी है ही नहीं. गांधी हमें इसी बात की ट्रेनिंग दे रहे थे कि राजप्रासाद पर झंडे बदलने का मतलब आजादी नहीं है, हर आदमी की खुशहाली ही आजादी है. इसीलएि आजादी की लड़ाई अनंत है. जब तक रामराज्य नहीं आ जाता आजादी की लड़ाई चलती रहती है.जब गांधी ने यह कर दिखाया तो भारत बदल गया. भारत के साथ दुनिया भी बदल गई. जिस अमेरिका ने दूसरे विश्वयुद्ध के बाद खुद को दुनिया का निर्विवाद दादा घोषित कर दिया था, जब वहां काले लोगों ने अपनी आजादी की लड़ाई लड़ी तो गांधी के सिद्धातों पर ही लड़ी. मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने न सिर्फ माना बल्कि गांधी के रास्ते पर चल कर दिखाया. यही काम बाद में दक्षिण अफ्रीका में नेलशन मंडेला ने कहा. दुनिया के यह दोनों संग्राम गांधी के बाद हुए और गांधी पहले के युग से एकदम अलग तरीके से हुए. आज दुनिया में जहां कहीं जनता विद्रोह करती है, वह गांधी के तरीके से ही होता है.
गांधी अपने पीछे एक बदली हुई दुनिया छोड़ गए. एक ऐसी दुनिया जो झगड़ों को युद्ध के बजाय संवाद से सुलझाना चाहती है. एक ऐसी दुनिया जिसमें राजाओं को निहत्थों पर वार करने में शर्म आती है. एक ऐसी दुनिया जहां आम आदमी की आवाज सत्ता के शिखर के आवाज से अधिक ऊंची है. इसी बदली हुई दुनिया के लिए दुनिया गांधी को पूजती है. दुनिया को इसी तरह बदल देना गांधी की सत्य और अहिंसा है.
(पीयूष बबेले की पोस्ट से साभार)
