आलेख

अदालत का फैसला अगर ‘न्याय’ से चूक जाए, तो आदमी क्या करे? कहां जाए?

October 8, 2020

नित्यानंद गायेन किसी भी लोकतंत्र में अदालतें शोषित और पीड़ितों के लिए न्याय की अंतिम उम्मीद होती हैं। जब वही अदालतें दमनकारी सत्ता की भाषा में जनविरोधी फैसलें सुनाने लगें या किसी पीड़ित की अपील को सुनने से मना कर दें और जज किसी मामले की सुनवाई से खुद को अलग कर लें, तो उस […]

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एक सभ्य समाज की पहचान जस्टिस – मार्कंडेय काटजू

October 7, 2020

मैंने आदेश दिया कि क्योंकि यह सार्वजनिक सड़क थी, निजी नहीं, इसलिए संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत मुसलमानों को अंतिम संस्कार का जुलूस निकालने का अधिकार है, और अधिकारियों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि कोई भी उस अधिकार में हस्तक्षेप न करे। सभ्य समाज की एक पहचान यह है कि उसमें अल्पसंख्यक गौरव और […]

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दलितों के ख़िलाफ़ हिंसा के विरोध का जिम्मा इसी समुदाय का नहीं है!-अपूर्वानंद

October 6, 2020

बाबा साहब आंबेडकर और संविधान के चलते दलितों को बराबरी का अधिकार क़ानूनी तौर पर प्राप्त हुआ, लेकिन एक व्यापक जीवन में शामिल होने का अनुभव उन्हें कभी नहीं मिला। यह अभी भी सपना ही है कि एक दलित सामान्य लोकसभा या विधानसभा की सीट पर जीत जाए। वैसे ही जैसे एक मुसलमान ग़ैर मुसलमान-बहुल […]

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वीके मेनन : नेहरू का चाणक्य जिससे अमेरिका तक खौफ़जदा था

October 6, 2020

अनुराग भारद्वाज 1957 में कश्मीर मुद्दे पर अमेरिका के जनमत संग्रह प्रस्ताव का उन्होंने इस कदर विरोध किया कि संयुक्त राष्ट महासभा को प्रस्ताव वापस लेना पड़ा. 1947 से लेकर 1964 तक भारत और नेहरू पर जिन ख़ास लोगों का प्रभाव था उनमें से वीके मेनन एक थे. मेनन पर साम्यवाद का प्रभाव लंदन स्कूल […]

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श्रद्धा और घृणा की धुंध हटाए बिना गांधी को जानना कठिन है- अपूर्वानंद

October 3, 2020

गांधी अपने ही देश में अफवाह बन गए हैं. उन्हें जानने की शुरुआत उस तरीके से की जा सकती है जो नेहरू ने ‘गांधी’ बनाने की सोच रहे रिचर्ड अटेनबरो को सुझाया था यह किंचित सुखद आश्चर्य की बात है कि गांधी में अभी भी नौजवानों की दिलचस्पी बनी हुई है. कुछ समय पहले महू […]

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गाँधी: विद्रोह की आध्यात्मिकता- नन्दकिशोर आचार्य

October 2, 2020

      मेरा जीवन ही मेरा सन्देश है – महात्मा गाँधी के इस प्रसिध्द कथन का वास्तविक तात्पर्य क्या है? क्या इस का आशय उनकी निजी जीवन शैली से है अर्थात् अपरिग्रह प्रेरित न्यूनतम आवश्यकताओं पर आधारित सादा जीवन-शैली से अथवा इस कथन को उनके सार्वजनिक जीवन के सन्दर्भ में व्याख्यायित किया जाना चाहिए। महात्मा गांधी […]

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भारतीय लोगों की ग़ुलामी की मानसिकता नहीं है – राम पुनियानी

October 1, 2020

1947 में भारत के लोगों ने वतन को आज़ाद कराने के लिए अंग्रेज़ों को उखाड़ फेंका था। अब उनके प्रतीक प्राचीन समय के राजा नहीं हैं, बल्कि वे हैं जिन्होंने आधुनिक भारत का निर्माण किया था। जब सामराजी राजनीतिक सिद्धांतकार जेम्स मिल ने भारतीय इतिहास को “हिंदू”, “मुस्लिम” और ब्रिटिश काल में बांटा था तो […]

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भगत सिंह: …जो मुक्त चिंतन को बर्दाश्त न कर सके, तो वह भाड़ में जाए– अपूर्वानंद

September 28, 2020

आज यानी 28 सितम्बर को शहीद भगत सिंह का जन्मदिन है। एक सवाल कौंधता है। भगत सिंह के विचारों में इतनी स्पष्टता कैसे आई? किताबों से? किताबों से उनका गहरा लगाव था। भगत सिंह के मित्रों में से एक शिव वर्मा ने लिखा है कि भगत सिंह हमेशा एक छोटा पुस्तकालय लिए चलते थे। भगत […]

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क्या आर्थिक मंदी के मौजूदा हालात में देश मनमोहन सिंह को अलग नजरिये से देखने लगा है?

September 27, 2020

हिमांशु शेखर मनमोहन सिंह ने एक बार कहा था कि इतिहास उनके साथ थोड़ी नरमी बरतेगा. ऐसे में यह जानना रोचक है कि अब उन्हें कैसे याद किया जा रहा है? आज जब देश में आर्थिक मंदी की मार बढ़ती जा रही है, खासकर कोरोना संकट के बाद जब जीपीडी में ऐतिहासिक सिकुड़न की चर्चा […]

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नेताओं के लिए अपमानजनक शब्द कहने मात्र से राजद्रोह का केस नहीं बनता: जम्मू कश्मीर हाई कोर्ट

September 26, 2020

विप्लव अवस्थी राजद्रोह का यह कानून अंग्रेजों के जमाने का है। तब अंग्रेज इस कानून का इस्तेमाल उन भारतीयों के ख़िलाफ़ करते थे, जो अंग्रेजों की बात मानने से इनकार कर देते थे। ये कानून 1870 में वजूद में आया था। बाल गंगाधर तिलक और महात्मा गांधी को भी राजद्रोह का आरोपी बनाया गया था। […]

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