आलेख

भारतीय किसान आंदोलन वह चिंगारी है जो देश बदल सकता है! – जस्टिस मार्कंडेय काटजू

January 6, 2021

किसान आंदोलन हकीकत में आर्थिक मुद्दे पर आधारित है। किसानों को उनकी उपज के लिए पर्याप्त पारिश्रमिक नहीं मिल रहा है। यह राम मंदिर बनाने जैसे भावनात्मक और भावुक मुद्दे जैसा नहीं है। इसे भारत के लगभग 75  करोड़ किसानों का समर्थन प्राप्त है, हालांकि ज़ाहिर है कि ये सभी दिल्ली के पास इकट्ठा नहीं […]

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हिंदू ‘ऑटोमैटिक पैट्रीअट’ तो सिख, ईसाई, मुसलिम क्या हैं? – अपूर्वानंद

January 4, 2021

आजकल हर पैट्रीअट शांतिनिकेतन की दौड़ लगा रहा है। कुछ नारदवृत्तिधारी इस तीर्थयात्रा में भी सांसारिक प्रयोजन सूंघ रहे हैं। सांसारिक कारण से ही सही, अगर कोई पवित्रता का स्पर्श पा ले तो क्या बुरा! लेकिन शांतिनिकेतन के ऋषि ने तो कहा था कि ‘पैट्रीअटिज़्म हमारा अंतिम आध्यात्मिक आवास नहीं हो सकता। वर्षारंभ पर एक […]

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2020 : राष्ट्रोन्माद, निरंकुश प्रवृत्तियों के मज़बूत होने का साल

January 3, 2021

मुकेश कुमार स्वतंत्रता, समानता और न्याय पर लगातार प्रहार होने के बावजूद कोई सार्थक हस्तक्षेप कहीं से होता नहीं दिख रहा है। इस साल ये चिंताएं बढ़ गई हैं कि कहीं दुनिया एक बर्बर भविष्य में तो दाखिल नहीं हो रही है। यह बर्बरता बहुराष्ट्रीय कंपनियों की अदम्य भूख का नतीजा है क्योंकि वे अपनी […]

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भीमा कोरेगाँव: क्या दलित नए मिथक गढ़ेगा?

January 2, 2021

रविकान्त भीमा कोरेगांव में महारों के शौर्य के 200वें जलसे के दौरान हुई हिंसा के बहाने हिंदुत्ववादी ताकतें मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों का दमन करने पर उतारू हैं। पूरी दुनिया के साहित्यकारों और बुद्धिजीवियों ने इन मानवाधिकार कार्यकर्ताओं पर जेल में होने वाली क्रूरता की निंदा की है। लेकिन दमन का सिलसिला थम नहीं रहा […]

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केरल के किसानों की स्थिति पर क्या झूठ बोल रहे हैं प्रधानमंत्री?

December 29, 2020

अनिल शुक्ल प्रधानमंत्री की 6 हज़ार रुपये की सालाना किसान राहत योजना पर नरेंद्र मोदी से लेकर पूरी बीजेपी को बड़ा रश्क़ है। इतराने वाले इस ‘अहसान के बोझ’ से इतर यदि केरल की तुलना की जाए तो वहाँ राज्य सरकार धान के किसान को अनुदान स्वरुप प्रति हेक्टेअर एक फ़सल का 55 सौ रुपये […]

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2020: व्यक्ति ने ख़ुद को साबित किया, संस्थाओं ने घुटने टेक दिए! -अपूर्वानंद

December 28, 2020

साल का अंत एक बड़ी कूच के साथ हुआ है। दिल्ली चलो, उस नारे के साथ। यह नारा एक याद है। किसी और ने दिया था। सरकार अपनी तरह के लोगों की न थी। लेकिन क्या उस ‘दिल्ली चलो’ का मतलब सिर्फ़ यह था कि दूसरे दीखनेवालों को खदेड़ दिया जाए? या यह कि जिस […]

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रावण को नायक क्यों मानते थे दलित नेता पेरियार!

December 26, 2020

रविकान्त पेरियार की पुण्यतिथि 24 दिसंबर को थी। पेरियार दूरदर्शी थे। उपनिवेशवाद विरोधी आंदोलन में उपजे राष्ट्रवाद के ख़तरे को भाँपते हुए उन्होंने हिंदुत्व के साथ इसके गठजोड़ की संभावनाओं को देख लिया था। 1937 के चुनाव में मद्रास प्रांत में कांग्रेस की सरकार बनी। सी. राजगोपालाचारी प्रधानमंत्री (वर्तमान के हिसाब से मुख्यमंत्री) बने। उन्होंने स्कूलों में […]

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अन्ना आंदोलन की तरह सरकार की नींव हिला पायेगा किसान आंदोलन? -प्रियदर्शन

December 23, 2020

क्या दिल्ली की सरहदों पर चल रहा किसानों का आंदोलन मोदी सरकार की ‘अन्ना घड़ी’ है? मूलतः गैर राजनीतिक बने रहने की ज़िद के बावजूद मोदी सरकार पर किसान आंदोलन के क्या वैसे ही प्रभाव होंगे जैसे अन्ना आंदोलन के मनमोहन सरकार पर पड़े थे जो ख़ुद को गैर राजनीतिक ही मानता था? या किसी लोकतांत्रिक देश में कोई […]

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क्यों कृषि क्षेत्र का मतलब केवल अनाज उपजाना नहीं होता?

December 22, 2020

अजय कुमार नए कृषि कानूनों पर ढेर सारी बातचीत हुई है लेकिन पूरा कृषि परितंत्र क्या है? यह विषय अछूता रह गया है, तो चलिए भारतीय कृषि क्षेत्र के सभी हिस्सों को समझते हैं ताकि यह समझा जा सके कि क्यों कृषि क्षेत्र की चुनौतियां बहुत अधिक जटिल है? अपने खाने की प्लेट में रखे […]

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इन्साफ़ और सरकार में से अदालत किसको चुनेगी? – अपूर्वानंद

December 21, 2020

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि रास्ता किसानों ने नहीं आपने, यानी आपकी पुलिस ने रोका है। कहा कि सरकार किसानों पर कोई ज़बर्दस्ती नहीं करेगी। आंदोलनकारियों के प्रति अदालत की यह नरमी और सहानुभूति उसके पिछले व्यवहार से इतनी असंगत है कि अविश्वसनीय जान पड़ती है। कविता और साहित्य में तो असंगति चल सकती है […]

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