प्रवासी मजदूरों की समस्या के बीच वेब सीरीज़ ‘भोंसले’ बहुत प्रासंगिक है: मनोज बाजपेयी

लछमी देब रॉय

मुंबई में हर प्रोफेशन में गलाकाट प्रतिस्पर्धा की वजह से लोगों को मजबूत रहने की सीख मिल जाती है, अभिनेता मनोज वाजपेयी ने ‘आउटलुक’ की लछमी देब रॉय को दिए एक विशेष साक्षात्कार में ये बाते कहीं, जिसमें वह अपनी नई फिल्म ‘भोंसले’ के बारे में बात कर रहे हैं।यहां पढ़ें साक्षात्कार के प्रमुख अंशः

लॉकडाउन कैसा है आपके साथ?

मुझे लगता है कि यह (लॉकडाउन) अलगाव, अनिश्चितता के संदर्भ में सभी के साथ समान व्यवहार कर रहा है। मैं चार महीने बाद मुंबई वापस आया हूं। हम एक शूटिंग के लिए उत्तराखंड में फंस गए थे। और हमने बढ़िया समय बिताया। हमें मास्क नहीं पहनना था और कोई आने-जाने में पाबंदी नहीं थी। लेकिन फिर मुंबई वापस आया, और अब अपने घर वापस आने की खुशी है। लेकिन लॉकडाउन में आने-जाने पर पाबंदी अब मेरे लिए काफी नई है। मैं सभी नियमों का पालन कर रहा हूं।

‘भोंसले’ किस बारे में बात करती है?

हालांकि मैं फिल्म में एक प्रवासी की भूमिका नहीं निभा रहा हूं, जिससे मैं जुड़ाव महसूस कर सकता हूं। मेरी भूमिका एक कांस्टेबल की है जो रिटायर हो चुका है। मेरा पूरा काम किरदार को निभाना और किरदार की ज़रूरतों पर टिके रहना था। लेकिन मुझे लगता है कि फिल्म काफी प्रासंगिक है और मुझे नहीं लगता कि कोई और समय इससे बेहतर होता। यह हमारे देश के लिए एक पुराना मुद्दा है, लेकिन अब पूरी दुनिया ‘प्रवासी बनाम स्थानीय’ संघर्ष से गुजर रही है।

‘भोंसले’ मुंबई के बारे में बहुत सारी बातें करती है, लेकिन व्यक्तिगत रूप से आप शहर को कैसा पाते हैं? क्या शहर दूसरों का स्वागत करने वाला है? शहर आपका या किसी भी आउटसाइडर का कैसे स्वागत करता है?

मुंबई एक सच्चा महानगर है। एक छोटी सी जगह से आने वाले किसी भी व्यक्ति को लगता है कि शहर बहुत पर्सनल नहीं है। आप शहर में एडजस्ट होने के लिए बहुत समय लेते हैं। लेकिन एक बार जब आप लगभग एक या दो साल शहर में बिता लेते हैं, तो आप यह महसूस कर पाते हैं कि मुंबई शहर जैसी जीवंत जगह और कोई नहीं। इसके अपने फायदे हैं जिनकी तुलना किसी दूसरे शहर से नहीं की जा सकती है। यह बेसिक मानव प्रकृति को उजागर करता है जो दूसरी जगहों पर बहुत ही दबे हुए तरीके से या मैं कहूंगा कि बहुत ही छिपे तरीके से मौजूद है। लेकिन मुंबई से मिलने वाले सभी फायदे और नुकसान काफी खुले हैं। शुरू में शहर आपको झटका देता है, लेकिन आपको समझ में आ जाता है कि पूरी दुनिया ऐसी ही है। मुझे लगता है कि यह मुंबई की खूबसूरती है। इससे आप मानवीय गुणों के बारे में सीखते हैं और पता चलता है कि आपकी कमियां क्या हैं और आपको अपने आप पर कैसे काम करना चाहिए और कैसे अपने सपने को पूरा करना चाहिए।

एक व्यक्ति जो मुंबई जैसी जगह में रह सकता है, वह दुनिया में कहीं भी रह सकता है…

मुंबई शहर आपको एक बहुत मजबूत इंसान बनाता है और एक बार जब आप बुनियादी मानवीय प्रवृत्तियों को समझ जाते हैं, तो दुनिया की कोई भी चीज आपको डरा नहीं सकती है। यहां हर पेशे में गलाकाट प्रतिस्पर्धा आपको मजबूत होना सिखाती है। आप अपनी बनाई जगह को महत्व देना सीख जाते हैं क्योंकि आपने जो जगह हासिल की है या आप जिस मुकाम पर हैं, वह बहुत मेहनत के बाद आता है। मुंबई आपको जीवन के बारे में बहुत सारी चीजें सिखाएगा, जो शायद आप किसी दूसरे शहर में नहीं सीख पाएंगे। मुझे व्यक्तिगत रूप से लगता है कि शहर बहुत व्यकितगत जुड़ाव वाला नहीं है, लेकिन हर किसी को दुनिया के भौतिकवादी पक्ष को समझने के लिए कम से कम कुछ समय के लिए यहां रहना चाहिए।

ओटीटी के दौर में आप एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री का भविष्य कैसे देखते हैं?

आप ओटीटी की पहुंच की किसी अन्य माध्यम से तुलना नहीं कर सकते। लेकिन यह मनोरंजन का इकलौता भविष्य नहीं है। थिएटर अपने सामान्य समय में वापस आने वाले हैं, लेकिन सब कुछ सही होने तक इसमें समय लगेगा। लेकिन एक बात ज़रूर है कि ओटीटी मनोरंजन का एक प्रमुख माध्यम होने वाला है। मुझे नहीं लगता कि ’भोंसले’ की थिएटर रिलीज को उतनी वैल्यू या उतना सम्मान मिलता, जितना ओटीटी प्लेटफॉर्म पर हमें मिल रहा है।

क्या दर्शकों की थिएटर रिलीज वाली आदत छूट जाएगी?

दर्शकों की कभी भी थिएटर वाले अनुभव की आदत नहीं छूटेगी, यह बहुत दूर की बात है। आप एक तरह के अनुभव को दूसरे से बदल नहीं सकते। अपने हाथ में रिमोट लेकर घर पर एक फिल्म और सीरीज देखना एक अलग तरह का अनुभव है और सामूहिक रूप से देखना एक अलग एहसास है। दोनों अनुभव बहुत अलग हैं और आप एक को दूसरे के साथ नहीं बदल सकते। मुझे उम्मीद है कि जब वायरस चला जाएगा, तो सब कुछ पुराने सामान्य दिनों की ओर लौटने लगेगा।

आपका पसंदीदा माध्यम क्या है?

आप मुझे कोई भी माध्यम दें, मेरा काम आगे बढ़ना और खुद को उसमें झोंक देना है। मैं अपने काम को बहुत सावधानी से चुनता हूं और मैं खुद को हर भूमिका में पूरी तरह झोंक देता हूं। हर प्रोजेक्ट में काफी मेहनत होती है। जब आप खुद को सही तरीके से उस किरदार को उतारने में सक्षम होते हैं, तो वह अलग ही आनंदित करने वाला होता है।

हर कोई फैमिली मैन-2 का इंतजार कर रहा है, कब आ रही है?

आप जैसे मैं भी उतना ही उत्सुक हूं। लेकिन मैं आपको बता दूं कि यह पोस्ट-प्रोडक्शन स्टेज में है और लॉकडाउन की वजह से काम धीमा हो गया है। लेकिन अगले पंद्रह-बीस दिनों में चीजें फिर से सामान्य होंगी और जैसे ही यह पूरा होगा, हम इसे अमेजन को दे देंगे। स्ट्रीमिंग के बारे में फैसला करना उनके ऊपर है।

आपको किसका काम सबसे ज्यादा पसंद है?

वास्तव में बहुत सारे कलाकार हैं जिनके काम को मैं करीब से देखता हूं। मुझे व्यक्तिगत रूप से लगता है कि नसीरुद्दीन शाह और अल पचीनो शानदार अभिनेता हैं। वे खुद पर और काम पर इतनी मेहनत करते हैं। जैसी मेहनत वो करते हैं, हम उनसे बहुत पीछे हैं।

आप अपने आने वाले प्रोजेक्ट्स के बारे में बात करना चाहते हैं?

हाल ही में, मैं उत्तराखंड में फंस गया था क्योंकि मैं एक फिल्म की शूटिंग कर रहा था। शूटिंग शुरू होने के सिर्फ पांच दिनों के अंदर ही लॉकडाउन की घोषणा हो गई थी। पहले मैं उस फिल्म को खत्म करने जा रहा हूं। उसके बाद जी स्टूडियो की फिल्म ‘सूरज पे मंगल भारी’ है, जो कि पोस्ट-प्रोडक्शन स्टेज में है और फिर ‘द फैमिली मैन सीजन-2’ है।

(सौज.- आउटलुक)

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